राम पुनियानी का लेखः विवेकानंद का हिन्दू धर्म प्रेम और मानवता से परिपूर्ण, धर्म में राजनीति के घालमेल के खिलाफ थे

स्वामी विवेकानंद हिन्दू धर्म के राजनीति के साथ घालमेल के सख्त विरोधी थे। जहां हिन्दू धर्म का राजनीति से मिश्रण ‘दूसरों से नफरत करो’ के सिद्धांत पर आधारित था, वहीं विवेकानंद का हिन्दू धर्म प्रेम से परिपूर्ण था और विभिन्न धर्मों की एकता की बात करता था।

फोटोः Wikicommons
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राम पुनियानी

एक दिन पहले 12 जनवरी को हमने स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन मनाया। इस भगवाधारी सन्यासी ने हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर जोर दिया और भारतीय संस्कृति के विविधता और सामंजस्य पर आधारित मूल्यों से हमें परिचित करवाया। उन्होंने जो कुछ कहा और लिखा वह बहुत आश्वस्त करने वाला है। विशेषकर वर्तमान समय में जब हिन्दू धर्म के नाम पर अनेकानेक भगवाधारी नफरत फैला रहे हैं और हिंसा भड़का रहे हैं। विवेकानंद एक महान व्यक्ति थे जिन्होंने दुनिया को यह बताया कि मानवता और प्रेम, हिन्दू धर्म के मूलतत्व हैं। शिकागो में उनका भाषण धर्म के इतिहास में एक मील का पत्थर था।

विवेकानंद का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव इसलिए पड़ा क्योंकि वे हिन्दू धर्म के मानवीय मूल्यों को सामने रखते हुए भी इस धर्म में व्याप्त अमानवीय कुप्रथाओं की खुलकर आलोचना भी करते थे। सुनील खिलनानी (‘इनकारनेशन्स’ पृष्ठ 305) विवेकानंद को उद्धत करते हुए कहते हैं कि ‘‘पृथ्वी पर ऐसा कोई अन्य धर्म नहीं है जो मानवता की गरिमा को इतना उच्च दर्जा देता हो जितना कि हिन्दू धर्म देता है और पृथ्वी पर ऐसा कोई अन्य धर्म नहीं है जो निर्धनों और दमितों की गर्दन उस तरह दबाता हो जिस तरह हिन्दू धर्म दबाता है”। उनकी दृष्टि में निर्धनता और जाति प्रथा अभिशाप हैं जिनका उन्मूलन परम आवश्यक है। वे निर्धन व्यक्ति में ईश्वर को देखते थे (दरिद्रनारायण)। निर्धनता का उन्मूलन और अछूतों को गरिमापूर्ण जीवन देना उनके सबसे प्रमुख सरोकार थे।

वे ऐसा नहीं मानते थे कि विभिन्न धर्म एक-दूसरे के शत्रु या प्रतिस्पर्धी हैं। उन्होंने ध्यान की परंपरा को बौद्ध धर्म से ग्रहण किया था। उनके लिए ज्ञान भौगोलिक सीमाओं से बंधा हुआ नहीं था और पश्चिम का विज्ञान और तार्किकता पर आधारित वहां का दर्शन उनके लिए उतना ही स्वीकार्य और सम्मान का पात्र था जितना कि भारतीय और हिन्दू दर्शन। वे अमरीकी समाज सुधारकों की संगठनात्मक उर्जा के भी प्रशंसक थे। वे मानव परंपराओं में जो कुछ सर्वोत्तम था उसे अपनाने के हामी थे, चाहे वह भारतीय हो या ‘विदेशी’। वे तार्किकता और सामाजिक क्रांतिधर्मिता के समर्थक थे। वे न केवल इनमें विश्वास रखते थे बल्कि इनका आचरण भी करते थे। जहां हम मंदिर और मूर्तियां बनाने में जुटे हुए हैं वहीं वे ब्रम्हो समाज की शिक्षाओं के अनुरूप मूर्ति पूजा के खिलाफ थे।

वे हिन्दू धर्म के राजनीति के साथ घालमेल के सख्त विरोधी थे। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की थी और वे जानते थे कि भारत की सांझा संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं। जहां हिन्दू धर्म का राजनीति से मिश्रण ‘दूसरों से नफरत करो’ के सिद्धांत पर आधारित था, वहीं विवेकानंद का हिन्दू धर्म प्रेम से परिपूर्ण था और विभिन्न धर्मों की एकता की बात करता था। समाज में धर्म के नाम पर व्याप्त अवांछित प्रथाओं और रस्मों-रिवाजों का विरोध करते हुए वे तार्किकता पर आधारित सोच के पौरोकार थे जो अंधश्रद्धा और पुरोहितों के फरमानों के खिलाफ थी।


आज देश में लव जिहाद की बात की जा रही है जो महिलाओं को नियंत्रित करने का एक अस्त्र है। वे महिलाओं की स्वतंत्रता के हामी थे। जहां आज हमसे यह कहा जा रहा है कि हम किसानों के आंदोलन को नीची निगाहों से देखें वहीं विवेकानंद यह मानते थे कि अपने सांझा हितों की रक्षा के लिए लोगों का गोलबंद होना उनके हालात में बेहतरी लाता है, जैसा कि अमेरिका में श्रमिकों के मामले में हुआ।

आज भारत में इस्लाम और मुसलमानों के बारे में सामूहिक सामाजिक सोच को विषाक्त बना दिया गया है। ऐसे माहौल में भारत की विविधिता की विवेकानंद की समझ, हवा के ताजा झोंके के समान है। वे समाज में सौहार्द को बढ़ावा देने के पक्ष में थे। वे मुसलमानों को ऐसे विदेशियों के रूप में नहीं देखते थे जिन्होंने भारतीय संस्कृति पर हमला किया। वे कहते थे, “हमारी मातृभूमि वह भूमि है, जिसमें दो महान परंपराओं- हिन्दू धर्म और इस्लाम का संगम हुआ है। वेदों को इस भूमि की बुद्धि और इस्लाम को उसका शरीर बना दो। मैं इसी तरह के एक भारत का स्वप्न देखता हूं”।

जहां आज हम धर्म के नाम पर हिंसा और नफरत का तांडव देख रहे हैं वहीं विवेकानंद ईश्वर को एक मानते थे। “मैं बार-बार जन्म लूं और हजारों कष्ट भोगूं ताकि मैं उस एकमात्र ईश्वर की आराधना कर सकूं जिसका अस्तित्व है, उस एकमात्र ईश्वर की जिसमें मैं आस्था रखता हूं और जो सभी आत्माओं का योग है- सभी नस्लों और सभी जातियों के दुखियों और गरीबों की आत्माओं का।”

इस समय जाति प्रथा के मूल स्त्रोत पर पर्दा डालने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। परंतु विवेकानंद ने लिखा था, “मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्राचीनकाल में इस देश में जाति वंशानुगत थी और इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि शूद्रों का दमन किया जाता था”।


उनके लिए कई धर्मों का अस्तित्व कोई बाधा नहीं थी। वे धर्मों को स्वतंत्रता हासिल करने और दुःखों का अंत करने के मार्ग के रूप में देखते थे। हरेक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपनी पसंद के मार्ग पर चले। परन्तु वह अन्य धर्मों के प्रति सम्मान का भाव रखे। आज जब पूरी दुनिया में इस्लामोफोबिया का बोलबाला है और हमारे देश में भी इस्लाम और मुसलमानों से नफरत करने वालों की कमी नहीं है तब हमें इस महान संत की यह बात याद आती है कि “अगर कोई धर्म समानता के नजदीक पहुंचा है तो वह इस्लाम और केवल इस्लाम है”।

वर्तमान में समाज की ऊर्जा धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने में व्यय की जा रही है। मुसलमानों पर तलवार की नोंक पर इस्लाम का प्रसार करने का आरोप लगाया जा रहा है और ईसाईयों के बारे में कहा जा रहा है कि वे धोखाधड़ी और लोभ-लालच के जरिए लोगों को ईसाई बना रहे हैं। स्वामी विवेकानंद ने अपने दो पत्रों (खेतरी के पंडित शंकरलाल को 20 सितंबर, 1892 और हरिदास विट्ठलदास देसाई को नवंबर 1894) में धर्म परिवर्तन के असली कारण को स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं “धर्म परिवर्तन ईसाईयों या मुसलमानों के अत्याचारों के कारण नहीं वरन् ऊंची जातियों के अत्याचारों के कारण हुए।”

खानपान के संबंध में भी उनके विचार अत्यंत तर्कसंगत थे। उन्होंने कहा, “हम सबको यह स्वतंत्रता है कि हम सब चीजों को जानें और उनमें से जो हमारे लिए उपयुक्त और सहायक हो उसे चुनें और अपनाएं। हरेक को अपनी सोच के अनुसार जीने का हक है, परंतु किसी को दूसरे के आचरण की आलोचना करने का अधिकार नहीं है।” विवेकानंद को गौमांस से कोई समस्या नहीं थी। वे लिखते हैं कि वैदिक काल में गौमांस का सेवन किया जाता था और वैदिक अनुष्ठानों में गाय की बलि भी दी जाती थी। अमेरिका में एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि “आप चकित रह जाएंगे यदि मैं आपको बताऊं कि पुराने संस्कारों के अनुसार वह अच्छा हिन्दू नहीं है जो गौमांस नहीं खाता। कुछ अवसरों पर उसे बैल की बलि देकर उसे खाना चाहिए।”

यह साफ है कि जो लोग विवेकानंद को अपना आदर्श और नायक बता रहे हैं उनका आचरण स्वामीजी की शिक्षाओं के एकदम उलट है। वे निर्धनता के उन्मूलन और गरीबों और दमितों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार के हामी थे। वे सभी धर्मों के बीच सौहार्द की बात करते थे। काश, हम ईमानदारी से उनकी शिक्षाओं का पालन करें ना कि उनके नाम पर हिंसा और नफरत से भरी राजनीति को प्रोत्साहन दें।

(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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