आकार पटेल / एनजीओ पर शिकंजा कसने के लिए कानून के बजाए नियमों का सहारा लेती सरकार !
संख्याबल न होने के चलते सरकार मनमानी वाले कानून तो नहीं बना पाती है, लेकिन वह कार्यकारी नियम बनाकर वही मकसद हासिल कर रही है जो कानून बनाकर किए जाने थे। एनजीओ पर शिकंजा कसना ऐसा ही नियम है।

जो चीज़ संसद में कानून के तौर पर पास नहीं हो सकती, उसे नियमों में बदलाव करके लागू किया जा सकता है। दुनिया पर इसका असर एक जैसा ही होता है और मकसद भी पूरा हो जाता है। वैसे तो लोकतांत्रिक देशों को ऐसा नहीं करना चाहिए, लेकिन एक बहुत ठोस वजह है कि 1947 के इतने सालों बाद भी भारत को 'आंशिक रूप से स्वतंत्र' माना जाता है, न कि पूरी तरह से लोकतांत्रिक देश।
इस साल मार्च में, सरकार ने गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर एक बार फिर हमला करने के लिए एक बिल पेश किया। एनजीओ एक ऐसा सेक्टर है जिसके बारे में शुरू में ही यह साफ़ कर देना चाहिए कि आरएसएस इस क्षेत्र से जुड़ा नहीं है, क्योंकि यह कोई रजिस्टर्ड संस्था नहीं है और इसलिए इसका कोई अस्तित्व नहीं है।
विपक्ष ने अपना काम किया—यानी विरोध किया—और इसके चलते बिल पास नहीं हो सका। प्रधानमंत्री को अपने 240 सांसदों के साथ बिल को वापस लेना पड़ा। इसके बाद, उन्होंने उसी बिल के मुख्य हिस्से को मौजूदा कानून में 'नियमों' में बदलाव के तौर पर फिर से पेश किया। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिए संसद की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती।
ठीक उसी तरह जैसे विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) की शुरुआत हुई, जिसने उन 'नियमों' के माध्यम से मताधिकार छीनने का काम किया जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर कानून के माध्यम से नहीं किया जा सका।
एनजीओ पर हो रहे मौजूदा हमले दरअसल इस सेक्टर को बंद करने की कोशिश का ही हिस्सा हैं। इसका मकसद उन एनजीओ को निशाना बनाना है जिन्हें विदेशी फंडिंग मिलती है, और इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी साज़िश जैसे पुराने आरोपों का सहारा लिया जा रहा है। सबसे पहले यह साफ़ कर देना चाहिए कि पीएण केयर्स का ज़िक्र यहां नहीं किया जा रहा है, क्योंकि न तो यह कोई सरकारी संस्था है — और इसलिए आरटीआई के दायरे से बाहर है — और न ही यह कोई एनजीओ है — इसलिए इस पर एनजीओ वाले नियम लागू नहीं होते। यह एक अजीब और अनोखी चीज़ है।
खैर, नए नियमों में कुछ ऐसी बातें हैं जो एनजीओ के काम में रुकावट डाल सकती हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं: एनजीओ सिर्फ़ वही गतिविधियां कर सकते हैं जो सरकार की दी गई सूची में शामिल हैं। सरकार यह भी तय करेगी कि एनजीओ कहां काम कर सकता है। एनजीओ के 'मुख्य पदाधिकारी' का मतलब सिर्फ़ उसका मुख्य पदाधिकारी ही नहीं, बल्कि उसके सभी ट्रस्टी और पदाधिकारी भी हैं, और विदेशी लोग इसके लिए पात्र नहीं हैं।
उन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी देनी होगी और ऐसी कोई चीज़ पब्लिश नहीं करनी होगी जिसे सरकार राजनीतिक मानती हो। और भी बहुत कुछ। ये नियम बाकी निजी क्षेत्र (जिसका मतलब ही 'गैर-सरकारी' है) पर क्यों लागू नहीं होते? यह कहना मुश्किल है। कॉर्पोरेट कंपनियां जितना चाहें उतना विदेशी निवेश ला सकती हैं और इसके लिए उनकी तारीफ़ भी होती है। वे विदेशी सीईओ रख सकती हैं, और अमेरिका में हमारे भारतीय सीईओ हीरो माने जाते हैं।
इसके अलावा भी कई साफ़-साफ़ पाखंड देखने को मिलते हैं। जनवरी 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था बीजेपी और कांग्रेस को एक ही विदेशी कंपनी, वेदांता/स्टेरलाइट से चंदा मिला था, जो एफसीआरए कानून का उल्लंघन था। 28 मार्च 2014 को कोर्ट ने माना कि बीजेपी और कांग्रेस एफसीआरए के उल्लंघन की दोषी हैं और मई में मोदी सरकार और चुनाव आयोग से इन दोनों पार्टियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा।
अक्टूबर 2015 आते-आते, मोदी सरकार ने इसका एक रास्ता निकाल लिया था। कानून में बदलाव करके यह तय किया गया कि भारत में रजिस्टर्ड कोई भी कंपनी—चाहे उसका मालिक कोई भी हो—भारतीय कंपनी मानी जाएगी। असल में, 'विदेशी' को 'भारतीय' के तौर पर फिर से परिभाषित किया गया, जो भारतीय लोगों के साथ एक धोखा था; लेकिन चूंकि दोनों मुख्य पार्टियां इस धोखे में शामिल थीं, इसलिए यह बिना किसी विरोध के पास हो गया।
बाकी लोगों के लिए नियम अलग हैं। 2020 में सरकार ने और भी नियम लागू किए। पहला नियम यह था कि जिन लगभग 23,000 एनजीओ के पास विदेशी पैसा लेने का लाइसेंस था, वे सिर्फ़ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की एक ही ब्रांच — नई दिल्ली में संसद मार्ग वाली ब्रांच — में ही फ़ंड ले सकती थीं। दिल्ली में सिर्फ़ 1,488 एनजीओ रजिस्टर्ड थे, इसलिए बाकी एनजीओ को अकाउंट खुलवाने के लिए दिल्ली आना पड़ता। यह ब्रांच पैसे के लेन-देन, उसके सोर्स और उसे पाने के तरीके की जानकारी गृह मंत्रालय को देती।
दूसरा बदलाव यह था कि एनजीओ को मिले पैसे का सिर्फ़ 20 प्रतिशत हिस्सा ही 'प्रशासनिक खर्चों' पर खर्च किया जा सकता था। सैलरी, यात्रा का खर्च, लोगों को काम पर रखने का खर्च, बिजली-पानी का बिल, टेलीफ़ोन का खर्च, डाक और कूरियर का खर्च, ऑफ़िस की मरम्मत, स्टेशनरी और प्रिंटिंग का खर्च, ट्रांसपोर्ट, फ़ंड का हिसाब-किताब और मैनेजमेंट का खर्च, गाड़ियों को चलाने और उनके रखरखाव का खर्च, रिपोर्ट लिखने और फ़ाइल करने का खर्च, कानूनी और प्रोफ़ेशनल फ़ीस और किराया - इन सभी को प्रशासनिक खर्चों की श्रेणी में रखा गया था।
इन सारी चीज़ों पर उनकी विदेशी फंडिंग का 20 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा खर्च नहीं किया जा सकता था (ध्यान रखें कि भारत में किसी दूसरे सेक्टर पर ऐसी पाबंदियां लागू नहीं हैं)। इसका असर उन संगठनों पर पड़ता जिनका काम रिसर्च, वकालत और ऐसी दूसरी गतिविधियों से जुड़ा था, जिनके लिए वकील और एकेडमिक्स जैसे प्रोफेशनल्स को हायर करने की ज़रूरत होती थी, और जिनका सीधा संबंध अस्पताल या स्कूल बनाने जैसी ठोस निर्माण गतिविधियों से नहीं था।
तीसरी बात, अब कानून किसी एनजीओ को मिले फंड को दूसरे एनजीओ को बांटने से रोकता है, भले ही वे एनजीओ, एफसीआरए के नियमों का पालन करते हों। इससे इस सेक्टर पर बुरा असर पड़ेगा क्योंकि एनजीओ प्राइवेट सेक्टर की तरह एक-दूसरे से मुकाबला नहीं करते; वे नेटवर्क के तौर पर काम करते हैं। इस बदलाव से उनके आपसी गठजोड़ और एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने की क्षमता को नुकसान पहुंचेगा। बड़े एनजीओ अब छोटे एनजीओ के साथ काम नहीं कर पाएंगे, खासकर उन ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों के साथ, जिनके पास खुद फंड जुटाने का कोई ज़रिया या अनुभव नहीं है।
और अब 2026 में और भी नियम। और ये सब 'मिनिमम गवर्मेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस' जैसे अद्भुत नारे के बीच हो रहा है।
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