गांधी का रास्ता और फासीवादी समय की चुनौती
बड़ा सवाल यह है कि क्या गांधी का रास्ता आज के समय में राजनीतिक प्रतिरोध की शक्ति बन सकता है?

गांधी जयंती आते ही गांधी फिर हमारे बीच उपस्थित हो जाते हैं। सरकारी समारोहों में, विज्ञापनों में, विद्यालयों के आयोजनों में, नेताओं के भाषणों में और सोशल मीडिया पर उनके उद्धरणों में। कुछ समय के लिए गांधी सार्वजनिक स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। लेकिन जिस गांधी को हम याद करते हैं, वह अक्सर इतना सुविधाजनक होता है कि उससे कोई असुविधाजनक सवाल पैदा नहीं होता।
गांधी का असली महत्व शायद वहीं से शुरू होता है, जहां उनकी तस्वीर समाप्त होती है। आज जब लोकतांत्रिक समाजों में सत्ता के केन्द्रीकरण, असहमति के प्रति असहिष्णुता, राजनीतिक ध्रुवीकरण, भय के विस्तार और प्रचार की बढ़ती शक्ति को लेकर गंभीर चिंताएं हैं, गांधी को केवल अहिंसा के प्रतीक के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह है कि जब सत्ता नागरिक से केवल आज्ञाकारिता चाहती हो, जब असहमति को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे, जब संस्थाएं धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता खोने लगें और जब समाज का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को शत्रु समझने लगे, तब गांधी का रास्ता क्या कहता है? और उससे भी कठिन प्रश्न यह है कि क्या गांधी का रास्ता ऐसे समय में राजनीतिक प्रतिरोध की शक्ति बन सकता है?
फासीवाद को केवल किसी एक ऐतिहासिक शासन-व्यवस्था या किसी एक नेता के नाम से समझना पर्याप्त नहीं। उसकी पहचान उन प्रवृत्तियों में भी की जा सकती है जिनमें सत्ता के प्रति अंधनिष्ठा, नेता-केन्द्रित राजनीति, असहमति का दमन, भय और घृणा का राजनीतिक इस्तेमाल, झूठे या अतिरंजित शत्रु का निर्माण, संस्थाओं का क्षरण और नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगातार दबाव शामिल होते हैं। हर अधिनायकवादी प्रवृत्ति को फासीवाद कहना भी राजनीतिक विश्लेषण को कमजोर करता है, लेकिन फासीवादी प्रवृत्तियों को केवल इसलिए नजरअंदाज करना कि चुनाव होते हैं, उससे भी बड़ी भूल है।
लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। चुनाव लोकतंत्र की एक आवश्यक प्रक्रिया हैं, उसका पूरा अर्थ नहीं। गांधी का राजनीतिक महत्व इसी बिंदु पर सामने आता है। उन्होंने सत्ता को केवल शासक की शक्ति के रूप में नहीं देखा। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि कोई सत्ता टिकती कैसे है। शासन करने वाले के पास पुलिस, सेना, कानून और प्रशासन हो सकते हैं, लेकिन वह समाज के सहयोग के बिना लंबे समय तक शासन नहीं कर सकता। नागरिक जब आदेश को आदेश मानना बंद कर देता है, जब अन्यायपूर्ण व्यवस्था में सहयोग से इनकार करता है, जब भय के बावजूद सार्वजनिक रूप से असहमति व्यक्त करता है, तब सत्ता की शक्ति की बुनियाद पर प्रश्न उठता है।
गांधी के सत्याग्रह की सबसे बड़ी राजनीतिक खोज यही थी। सत्याग्रह का अर्थ केवल उपवास, धरना या शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं था। वह सत्य के आग्रह से आगे जाकर अन्यायपूर्ण सत्ता के साथ सहयोग न करने की पद्धति थी। असहयोग, सविनय अवज्ञा, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, कर न देने जैसे राजनीतिक कदम इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा थे। गांधी समझते थे कि साम्राज्य केवल शासक की ताकत से नहीं चलता; उसे शासित समाज के किसी न किसी स्तर के सहयोग की आवश्यकता होती है।
इसलिए उन्होंने प्रतिरोध को हथियारों से पहले नागरिक के विवेक का प्रश्न बनाया। यह बात आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी सत्ता की ताकत केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसके पास कितनी पुलिस है, कितने कानून हैं या कितने संचार माध्यम उसके प्रभाव में हैं। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में भी छिपी होती है कि समाज कितना भयभीत है, कितना विभाजित है और कितना आसानी से उसके कथनों को स्वीकार कर लेता है।
फासीवादी राजनीति के लिए यह स्थिति विशेष रूप से अनुकूल होती है। भयभीत नागरिक प्रश्न नहीं करता। विभाजित समाज एक-दूसरे पर निगाह रखता है। प्रचार से घिरा समाज धीरे-धीरे यह भूलने लगता है कि सत्ता के बाहर भी कोई सत्य हो सकता है।
गांधी का प्रतिरोध इस मनःस्थिति के विरुद्ध था। लेकिन यहां गांधी को लेकर एक भ्रम से बचना होगा। अहिंसा कोई जादुई राजनीतिक तकनीक नहीं है। यह मान लेना कि हर दमनकारी सत्ता अहिंसक आंदोलन के सामने अंततः झुक जाएगी, इतिहास की जटिलता को सरल बना देना होगा।
गांधी जिस ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे, वह निश्चित ही औपनिवेशिक और हिंसक सत्ता थी। जलियांवाला बाग इसका भयावह प्रमाण था। असंख्य लोग जेल गए, गोलियाँ चलीं, दमन हुआ। फिर भी उस सत्ता की अपनी कुछ सीमाएं थीं। ब्रिटेन में संसद थी, प्रेस था, राजनीतिक विरोध की परंपरा थी और साम्राज्य को अपनी नैतिक वैधता का दावा करना पड़ता था। भारतीय आंदोलन का प्रभाव भारत की सीमाओं के बाहर भी पड़ता था। ब्रिटिश शासन को यह भी महसूस करना पड़ता था कि वह जिस लोकतांत्रिक और सभ्य राजनीतिक परंपरा का दावा करता है, उसके सामने उसकी औपनिवेशिक हिंसा लगातार कटघरे में खड़ी हो रही है।
फासीवादी सत्ता का चरित्र इससे कहीं अधिक कठोर हो सकता है। वह अपने विरोधियों को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं मानती; वह उन्हें राष्ट्र, समाज या सभ्यता के शत्रु के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। ऐसी सत्ता पर नैतिक तर्क का प्रभाव सीमित हो सकता है। वह सत्याग्रही की पीड़ा को कमजोरी और उसकी अहिंसा को भय समझ सकती है।
इसलिए गांधी के रास्ते को इतिहास से काटकर देखना खतरनाक है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि फासीवादी समय में गांधी अप्रासंगिक हो जाते हैं। बल्कि इसके विपरीत, ऐसे समय में गांधी की राजनीति को अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता होती है।
गांधी की अहिंसा का पहला अर्थ हिंसा न करना नहीं, बल्कि मनुष्य को साधन में बदलने से इनकार करना है। प्रतिरोध के दौरान भी प्रतिद्वंद्वी को मनुष्य मानना, उसके विनाश को लक्ष्य न बनाना, स्वयं को भी सत्ता की हिंसक भाषा में बदलने से बचाना—यह गांधी की कठिन नैतिक मांग थी।
यहां गांधी आज के समय से टकराते हैं। आज राजनीतिक संघर्षों में भाषा तेजी से कठोर हुई है। विरोधी को असहमति रखने वाला नागरिक मानने के बजाय शत्रु मान लेना आसान हो गया है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीखा किया है। राजनीतिक बहस धीरे-धीरे तर्क से पहचान की लड़ाई में बदल जाती है। हम यह पूछने के बजाय कि सामने वाला क्या कह रहा है, पहले यह तय कर लेते हैं कि वह किस पक्ष का है।
फासीवादी राजनीति इसी मनोविज्ञान से शक्ति प्राप्त करती है। उसे ऐसे नागरिक चाहिए जो पहले समूह की पहचान में सोचें और बाद में मनुष्य के रूप में। उसे समाज में ऐसी रेखाएं चाहिए जिनके दोनों ओर भय और घृणा लगातार बढ़ती रहे। इसलिए फासीवाद का प्रतिरोध केवल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष नहीं है; वह समाज के भीतर पैदा किए जा रहे भय और घृणा के विरुद्ध संघर्ष भी है।
गांधी का रास्ता यहां महत्वपूर्ण हो जाता है। सत्याग्रह का अर्थ है—भय के बावजूद सत्य कहना। असहयोग का अर्थ है—अन्यायपूर्ण आदेश को केवल इसलिए स्वीकार न करना कि उसे सत्ता ने जारी किया है। नागरिक अवज्ञा का अर्थ है—कानून और न्याय के बीच अंतर को पहचानना। अहिंसा का अर्थ है—प्रतिरोध करते हुए भी उस मनुष्यत्व को न खोना जिसे बचाने के लिए प्रतिरोध किया जा रहा है।
लेकिन इन सबका एक और पक्ष है, जिसे अक्सर भुला दिया जाता है—संगठन। गांधी का आंदोलन अकेले नैतिक व्यक्तियों का समूह नहीं था। उसके पीछे व्यापक जनभागीदारी थी। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएं, व्यापारी, पेशेवर और समाज के विभिन्न वर्ग किसी न किसी रूप में आंदोलनों से जुड़े। गांधी की राजनीतिक शक्ति उनकी व्यक्तिगत नैतिक प्रतिष्ठा से जरूर आती थी, लेकिन केवल उससे नहीं। वह जनता की भागीदारी से राजनीतिक शक्ति में बदलती थी।
यही आज के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक है। एक अकेला नागरिक सत्ता से प्रश्न कर सकता है, लेकिन संगठित नागरिक समाज सत्ता की संरचना को चुनौती दे सकता है। स्वतंत्र पत्रकारिता, विश्वविद्यालय, श्रमिक संगठन, किसान संगठन, नागरिक अधिकार समूह, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता—ये सब लोकतंत्र की जीवित संस्थाएं हैं। इनका स्वतंत्र रहना किसी सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र नहीं, लोकतंत्र के पक्ष में आवश्यक शर्त है। यदि ये संस्थाएं भय के कारण चुप हो जाएं, तो लोकतंत्र का बाहरी ढांचा बचा रह सकता है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है।
इसलिए गांधी को केवल राजघाट पर खोजने के बजाय हमें उन जगहों पर देखना होगा जहां कोई व्यक्ति अकेले होकर भी अन्यायपूर्ण आदेश को मानने से इनकार करता है; जहां कोई पत्रकार दबाव के बावजूद प्रश्न पूछता है; जहां कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, प्रश्न करना सिखाता है; जहां कोई लेखक सुविधा के बजाय असुविधाजनक सत्य को चुनता है; जहां कोई नागरिक अपने से भिन्न विचार रखने वाले व्यक्ति के अधिकार की रक्षा करता है।
गांधी जयंती पर शायद यही प्रश्न हमारे सामने होना चाहिए कि क्या हम गांधी की मूर्ति की पूजा करेंगे या उनके प्रश्नों को अपने समय में जीवित रखेंगे? क्या हम अहिंसा को केवल हिंसा की अनुपस्थिति समझेंगे या उसे अन्याय के विरुद्ध सक्रिय नागरिक प्रतिरोध के रूप में समझेंगे? क्या हम सत्य को केवल व्यक्तिगत सदाचार मानेंगे या सार्वजनिक जीवन में सत्ता से सवाल करने का साहस भी?
फासीवादी समय की चुनौती केवल यह नहीं है कि सत्ता कितनी कठोर हो गई है। असली चुनौती यह है कि नागरिक कितनी जल्दी उसके कठोरपन को सामान्य मानने लगते हैं। इसलिए गांधी का रास्ता आज किसी पुराने राजनीतिक नुस्खे की तरह हमारे सामने नहीं है। वह एक कसौटी की तरह है।
गांधी जयंती पर गांधी को याद करने का इससे अधिक अर्थपूर्ण अवसर शायद नहीं हो सकता कि हम उस छोटे-से “नहीं” को पहचानें, उसकी रक्षा करें और उसे अकेला न पड़ने दें। क्योंकि किसी भी सत्ता की अंतिम शक्ति उसके पास मौजूद हथियारों में नहीं होती। वह इस विश्वास में होती है कि उसके सामने खड़ा होने वाला कोई नहीं है। और प्रतिरोध की पहली आवाज शायद वही होती है—मैं तुम्हारे अन्याय में सहभागी नहीं हूं।
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए
