सरकारें सशक्त महिला आवाजों से ज्यादा डरती हैं, दबाने के लिए आतंकवादी-देशद्रोही बताकर जेल भेजती हैं

भारत में भले ही महात्मा गांधी को भुला दिया गया हो पर वैश्विक स्तर पर आज के आन्दोलन उन्हीं की राह पर किये जा रहे हैं। अहिंसा का समावेश होते ही महिलाओं की संख्या आन्दोलनों में बढ़ने लगी और अब तो वे दुनिया भर में आन्दोलनों का नेतृत्व कर रही हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

हमारे देश में लोकतंत्र साल 2014 के बाद से दफन हो चुका है, फिर भी कभी-कभी कुछ न्यायालय में न्यायाधीशों द्वारा बोले गए वाक्य हमें लोकतंत्र के जिंदा रहने की झूठी उम्मीद दे जाते हैं। दूसरी तरफ सरकार, पुलिस, निचले न्यायालय, मीडिया और सभी संवैधानिक संस्थाएं हरेक दिन लोकतंत्र की अर्थी निकालते हैं और मानवाधिकार के सन्दर्भ में देश को म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस, बेलारूस, यमन और सीरिया के समकक्ष खड़ा कर दिया है।

म्यांमार में सेना ने तख्ता पलट किया, फिर भी जितने लोग वहां हवालात में पुलिस द्वारा मार डाले जाते हैं, उससे कई गुना अधिक हमारे देश में मारे जाते हैं। अफगानिस्तान में तालिबान जो काम कर रही है, वह तो हमारी सरकार ही कर देती है। हमारे देश में असली गुनाहगारों को बचाने के लिए खुले आम निर्दोष लोगों को पुलिस जेल में बंद करती है, फिर हजारों पन्नों का दस्तावेज बनाती है, लेकिन इसमें किसी गुनाह का सबूत नहीं होता। आश्चर्य यह है कि न्यायालय बड़े जोरशोर से कहती तो है कि विरोध के स्वर दबाने की जल्दीबाजी में सरकार और पुलिस मौलिक अधिकारों और आतंकवाद के बीच का अंतर ही भूल जाती है। पर, इससे आगे बढ़ कर इसका स्थाई समाधान कोई न्यायालय नहीं देता और न ही मौलिक अधिकार को आतंकवाद करार देने वालों को कभी सजा मिलती है।

देश में निरंकुश शासन के बाद भी कम ही सही, पर विरोध के स्वर समय-समय पर उठते ही रहते हैं। हरेक आन्दोलन के बाद सरकार भारी संख्या में आन्दोलनकारियों को कभी देशद्रोह तो कभी यूएपीए के तहत गिरफ्तार करती है, गिरफ्तार करने के बाद कई महीनों बाद पुलिस उन पर आरोप गढ़ती है और निर्दोष बिना किसी आरोप और कसूर के जेल में बंद रहते हैं। इस बीच मीडिया और सोशल मीडिया उनपर आरोप तो गढ़ती ही है, लगातार चरित्र हनन भी करती है और बीजेपी नेता बेगुनाहों के चरित्र और मीडिया द्वारा गढ़े गए आरोपों पर लगातार वक्तव्य देते हैं।

इसका एक बड़ा फायदा ये है कि पुलिस आतंकियों और असली देशद्रोहियों को साफ बचा लेती है। इन सबके बाद भी अब महिलाएं भारी संख्या में आन्दोलनों में शरीक होती हैं, अग्रणी भूमिका निभाती हैं और कई आन्दोलन तो अपने बलबूते पर चला लेती हैं। सरकार महिलाओं के सशक्त स्वरों से सबसे अधिक डरती है और सरकार के विरुद्ध सशक्त महिला आवाजों को आतंकवादी और देशद्रोही बताकर भारी संख्या में जेल भी भेज रही है।


सफूरा ज़रगर भी ऐसी महिलाओं में एक है, जिन्हें केंद्र सरकार के इशारे पर दिल्ली पुलिस ने बहुत बहादुरी दिखाते हुए दिल्ली दंगों की मुख्य साजिशकर्ता करार देते हुए गिरफ्तार किया था।तीन माह की गर्भवती सफूरा की गिरफ्तारी के बाद पूरी दुनिया से इसके विरोध में आवाजें उठने लगीं, तब 74 दिनों बाद मानवता के आधार पर उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। पिछले महीने अलजजीरा को दिए गए एक साक्षात्कार में सफूरा ने कहा था, “मेरे विचार से सशक्त महिलाओं से सरकार डरती है। शायद सरकार को लगता है कि महिलाएं विरोध के स्वर बुलंद नहीं कर सकतीं। सरकार हरेक घटना के लिए बलि के बकरे की तलाश में रहती है, इसलिए बिना किसी सबूत और बिना कारण किसी को भी हिरासत में ले लिया जाता है। यह सब देश में नया नहीं है।”

एक अन्य प्रश्न के जवाब में सफूरा कहती हैं, “जब भी एक महिला सशक्त स्वर में कुछ कहती है, तब किसी को इससे मतलब नहीं होता कि उसने कहा क्या है। उसके वक्तव्य के बदले समाज में चर्चा होती है कि उसने क्या पहना था, वो दिखने में कैसी है, मोटी है या दुबली है, क्या वह तलाकशुदा है या फिर अविवाहित है, वह एक हफ्ते में कितनी बार मर्दों के साथ सोती है, उसके कितने बच्चे हैं, वह कितने सौन्दर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करती है– पूरा समाज, मीडिया, सोशल मीडिया इसी चर्चा में व्यस्त हो जाता है।”

सफूरा जरगर कोई अकेली महिला नहीं हैं, जिन्हें सरकार ने केवल विरोध के कारण जेल में डाला हो, बल्कि ऐसी एक लम्बी फेहरिस्त है। भीमा-कोरेगांव मामले में सुधा भारद्वाज, संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और दिल्ली दंगों के मामले में नताशा नरवाल और देवांगना कलिता के बारे में तो सबको पता होगा। सभी इसलिए आतंकवादी करार दिए गए क्योंकि इन लोगों ने समाज के अल्पसंख्यकों के समर्थन में आवाज उठाई। समय-समय पर मेधा पाटकर को हिरासत में लिया जाता है।

इसी तरह जनवरी में हरयाणा के सोनीपत में मजदूर अधिकार संगठन की नवदीप कौर जब एक उद्योग में मजदूरों के बकाये की मांग को लेकर मजदूरों के साथ मार्च कर रही थीं, तब हरियाणा की बहादुर पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज किया और नवदीप कौर को घसीटते हुए गिरफ्तार किया। किसान आन्दोलन को कुचलने के नाम पर ही प्रसिद्द पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी की गई थी। हाल में ही लक्षद्वीप में वहां की अकेली महिला फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना को प्रशासक के विरोध में एक टीवी चैनल पर बोलने के कारण राजद्रोह का मामला बनाकर गिरफ्तार कर लिया गया।


महिलाओं द्वारा शुरू किये गए आन्दोलनों में प्रायः अधिक संख्या में लोग शामिल होते हैं, ऐसे आन्दोलन अहिंसक रहते हैं और अधिकतर मामलों में सफल भी रहते हैं। महिलाओं द्वारा आन्दोलनों की शुरुआत का इतिहास पुराना है और ऐसा लगातार होता रहा है। हाल के वर्षों में अल्जीरिया, लेबनान, सूडान, अमेरिका, भारत, ब्राजील और ईरान में ऐसे आन्दोलन किये जा चुके हैं। हमारे देश में नागरिकता कानून के विरुद्ध दिल्ली के शाहीन बाग के आन्दोलन की चर्चा पूरी दुनिया में की गई, और प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने वर्ष 2020 के दुनिया के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों की सूचि में बिलकिस दादी को भी शामिल कर इस आन्दोलन को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान दिया। इस आन्दोलन का आरंभ 15 दिसम्बर की ठिठुरती रात में लगभग 50 महिलाओं ने किया था।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एरिका चेनोवेथ और जोए मार्क्स ने 2010 से 2014 के बीच दुनिया भर में किये गए बड़े आन्दोलनों का विस्तृत अध्ययन किया है। इनके अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक अहिंसक आन्दोलनों की अगुवाई महिलाओं ने की है। इनके अनुसार महिलाओं की अगुवाई वाले आन्दोलन अपेक्षाकृत अधिक बड़े और अधिकतर मामलों में सफल रहे हैं। महिलाओं के आन्दोलन अधिक सार्थक और समाज के हरेक तबके को जोड़ने वाले रहते हैं, इनकी मांगें भी स्पष्ट होती हैं। महिलाएं आन्दोलनों के नए तरीके अपनाने से भी नहीं हिचकतीं।

शाहीन बाग का उदाहरण भी लें तो वहां कभी भी आन्दोलन तय दायरे के बाहर नहीं गया, महिलाएं शान्ति से बिना नारेबाजी के बैठती थीं, संविधान की प्रस्तावना पढ़ती थीं, राजनैतिक दलों से दूर थीं। ऐसा आन्दोलन देश के इतिहास में दूसरा नहीं है। इसी तरह बेलारुस में आन्दोलनकारी महिलाएं एक रंग के कपड़े पहनकर रैलियों में निकलती हैं, पुलिसवालों को फूल देतीं हैं, और यदि पुलिस पर आन्दोलनकारी हावी होते हैं, तो पुलिसवालों को बचाती भी हैं। इनके नए तरीकों के आगे पुलिस भी अहिंसक हो जाती है।

थाईलैंड में राजशाही के विरुद्ध और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन किये जा रहे हैं। थाईलैंड के राजा, राजशाही की संपत्ति जो अब तक चैरिटी के नाम है, अपने नाम करना चाहते हैं और फौज पर पूरा नियंत्रण चाहते हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री एक निरंकुश शासक हैं। सेना और पुलिस के बार-बार चेतावनी के बाद भी ये आन्दोलन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। इन आन्दोलनों में भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक है।


मेक्सिको की महिलाएं अगस्त 2019 से लगातार आन्दोलन कर रही हैं। यह आन्दोलन महिलाओं की हत्या, बलात्कार या फिर महिलाओं को गायब किये जाने के विरुद्ध है। अगस्त 2019 में एक पुलिस ऑफिसर ने एक महिला से बलात्कार किया था और सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। इसके बाद से लगातार आन्दोलन किये जा रहे हैं। मार्च 2020 में महिलाओं ने देशव्यापी हड़ताल किया था, इसमें नौकरीपेशा महिलाओं ने भी हिस्सा लिया था। इस वर्ष 15 सितम्बर को, मेक्सिको के स्वतंत्रता दिवस के दिन महिलाओं ने सेंट्रल ह्यूमन राइट्स कमीशन के कार्यालय को अपने अधिकार में ले लिया था, जिसे पीड़ित महिलाओं के आश्रय स्थल में बदल दिया।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एरिका चेनोवेथ और जोए मार्क्स के अनुसार पुलिस या सरकारें महिला आन्दोलनों का दमन केवल महिलाओं के कारण नहीं करतीं, बल्कि महिलाओं के आन्दोलन के नए तरीके और अहिंसा से भी वे अचंभित रहते हैं। आन्दोलनों के इतिहास में 1980 के दशक तक हिंसक आन्दोलनों का जोर रहा, पर इसके बाद एकाएक आन्दोलनों में महात्मा गांधी के अहिंसक, सविनय अवज्ञा और असहयोग आन्दोलनों के तरीके शामिल हो गए। ऐसा दुनिया भर में किया जा रहा है और भारत में भले ही महात्मा गांधी को भुला दिया गया हो पर वैश्विक स्तर पर आज के आन्दोलन उन्हीं की राह पर किये जा रहे हैं। अहिंसा का समावेश होते ही महिलाओं की संख्या आन्दोलनों में बढ़ने लगी और अब तो वे दुनिया भर में आन्दोलनों का नेतृत्व कर रही हैं।

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