आकार पटेल का लेख: एनजीओ का गला नहीं घोंटा होता सरकार ने, तो कोरोना की लहर में शायद बच सकती थीं बहुत सी जानें

जब कोरोना की दूसरी लहर ने धावा बोला तो तमाम एनजीओ लोगों की मदद करना चाहते थे, लेकिन सरकार के नए नियमों ने उनके हाथ बांध दिए थे। ऐसे में वे जरूरतमंद लोगों के लिए, खासतौर से गांवों में ऑक्सीजन सिलेंडर और कंसंट्रेटर नहीं पहुंचा पाए।

प्रतीकात्मक फोटो
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आकार पटेल

कुछ लोग समझ चुके हैं कि नीति आयोग क्या है और क्या करता है, लेकिन इसके मुखिया अमिताभ कांत ने हाल में इस बात पर अपने विचार रखे कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को कैसे और सुगम बनाया जा सकता है। उनका जवाब था कि, ‘सिंगल विंडो क्लीयरेंस यानी एक ही जगह से सारी औपचारिकताएं पूरी हों और जमीन अधिग्रहण को आसान बनाया जाए।’ कांत ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य जैसे सामाजिक ढांचे में प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप यानी सरकारी और निजी भागीदारी से निवेश किया जाना जरूरी है।

निस्संदेह ऐसे करना जरूरी है क्योंकि बीते 5 साल में रोजगार से लगे लोगों की संख्या में भारी कमी आई है, जबकि इस दौरान आबादी बढ़ी है। मैं ऐसे ही एक सेक्टर यानी क्षेत्र के बारे में बात करूंगा जिसे मैं बेहतर तरीके से समझता हूं।

अमेरिका में एनजीओ यानी गैर सरकारी संगठन कार्यबल का तीसरा सबसे बड़ा जरिया हैं। वहां रिटेल और मैन्यूफैक्चरिंग में एनजीओ सेक्टर से अधिक लोग काम करते हैं। अमेरिका के कुल 50 राज्यों में से 24 में एनजीओ में उतने लोग काम करते हैं जितना की मैन्यूफैक्चरिंग की सभी शाखाओं को मिलाकर भी नहीं करते। ऐसा ही यूनाइटेड किंगडम में है। यूरोप में सभी नौकरियों का 13 फीसदी एनजीओ सेक्टर में है इनकी संख्या करीब 2.8 करोड़ है। इन आंकड़ों को करीने से रखें तो साफ होता है कि भारत के औपचारिक क्षेत्र में सभी नौकिरियों का 10 फीसदी भी नहीं है।

अब देखते हैं कि मोदी सरकार ने किस तरह निजी क्षेत्र के एनजीओ सेक्टर के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ाया है। 2020 में मोदी सरकार ने आदेश दिया है कि एनजीओ अभी तक जिस तरह से भारत में काम करते रहे हैं उसे बदलना होगा। पहला बदलाव यह किया गया कि देश में काम करने वाले करीब 23000 एनजीओ को विदेशों से जो फंडिंग मिलती है उसे स्टेट बैंक की सिर्फ नई दिल्ली में संसद मार्ग स्थित शाखा में ही जमा करना होगा। यहां ध्यान देना होगा कि दिल्ली में सिर्फ 1488 एनजीओ ही रजिस्टर्ड हैं, ऐसे में बाकी एनजीओ को अपना खाता खोलने और उसे चलाने के लिए दिल्ली आना होगा, वह भी कोविड के दौर में। किसी और निजी क्षेत्र को ऐसा करने केलिए नहीं कहा गया और कार्पोरेट्स को विदेशों से मिला पैसा किसी भी बैंक की किसी भी ब्रांच में रखने की इजाजत है।

देश में काम कर रहे 46 फीसदी से ज्यादा एनजीओ को 2018-19 में विदेशों से कोई फंड नहीं मिला, हालांकि उनके पास एफसीआरए लाइसेंस था। इसके अलावा 41 फीसदी एनजीओ को एक करोड़ से कम फंड मिला।


एनजीओ के लिए दूसरा बदलाव यह किया गया कि एनजीओ उनको मिले पैसे का सिर्फ 20 फीसदी ही शासनात्मक खर्च या एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस की मद में खर्च कर सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है कि वेतन, यात्रा खर्च, प्रोफेशनल की फीस, बिजली-पानी जैसे इस्तेमाल होने वाली सुविधा, टेलीफोन, पोस्टल और कोरियर चार्ज, दफ्तर की मरम्मत, स्टेशनरी और प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्ट, फंड के रखरखाव का काम, इस्तेमाल होने वाले वाहनों का रखरखाव और मरम्मत, रिपोर्ट तैयार करने और उन्हें फाइल करने का खर्च. कानूनी और अन्य फीस, किराया आदि ऐसे मद हैं जिन्हें एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस माना गया है। इन सब चीजों पर कुल मिले फंड का 20 फीसदी से अधिक नहीं खर्च हो सकता। ऐसा कोई आदेश किसी अन्य कार्पोरेट या निजी क्षेत्र के लिए जारी नहीं किया गया।

तीसरा नियम जो एनजीओ के लिए बनाया गया वह यह है कि कोई भी एनजीओ पने फंड को किसी और छोटे एनजीओ को नहीं दे सकता, जबकि ऐसे छोटे एनजीओ जमीनी स्तर पर फील्ड वर्क करते हैं और उन्हें पैसा नहीं मिल पाता है। इससे एनजीओ सेक्टर को तगड़ा झटका लगा है क्योंकि एनजीओ एक दूसरे से होड़ नहीं लेते हैं जैसा कि कार्पोरेट सेक्टर में होता है। अशोका यूनिवर्सिटी के एक अध्य्यन के मुताबिक छोटे एनजीओ जिन्हें बड़े एनजीओ से पैसा मिलता है उन्हें 2018-19 में सिर्फ 7.6 लाख रुपए या कम पैसे ही मिले हैं। और अब उन्हें इतने पैसे भी नहीं मिलेंगे।

और भी कुछ बदलाव किए गए हैं, लेकिन उन्हें फिलहाल छोड़ देते हैं। जब देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने धावा बोला तो मोदी सरकार ने इन्हीं एनजीओ से मदद की गुहार की। बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में ऐसे 10 एनजीओ से बात की, और उनका कहना था कि सरकार के नए नियमों के चलते उन्हें लोगों की मदद करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। नए नियमों के चलते अस्पताल और धर्मार्थ चलने वाले ट्रस्ट विदेशी दानदाताओँ से मदद नहीं ले पाए। इसके कारण जरूरतमंद लोगों के लिए, खासतौर से गांवों में ऑक्सीजन सिलेंडर और कंसंट्रेटर खरीदने में दिक्कतें आईं। एक ऐसे अस्पताल में जहां ऑक्सीजन की कमी से कम से कम दो दर्जन लोगों की मौत हुई, वह इन नियमों के चलते विदेशी दानदाताओं की मदद से ऑक्सीजन प्लांट नहीं लगा सका।

यहां तक कि दवाएं और अन्य मेडिकल उपकरण भी नए एफसीआरए नियम या एनजीओ नियमों के तहत खरीदने की छूट नहीं थी। इतना ही नहीं एफसीआरए कानून के मुताबिक विदेशों से मिले पैसे का इस्तेमाल सिर्फ उसी उद्देश्य के लिए हो सकता है जो किसी एनजीओ ने एफसीआरए पंजीकरण के वक्त लिखा है। यानी अगर कोई एनजीओ शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए एफसीआरए रजिस्ट्रेशन कराता है तो वह जरूरत के बावजूद मेडिकल उपकरण आदि नहीं खरीद सकता। एक बार फिर कहना पड़ेगा कि इस किस्म के प्रतिबंध किसी अन्य सेक्टर और कार्पोरेट पर लागू नहीं किए गए हैं।


अगर सरकार चाहती है कि भारत में काम करने वाले एनजीओ की मुश्किलें कम हो तो इसका एक ही तरीका है कि वह इनके लिए नियमों को थोड़ा लचीला बनाए और इन्हें भी उसी तरह आजादी से काम करने दे जिस तरह अन्य निजी क्षेत्र और कार्पोरेट को दी गई है। इसके अलावा इसे अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम और यूरोप में देखना चाहिए कि कैसे एक मजबूत एनजीओ सेक्टर ने वहां कि अर्थव्यवस्था में योगदान दिया है और समाज की मदद के साथ-साथ रोजगार भी उपलब्ध कराए हैं।

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