क्या नरेंद्र मोदी अब 'चुक' गये हैं?

घने बजने वाले थोथे चने की राह चलकर अनुप्रासों की बिना पर मोदी ने देशवासियों में जो उम्मीदें व सपने जगाए थे, आज उनके ध्वंसावशेषों पर खड़े होकर उनके लिए खुद को बदल या कुछ नया कर पाना आसान है क्या? और नहीं है तो चुक जाना ही तो उनकी नियति है।

कोलकाता में एक चुनावी रैली के बाद पीएम नरेंद्र मोदी का कटआउट ले जाते लोग (फोटो: Getty Images)
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कृष्ण प्रताप सिंह

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब 'चुक' गये हैं और उनके पास देश के लिए कोई नया 'सपना' (पढ़िये : सब्जबाग) नहीं बचा है? यह सवाल बीते शनिवार को राष्ट्र के नाम उनके सम्बोधन के वक्त तब बार-बार कौंधा, जब वे अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष को नाहक कोसने और एक प्रेक्षक के शब्दों में कहें तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के सिलसिले में लागू आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करके सरकारी खर्चे पर चुनावी भाषण करने लगे। 

अति हो गई तो पत्नी ने खीझकर यह कहते हुए टीवी ही बंद कर दिया कि अब तो ये जब भी आते हैं, पकाने लग जाते हैं। फिर तो अपनी जानकारी के लिए मुझे उनका सम्बोधन मोबाइल पर देखना व सुनना पड़ा। इस दु:ख से गुजरते हुए कि इस सम्बोधन के साथ ही वे देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गये हैं, जिसने विपक्ष की निन्दा करने के लिए राष्ट्र को सम्बोधित किया और उसमें सत्य व तथ्य से परे बे-सिर-पैर की बातें करते और अपनी पुरानी तोता रटंतें दोहराते रहे।

मुझे याद आया, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह कहकर कि 'जादूगर को पकड़ लिया गया है ', प्रधानमंत्री पर तंज किया तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह उससे जुड़े मुद्दों पर बात करने के बजाय तमककर उसे 'देश की जनता का अपमान' बताने लगे थे! शायद इसलिए कि इससे इन्कार नहीं कर सकते थे कि समय के साथ इस जादूगर के कई झूठ पकड़े और कई लफ्फाजियों के ढोल भी फोड़े जा चुके हैं।

बहरहाल, मोदी के 'चुक' जाने को राष्ट्र के नाम उनके सम्बोधनों और चुनावी भाषणों में ही नहीं, लाल किले से दिये जाने वाले स्वतंत्रता दिवस के सम्बोधनों और आकाशवाणी से प्रसारित उनकी ‘मन की बात’ में भी देखा जा सकता है। हां, संसद में दिए भाषणों में भी, जिनमें इसके बावजूद कोई नयापन नजर नहीं आता कि गत लोकसभा चुनाव में उनकी घटी हुई शक्ति ने उनके समक्ष सर्वथा नई परिस्थिति पैदा कर रखी है। क्या आश्चर्य कि जिस 'मन की बात' का आकाशवाणी ने कभी जोर-शोर से आगाज किया था, अब उसे उसके अलावा कोई और निरपेक्ष शोध या विश्लेषण संस्थान लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम नहीं मानता।

यह और बात है कि मीडिया के मोदी समर्थक हिस्से की उनका 'चुक जाना' छिपाने की कवायदें अभी भी  धीमी नहीं पड़ी हैं। वह उनके चुक जाने को इस रूप में प्रस्तुत करता है कि गत लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के अकेले अपने बूते बहुमत गंवा देने के बाद के विपरीत हालात में भी वे अपनी पुरानी रीति-नीति पर ‘दृढ़’ हैं। लेकिन उनसे असहमत हिस्से का साफ मानना है कि ऐसा इसलिए है कि अब उनके पास दिखाने को कोई नई ‘कला’ बची ही नहीं है और मजबूरी ऐसी है कि वे वक्त की नजाकत के अनुसार ‘बदल’ भी नहीं पा रहे। इस सिलसिले में उनकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अपनी कट्टरताओं व संकीर्णताओं के कठघरे में बंद होकर उन्होंने खुद अपनी सीमा तय कर ली है, जिसका अतिक्रमण करने में वे सर्वथा असमर्थ हो चले हैं।


किसे नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की अपनी कवायद के दिनों में देश की अनेक जटिल समस्याओं का ‘इंस्टैंट’ समाधान(?) सुझाने की  उनकी बनाई  हड़बोंग वाली ‘परंपरा’ अब पुरानी बातों के दोहराव या सब कुछ सुनकर भी कुछ नहीं सुनने और सब कुछ देखकर भी कुछ नहीं देखने वाली रूढ़ि में बदल गई है? इतना ही नहीं, असुविधाजनक सवालों से बचकर निकलने के लिए विपक्षी दलों पर बरसने लग जाने की ‘कला’ भी अब पुरानी पड़कर उनके चुकने की ही मुनादी करने लगी है। 

इसके बावजूद कि वे उसके ‘संरक्षण’ के लिए लोकतांत्रिक व संसदीय परंपराओं व मर्यादाओं के विसर्जन तक से परहेज नहीं करते और यह समझने से लगातार इनकार करते रहते हैं कि देशवासियों ने अपने जिस आदेश ने उन्हें सत्ता के संचालन का अधिकार दिया, उसी में विपक्ष को मजबूत करके उन्हें कठघरे में खड़ा करने का अधिकार भी दिया है। उनके कांग्रेसमुक्त (पढ़िए : विपक्षमुक्त) भारत के आह्वान को पूरी तरह ठुकरा करके।

करें भी  क्या, उनकी उस वक्तृत्व शैली की पोल भी अब खुल गई है, जिसके  तहत वे जब भी उनका मन होता था, अनेकानेक असली-नकली व दृश्य-अदृश्य शत्रुओं को ललकारते हुए फब्तियों, तानों, छींटाकशियों, छिछोरेपनों, गलतबयानियों, अर्धसत्यों और लफ्फाजियों के सहारे तथ्यों की पवित्रता से खेल करके लंबे-लंबे निंदात्मक भाषण दे दिया करते अन्यथा राष्ट्रीय संकट की घड़ियों में भी एक चुप हजार चुप साधे रहकर देशवासियों को अनाश्वस्त छोड़े रखते थे।

उन्हें धैर्यपूर्वक सुनने वाले जानते हैं कि अब उनके वे अनुप्रास भी चुक गए हैं, जिनकी बिना पर कभी वे अपने भाषणों को चमत्कारिक बना डालते थे- भले ही वे अनुप्रास ‘टोस्ट टी एंड टुबैको टुगेदर विद टेरेलिन ट्रांजिस्टर टेलीविजन टाॅपलेस टियरलेस टेरर ऐंड टंकार ऑफ टाटा टेक टू टेन ऐंड ट्वैंटी ट्विस्ट’ जैसे निरर्थक ओर बेहिस हों!

बहुत संभव है कि अपने ऐसे कई पुराने अनुप्रास अब उन्हें याद भी न हों, लेकिन एक समय हिंदी या अंग्रेजी के एक ही अक्षर से शुरू होने वाले कई-कई शब्दों के घालमेल से चमत्कारिक अनुप्रास बनाने और लोगों को उनमें उलझाने की उनकी महारत से कोई इनकार नहीं करता था।

शुरू में वे ‘ब्रांड इंडिया’ की बात कहते हुए भी सुनने वालों पर ‘फाइव टी’ (टैलेंट, ट्रेडीशन, टूरिज्म, ट्रेड और टेक्नोलॉजी) जैसे  अनुप्रास दे मारते थे। तब उनके भक्त कहते थे कि पहली बार देश को ऐसा ‘बोलता प्रधानमंत्री’ मिला है, जिसने अपने पहले कार्यकाल में ही इतने अनुप्रास दे डाले हैं, जितने कवि-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नहीं दिए थे।

अलबत्ता, विरोधियों की राय तब भी इसके उलट थी। उनके अनुसार दूसरे प्रधानमंत्रियों की तरह अटल भी जानते थे कि देश की समस्याएं तुक्कड़ कवियों की शैली में गढ़े गए ऐसे अनुप्रासों की मार्फत ‘सरलीकृत’ करके नहीं सुलझाई जा सकतीं और वास्तविक समाधान के लिए उनकी गंभीर आर्थिक, सामाजिक व कभी-कभी दार्शनिक मीमांसाओं की भी जरूरत पड़ती है।

फिर भी मोदी अपने भाषणों में अनुप्रासों की झड़ी लगाते रहते थे. कभी चमत्कार पैदा करने के लिए तो कभी अपनी ‘बौद्धिकता’ का लोहा मनवाने के लिए। इसके लिए उन्हें बार-बार संदर्भ बदलकर अलंकारिकता का द्रविड़ प्राणायाम करने से भी परहेज नहीं था।


2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान उन्होंने ऐसा ही प्राणायाम करते हुए तीन एके का हवाला दिया और कहा था: पाकिस्तान में तीन एके की बहुत प्रशंसा होती है- एक एके-47, दूसरा एके-एंटनी और तीसरा एके-49।

ज्ञातव्य है कि एके एंटनी तब देश के रक्षामंत्री थे और एके-49 से मोदी का मतलब 49 दिनों में ही दिल्ली के मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ देने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से था।

फिर अपनी सरकार बनने के सौ दिन पूरे होने के पहले ही वे जापान गए तो ‘थ्री डी’ के साथ भी इस ‘एके’ जैसा ही सलूक किया था। जिस ‘थ्री डी’ से कभी हमारा पहला परिचय त्रिआयामी फिल्मों ने कराया था और हम जिनके सिलसिले में उसे इस्तेमाल करते आ रहे थे, उससे बहुत दूर ले जाकर दूर की कौड़ी ले आए थे वे : थ्री डी यानी डेमोग्राफिक डिवीडेंड, डेमोक्रेसी और डिमांड। उन्होंने कहा था कि ये तीनों भारत में हैं और एशिया में केवल भारत में ही हैं।

फिर नेपाल यात्रा के वक्त उनके पास उसकी मदद का ‘नाम में भी हिट, और काम में भी हिट’ फार्मूला था : हिट यानी हाइवेज़, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और ट्रांसमिशन लाइंस। लेकिन जब वहां भीषण भूकंप आया तो उन्हें इसकी याद नहीं आई थी!

उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले जिस एफडीआई का उनकी पार्टी प्राण प्रण से विरोध करती थी, प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने भी नहीं हुए थे कि उनके एक लाजवाब अनुप्रास ने उसका अर्थ बदलकर फारेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट से ‘फर्स्ट डेवलप इंडिया’ कर दिया था! तब लोग समझ नहीं पाए थे कि इसे गजब का अनुप्रास कहें या अनुप्रास का ढाया गजब!

लेकिन ऐसे गजब ढाते-ढाते अब वे उस मुकाम पर आ पहुंचे हैं, जहां ढाने के लिए नए गजबों का भी टोटा महसूस करने लगें। इसे यों समझ सकते हैं कि अपनी पहली सरकार के पहले बजट की प्रशंसा करते हुए उन्होंने ‘थ्री एस’ अनुप्रास गढ़ा था, जिसका भाष्य था : समावेशक, सर्वदेशक और सर्वदर्शी।  लेकिन अब बजट आते हैं तो वे, कहें कुछ भी, इस ‘संकट’ से रूबरू हो जाते हैं कि ऐसा कौन-सा नया अनुप्रास गढ़ें और कैसे? कब तक अनुप्रास गढ़-गढ़कर जमीनी हकीकतों को झुठलाएं और कैसे झुठलाएं?

इतना ही नहीं, कैसे याद रखें कि कभी उन्होंने देशवासियों को चीन से प्रतियोगिता के लिए भी ‘थ्री एस’ का मंत्र दिया था- स्किल, स्केल और स्पीड। चीन के राष्ट्रपति भारत यात्रा पर आए तो उनके साथ झूला-झूलते हुए नया अनुप्रास बुदबुदाए थे : इंचमाइल्स यानी इंडो चाइना मिलेनियम ऑफ एक्सेप्शनल सिनर्जी। लेकिन अनुप्रास पुराने भी पड़ गए और चुक भी गए और हकीकत नहीं बदली।

तब भी नहीं, जब उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों के पीपीपी (प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप) में एक और पी जोड़कर उसे फोर पी (पीपुल प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप) बना डाला और लेह व लद्दाख के लिए ‘थ्री पी’ (प्रकाश, पर्यावरण और पर्यटन) का अनुप्रास ईजाद किया। साथ ही वस्त्र उद्योग के लिए ‘फाइव एफ’ का तुरत-फुरत मंत्र ले आए, जिसकी लय भी सुनने में बहुत मजेदार है : फार्म से फाइबर, फाइबर से फैब्रिक, फैब्रिक से फैशन और फैशन से फारेन! यानी सारी समस्याएं चुटकियों में हल!!


बहरहाल, इस 'हल' के साथ लगे हाथ उनके कुछ और पुराने अनुप्रास जान लीजिए: पी.टू.जी.टू. यानी प्रो पीपल गुड गवर्नेंस, रेड टेप नहीं रेड कारपेट, स्कैम इंडिया से स्किल इंडिया, एक्ट ईस्ट, सबका साथ और सबका विकास, पहले शौचालय, फिर देवालय और ऐक्ट नहीं ऐक्शन! अकारण नहीं कि अब उनके कई पुराने अनुप्रास बादलों की तरह फटकर उन पर ही गाज गिराने लगे हैं. खासकर, ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ वाला।

ऐसे में सोचिए कि घने बजने वाले थोथे चने की राह चलकर इन अनुप्रासों की बिना पर उन्होंने देशवासियों में जो उम्मीदें व सपने जगाए थे, आज उनके ध्वंसावशेषों पर खड़े होकर उनके लिए खुद को बदल या कुछ नया कर पाना आसान है क्या? और नहीं है तो चुक जाना ही तो उनकी नियति है।

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