फ्रांस में उठने वाला है राफेल में हुए ‘खेल’ का बवंडर! अंबानी को ऑफसेट भागीदार चुनने की सच्चाई से उठेगा पर्दा?

फ्रांसीसी सरकार और इसकी प्रमुख रक्षा कंपनी ने आखिरकार ऑफसेट भागीदार के रूप में अनिल अंबानी को कैसे चुना होगा जिनके पास न तो वायुसेना के हार्डवेयर उत्पादन का कोई अनुभव था और न ही उनकी आर्थिक स्थिति ठीक थी क्योंकि वह दिवालियेपन की ओर बढ़ रहे थे।

फोटो: सोशल मीडिया
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आशीस रे

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 59,000 करोड़ रुपये के राफेल लड़ाकू विमान सौदे में ऑफसेट संबंधी प्रतिबद्धताओं को पूरा न करने पर भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की तल्ख टिप्पणियों और फिर अनिल अंबानी की ओर से लंदन के उच्च न्यायालय में अपनी खस्ताहाल आर्थिक स्थिति को लेकर दिए बयान ने फ्रांस में भ्रष्टाचार विरोधी लॉबी को सक्रिय कर दिया है। आने वाले समय में इस सौदे की सार्वजनिक जांच की मांग तेज होने वाली है। इस अभियान से जुड़े पेरिस स्थित एक कार्यकर्ता ने संकेत दिया कि इस संदर्भ में स्थितियां इस साल के अंत तक स्पष्ट हो जाएंगी।

फ्रांस के भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अप्रैल, 2015 में घोषणा के बाद से ही इस विवादास्पद सौदे के खिलाफ थे लेकिन तब उनका अभियान परवान नहीं चढ़ सका था क्योंकि इसका एक बड़ा कारण फ्रांसीसी सरकार का दबाव था। फ्रांसीसी सरकार मुश्किलों से जूझ रही सरकारी कंपनी दसॉल्ट एविएशन के साथ हो रहे इस अहम सौदे को खतरे में डालना नहीं चाहती थी। चिंता का मूल कारण फ्रांसीसी जनहित से जुड़ा एक सवाल है: फ्रांसीसी सरकार और इसकी प्रमुख रक्षा कंपनी ने आखिरकार ऑफसेट भागीदार के रूप में अंबानी को कैसे चुना होगा जिनके पास नतो वायुसेना के हार्डवेयर उत्पादन का कोई अनुभव था और नही उनकी आर्थिक स्थिति ठीक थी क्योंकि वह दिवालिए पन की ओर बढ़ रहे थे।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने दसॉल्ट से 126 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला किया था। 13 मार्च, 2014 को दसॉल्ट और हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (एचएएल) के बीच इस बात का करार हुआ कि इनमें से ज्यादातर विमानों का निर्माण भारत में होगा। याद रहे कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भी 25 मार्च, 2015 को दसॉल्ट एविएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक ट्रैपियर ने एचएएल के अध्यक्ष के साथ बैठक के बाद कहा था: “मेरा दृढ़मानना है कि अनुबंधको अंतिम रूप देकर इस पर बहुत जल्द हस्ताक्षर हो जाएगा।”

हालांकि 4 अक्टूबर, 2018 को प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने सीबीआई से की गई शिकायत में कहा था कि 3 मार्च, 2015 को अंबानी ने मोदी से मुलाकात की थी। शिकायतकर्ताओं ने अंबानी को मोदी का “पुराना दोस्त और करीबी सहयोगी” बताया और कहा कि अंबानी की कंपनियां “दिवालिया होने के कगार” पर थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि“मोदी के कहने पर ही अंबानी ने आनन-फानन में रक्षा जैसे उच्च तकनीकी, संवेदनशील और सरकार पर निर्भर क्षेत्र में प्रवेश किया क्योंकि वह आश्वस्त थे कि मोदी किसी भी सौदे को उनके हक में करा सकते हैं।” गौरतलब है कि 28 मार्च, 2015 को अंबानी ने रिलायंस डिफेंस लिमिटेड नाम की कंपनी शुरू की।

8 अप्रैल, 2015 को एस. जयशंकर जो तब विदेश सचिव थे, ने पेरिस में पत्रकारों से बातचीत में कहा: “राफेल के बारे में मेरी समझ यही है कि फ्रांसीसी कंपनी, हमारे रक्षा मंत्रालय और इस सौदे में शामिल एचएएल के बीच बातचीत हो रही है।” शिकायत में कहा गया है कि जयशंकर के इस बयान के दो ही दिन बाद तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बैठक में मोदी “अंबानी के साथ रची साजिश को आगे बढ़ाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग” करते हुए 126 विमानों के सौदे से पीछे हट गए। भूषण, सिन्हा और शौरी ने शिकायत में आरोप लगाया: “साफ है कि यह मोदी का एक तरफा निर्णय था।... मोदी ने खुद इस सौदे को बदला और दसॉल्ट और फ्रांस के सामने ‘मानो या छोड़ो’ वाली स्थिति कर दी।”

ऑफसेट अनुबंधों के बारे में ओलांद ने फ्रेंच ऑनलाइन खोजी प्रकाशन मीडियापार्ट से बातचीत में कहा: “इस मामले में हमारे हाथ में कुछ नहीं था। यह तो उस सेवा समूह का प्रस्ताव करने वाली भारत सरकार और और दसॉल्ट के बीच की बात थी जिसने अंबानी के साथ बातचीत की थी। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, हमने तो उससे बात की जिससे करने को कहा गया।” रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर लिमिटेड में रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की लगभग100% अंश भागिता थी। इसका गठन 24 अप्रैल, 2015 को किया गया था, यानी 10 अप्रैल, 2015 को मोदी और ओलांद के बीच हुई बैठक के महज 15 दिन बाद और अक्टूबर, 2016 में दसॉल्ट और रिलायंस के बीच दसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड नाम के संयुक्त उद्यम का गठन होता है।

यह और बात है कि सीबीआई ने इन तीनों शिकायतकर्ताओं की चिंताओं पर गौर नहीं किया या उसे करने की अनुमति नहीं दी गई और नही भारत के सुप्रीम कोर्ट को उस याचिका में कोई दम दिखा जिसमें मोदी द्वारा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। मोदी और ओलांद के बीच हुई बैठक में न तो तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर थे और न ही तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज। भारत की ओर से बातचीत के दौरान मौजूद लोगों में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, जयशंकर और भारतीय राजदूत अरुण सिंह थे। उस बैठक में क्या बातचीत हुई, इस बारे में फ्रांसीसी पक्ष ने होठ सिल रखे हैं और किसी ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

समाचार पत्र‘दि हिंदू’ ने मीडियापार्ट के हवाले से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया है कि दसॉल्ट के एक आंतरिक दस्तावेज से पता चलता है कि“फ्रांसीसी समूह के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को बताया था कि रिलायंस के साथ संयुक्त उद्यम को राफेल सौदे में ‘मुआवजे’ के रूप में सहमति दी गई थी और राफेल सौदा हासिल करने के लिए ‘अनिवार्य और बाध्यकारी’ था।’’ हालांकि इन आरोपों का दसॉल्ट, अंबानी और मोदी सरकार- तीनों ने खंडन किया है। 23 सितंबर, 2020 को कैग ने राफेल से जुड़ी ऑफसेट व्यवस्था के संबंध में तल्ख टिप्पणी की कि वेंडरों की “इन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी”।

इसका संदर्भ, हालांकि, भारत सरकार के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन(डीआरडीओ) को प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और अनुबंध के मूल्य के 30% के लिए था जबकि समझौते में 50% का उल्लेख था। संसद में पेश कैग की रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि दसॉल्ट को ऑफसेट पार्टनर का नाम बताने से छूट दी गई थी जब उसने 2016 में राफेल समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए थे। कैग की रिपोर्ट और सरकार के कदमों से साफ है कि ऑफसेट भागीदार के तौर पर अंबानी के हैरत अंगेज चयन से ध्यान भटकाने की कोशिश की गई और वह भी एचएएल की कीमत पर।

24 सितंबर, 2020 को अंबानी के खिलाफ लंदनका उच्च न्यायालय चीनी बैंकों को 750,000 पाउंड के कानूनी खर्चे तथा 71.7 करोड़पाउंड से अधिक के ऋण को नहीं चुका पाने के लिए बड़ी सख्ती से पेश आया। इसपर अंबानी ने कहा किउनके पास “कुछ भी नहीं रहा।” महारानी के वकील बैरिस्टर बंकिम थांकी ने उनसे जिरह के दौरान कहाः “आप ईमानदार प्रमाण नहीं दे रहे हैं। आप ही कहें, क्या आप ऐसा कर रहे हैं?” बहरहाल, ऑफसेट भागीदार के तौर पर पूरी तरह से अयोग्य अंबानी को चुने जाने को फ्रांस की भ्रष्टाचार विरोधी लॉबी ने दसॉल्ट एविएशन और फ्रांस की प्रतिष्ठा के लिए एक बड़े धक्के के तौर पर देखा है। इस लॉबी का मानना है कि फ्रांस के लोगों को पूरी बात जानने का अधिकार है। संभावना है कि इस लॉबी से जुड़े सत्यनिष्ठ और ईमानदार कार्यकर्ता फ्रांस की नेशनल असेंबली और सीनेट में इस बात को उठाएंगे कि इस सौदे की विदेशी और रक्षा से जुड़ी स्थायी समितियों से जांच कराई जाए।

2017 के चुनावों के बाद ओलांद की फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी को दोनों सदनों में काफी कम अंतर वाला बहुमत है और इसलिए वह इस तरह की मांगों का ज्यादा विरोध नहीं कर पाएगी। इसके साथ ही यह भी गौर करने की बात है कि वर्तमान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन पहले ओलांद कैबिनेट में मंत्री थे और माना जाता है कि उनके ओलांद के साथ काफी अच्छे रिश्ते हैं। मीडियापार्ट के साथ राफेल संबंधी अपनी बातचीत के बाद से ओलांद ने खास तौर पर चुप्पी साध रखी है। माना जा रहा है कि ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं कि भारत के साथ राफेल सौदा खतरे में नहीं पड़े। इस मौन के बदले मैक्रोन अपनी पार्टी की संसदीय ताकत से ओलांद को किसी भी संकट से बचा सकते हैं। लेकिन यह देखने वाली बात है कि फ्रांस के राष्ट्रपति महत्वपूर्ण हैं या फ्रांस के वाणिज्यिक और राजनयिक हित क्योंकि अगर राष्ट्रपति ज्यादा तकतवर होंगे तभी राफेल सौदे में एक निष्पक्ष न्यायिक जांच को टाला जा सकेगा।

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