आम्बेडकर को भी अप्रासंगिक बना देते हैं गुहा के आरोप

राहुल गांधी के खिलाफ इतिहासकार की दलील में ऐतिहासिक जवाबदेही और वंशानुगत अपराधबोध के आपसी घालमेल का जोखिम है।

आम्बेडकर को भी अप्रासंगिक बना देते हैं गुहा के आरोप
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महात्मा गांधी ने 15 नवंबर 1947 को हिन्दू महासभा से एक सीधा सवाल किया था। महासभा ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस ने अपनी आत्मा मुसलमानों के आगे गिरवी रख दी है, कि गांधी विफल हो चुके हैं और नेहरू की स्थिति भी उनसे कोई बहुत अलग नहीं, कि पटेल के अंदर का एक हिस्सा तो पक्का हिन्दू है, लेकिन आखिर वह भी तो ठहरे कांग्रेसी ही! इन आरोपों के संदर्भ में गांधी ने सवाल किया थाः ‘हिन्दू महासभा में ऐसा कौन है जो कांग्रेस नेतृत्व की जगह ले सकता है?’

साथ ही गांधी ने नेहरू के बारे में लिखा, ‘उन्हीं की वजह से आज दुनिया में हमारी बहुत इज्जत है। भारत के बाहर उन्हें दुनिया के सबसे महान राजनेताओं में से एक माना जाता है। कई यूरोपियनों ने मुझसे कहा है कि दुनिया ने ऐसा ऊंचे विचारों वाला नेता नहीं देखा। मैं ऐसे अमेरिकियों को जानता हूं जो राष्ट्रपति ट्रूमैन से ज्यादा जवाहरलाल की इज्जत करते थे। यहां तक कि जिनके पास अपार धन-दौलत, विशाल सेनाएं और परमाणु बम हैं, वे भी जवाहरलाल के नेतृत्व की नैतिक कीमत का सम्मान करते हैं। भारत में हमें भी इसकी सही कद्र करनी चाहिए।’

जिस तरह हिन्दू महासभा ने 1947 में कांग्रेस, गांधी, नेहरू और सरदार पटेल को भारत का नेतृत्व करने के लिए अयोग्य बताया था, ठीक वैसी ही सोच राम गुहा के उस विश्लेषण में भी दिखती है जिसमें उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी को मोदी सरकार और बीजेपी का मुकाबला करने में अक्षम बताया है।

गुहा ने अपने हालिया लेख ‘हाउ द गांधी फैमिली हैज हेल्प्ड मोदी कंसोलिडेट पावर’ (गांधी परिवार ने मोदी को सत्ता मजबूत करने में कैसे मदद की) में कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ अपने रुख के समर्थन में जो तर्क दिए हैं, वे एकदम पिलपिले हैं। क्योंकि कांग्रेस और नेहरू के संदर्भ में महात्मा गांधी की यह बात कि ‘हमें भारत में इसकी कद्र करनी चाहिए’, 2026 में कांग्रेस और राहुल गांधी के संदर्भ में भी लागू होती है।

यह बात काफी हैरान करने वाली है कि रामचंद्र गुहा जैसे बड़े इतिहासकार इस बात का विरोध करते हैं कि प्रियंका गांधी संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर बोलें, सिर्फ इसलिए कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई थी! किसी व्यक्ति की पहचान उसके पूर्वजों के कामों से कैसे तय की जा सकती है?


इसी तर्क से, गुहा यह भी सवाल कर सकते हैं कि आजाद भारत का संविधान बनाने में आम्बेडकर की भूमिका कैसे हो सकती है, जबकि उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले आजादी के आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया और गांधी की तीखी आलोचना की थी। या फिर यह सवाल भी उठ सकता है कि जवाहरलाल नेहरू ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की बात ही कैसे उठाई जबकि उनके पिता मोतीलाल नेहरू- जो ‘नेहरू रिपोर्ट’ के लेखकों में से एक थे- ने तो हमारे देश के लिए सिर्फ ‘डोमिनियन स्टेटस’ (अधिराज्य के दर्जे) की मांग की थी?

सबसे पहले, इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगाने के उनके फैसले के लिए जिम्मेदार ठहराया गया और उन्होंने अपने फैसले के लिए माफी भी मांगी। और फिर, गुहा जैसे उच्चस्तरीय शिक्षाविद का इंदिरा गांधी के किसी काम की जिम्मेदारी प्रियंका या किसी और पर डालना बेहद अजीब बात है।

उनके इस अजीब तर्क कि ‘कांग्रेस एक ऐसी पारिवारिक कंपनी बनी हुई है, जिसका नेतृत्व एक ऐसा व्यक्ति कर रहा है जिसमें न अनुशासन या गंभीरता है और न ही उनका बायोडाटा उतना स्मृद्ध है’, में गंभीर तर्क की कमी है और ऐसा लगता है कि यह बिना सोचे-समझे कही गई ऐसी बात है जिसकी उम्मीद इतने बड़े लेखक से नहीं की जा सकती थी।

साफ तौर पर यह चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने जैसा लगता है। इसमें बीजेपी समेत तमाम दूसरे राजनीतिक दलों को नजरअंदाज कर दिया जाता है जिनके लिए ‘पारिवारिक कंपनी’ वाली बात उनके अस्तित्व और राजनीतिक सोच का अहम हिस्सा रही है।

राहुल गांधी की गंभीरता और उनके काम-काज के अनुभव पर सवाल उठाकर गुहा ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए राहुल के कड़े संघर्ष को कम करके आंका है जबकि गुहा खुद भी मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की वजह से यह लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है। सच तो यह है कि राहुल बीजेपी-आरएसएस के खिलाफ वैचारिक लड़ाई को मजबूत करके कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने में जुटे हैं। 

अमेरिकी इतिहास के प्रोफेसर टिमोथी स्नाइडर ने 2017 की अपनी किताब ‘ऑन टायरनी: ट्वेंटी लेसन्स फ्रॉम द ट्वेंटिएथ सेंचुरी’ में लिखा हैः ‘तानाशाह आपको फंसाने के लिए कोई बहाना या मौका ढूंढते हैं। कोशिश करें कि उन्हें ऐसा कोई मौका न मिले।’


बीजेपी लगातार राहुल गांधी को फंसाने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढ रही है और उनकी गलतियों (अगर कोई हों) पर नजर रखे हुए है। 2019 में उनके खिलाफ मानहानि का केस दर्ज हुआ था, जिसमें सूरत की मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया और बाद में उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म कर दी गई। यह साफ तौर पर उन्हें फंसाने के लिए की गई एक बेचैन लेकिन सोची-समझी कोशिश थी।

ऐसा कैसे हुआ कि ख्यातिलब्ध गुहा, ‘वी द पीपल ऑफ इंडिया’ के सामने राहुल को बदनाम करने के ‘तानाशाह’ के इरादे को नजरअंदाज कर देते हैं? इसलिए नहीं कि राहुल में गंभीरता नहीं या कि उनके बायोडाटा में कोई कमी है, बल्कि इसलिए कि वह बीजेपी और हिन्दुत्व ताकतों के लिए एक बड़ा वैचारिक खतरा हैं।

गुहा ने अपने लेख में लिखा हैः ‘यहां तक ​​कि जब वह कोई जरूरी मुद्दा उठाते हैं, जैसे कि चुनाव आयोग का पक्षपातपूर्ण व्यवहार, तो भी वह शायद ही निरंतरता के साथ ऐसा करते हैं। हम उन्हें ‘वोट चोरी’ पर कभी-कभार प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए देखते हैं, जिसके बाद वह यूरोप या लैटिन अमेरिका की यात्रा पर निकल जाते हैं।’

इस तरह की बातें राहुल और कांग्रेस टीम की उस कड़ी मेहनत को पूरी तरह नजरअंदाज करती हैं, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग से मिले लाखों पन्नों का अध्ययन किया और बीजेपी के लिए वोट चुराने की उसकी सोची-समझी रणनीति का पर्दाफाश किया। बिहार में उनकी ‘वोट अधिकार रैली’ भारत में अपनी तरह की पहली रैली थी, जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के समर्थन में थी। यह रैली दक्षिण अफ्रीका के नटाल प्रांत में स्थानीय भारतीयों से वोट का अधिकार छीनने के खिलाफ 1894 में महात्मा गांधी के संघर्ष की याद दिलाती थी। राहुल ने जो किया, उसे कई पार्टियों ने अपनाया है; इसलिए यह कहना गलत होगा कि वह इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ा पाए।

भारत की आजादी की लड़ाई पर एक नजर डालने से पता चलता है कि 1930 में अपनी ऐतिहासिक दांडी यात्रा के बाद, महात्मा गांधी ने 12 साल के अंतराल के बाद 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया था। क्या गांधी जी पर ब्रिटिश राज के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी न रखने का आरोप लगाया जा सकता है, क्योंकि दांडी यात्रा और भारत छोड़ो आंदोलन के बीच 12 साल का अंतर था?


बेहतर होता अगर गुहा इतिहास की अपनी गहरी समझ के आधार पर प्रधानमंत्री मोदी की पोल खोलने वाला कोई विस्तृत लेख लिखते, जिन्होंने तब एक शब्द भी नहीं कहा था जब वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ की वजह से लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था; जबकि इसके उलट, राहुल ने ‘वोट चोरी’ के खिलाफ एक जबरदस्त मुहिम छेड़ी थी, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी।

इसके बजाय, कांग्रेस और राहुल गांधी पर गुहा की आलोचना में उस गहराई और सावधानीपूर्वक विश्लेषण की कमी है, जिसकी उम्मीद एक मझे हुए इतिहासकार से की जाती है।

(लेखक एस.एन. साहू पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं। ये उनके अपने विचार हैं)