हिट एंड रन और हमारा देशः वाहन चालक को सड़क पर आदमी नहीं, सिर्फ रास्ता दिखाई देता है

सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं होतीं। वे मनुष्यों के लिए होती हैं। जिस समाज में सड़क पर दूसरे मनुष्य का जीवन दिखाई देना बंद हो जाए, वहां समस्या केवल हिट एंड रन की नहीं रह जाती। तब असली दुर्घटना हमारे भीतर हो चुकी होती है।

हिट एंड रन और हमारा देशः वाहन चालक को सड़क पर आदमी नहीं, सिर्फ रास्ता दिखाई देता है
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गुरुग्राम की सड़क पर सिया को कार से टक्कर मारने की घटना ने हिट एंड रन को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उपलब्ध वीडियो के आधार पर सिया का आरोप है कि कार ने उनका पीछा किया और जानबूझकर उनकी बाइक को टक्कर मारी। दूसरी ओर आरोपी कल्याण बैंसला ने जानबूझकर टक्कर मारने से इनकार किया है। उसका कहना है कि बाइक सवारों के बार-बार आगे निकलने और धीमा होने के कारण स्थिति बनी और टक्कर दुर्घटनावश हुई। पुलिस ने मामले की जांच करते हुए हत्या के प्रयास की धारा भी जोड़ी है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा।

लेकिन इस घटना का महत्व केवल यह तय करने में नहीं है कि उस क्षण वास्तव में क्या हुआ था। इसका महत्व उस बड़े सवाल में है कि हमारी सड़कों पर मनुष्य का जीवन इतना सस्ता और दूसरे की सुरक्षा इतनी महत्वहीन क्यों होती जा रही है।

सड़क दुर्घटनाएं भारत में कोई छोटी या अपवादात्मक समस्या नहीं हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष देश में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,72,890 लोगों की मृत्यु हुई और 4,62,825 लोग घायल हुए। 2022 की तुलना में 2023 में दुर्घटनाओं में 4.2 प्रतिशत और मौतों में 2.6 प्रतिशत वृद्धि हुई।

सामाजिक, आर्थिक और मानवीय त्रासदी

इन आंकड़ों को केवल संख्या मानकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन 1,72,890 मृतकों का अर्थ है प्रतिदिन सैकड़ों परिवारों का उजड़ना। प्रत्येक संख्या के पीछे एक मनुष्य, एक परिवार, उसकी आशाएं और उससे जुड़े अनेक जीवन होते हैं। सड़क दुर्घटना इसलिए केवल यातायात संबंधी घटना नहीं है; वह सामाजिक, आर्थिक और मानवीय त्रासदी है। सरकार स्वयं सड़क दुर्घटनाओं की सामाजिक-आर्थिक लागत को राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 3.14 प्रतिशत के बराबर मान चुकी है।

हिट एंड रन इस संकट का विशेष रूप से क्रूर रूप है। 2023 के सरकारी आंकड़ों में ‘हिट एंड रन’ कुल दुर्घटनाओं के लगभग 14.8 प्रतिशत और कुल सड़क दुर्घटना में मौतों के लगभग 18 प्रतिशत से जुड़ा था। अर्थात दुर्घटना में मरने वाले लगभग हर छह लोगों में से एक की मौत ऐसे टकराव में हुई जिसमें वाहन चालक के भाग जाने की स्थिति थी।

लेकिन हिट एंड रन की असली समस्या केवल टक्कर नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है जो टक्कर के बाद घायल मनुष्य की ओर देखने के बजाय अपने बच निकलने का रास्ता खोजती है। यह मानसिकता अचानक पैदा नहीं हुई है। इसके पीछे भारतीय समाज में विकसित हो रही एक विचित्र सड़क-मनोविज्ञान काम करता है।


अहंकार, अधीरता और प्रभुत्व का प्रदर्शन

सड़क पर हम नागरिक कम और अपने वाहन के मालिक अधिक हो जाते हैं। कार बड़ी है तो अधिकार बड़ा है; वाहन तेज है तो रास्ता हमारा है; हॉर्न तेज है तो सामने वाले को हटना ही होगा। पैदल चलने वाला, साइकिल सवार, वृद्ध, बच्चा या दोपहिया चालक मानो सड़क का बराबर का नागरिक नहीं, रास्ते में आ जाने वाली बाधा है।

यहीं से समस्या शुरू होती है। हमारे भीतर सड़क पर ‘पहले मैं’ की मनोवृत्ति गहरी होती जा रही है। आगे निकलने की मामूली होड़ अचानक आक्रामकता में बदल जाती है। कोई रास्ता न दे तो गाली, हॉर्न, पीछा करना, वाहन आगे लगाकर रोकना और कभी-कभी वाहन को ही हथियार की तरह इस्तेमाल करना- ये घटनाएं बताती हैं कि सड़क केवल यातायात का क्षेत्र नहीं रही। वह अहंकार, अधीरता और प्रभुत्व के प्रदर्शन का क्षेत्र भी बनती जा रही है।

यह मनोविज्ञान केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। उम्र, शिक्षा और आर्थिक स्थिति से परे इसका विस्तार दिखाई देता है। महंगा वाहन रखने वाला व्यक्ति स्वयं को सड़क का अधिक अधिकार-संपन्न व्यक्ति समझ सकता है। दोपहिया चालक अपनी गति को स्वतंत्रता समझ सकता है। पैदल व्यक्ति भी कभी-कभी नियमों की अनदेखी करता है। समस्या किसी एक वर्ग की नहीं है। समस्या यह है कि हमने सड़क पर साझा जिम्मेदारी की संस्कृति विकसित नहीं की।

नियम अभी भी बाहरी दबाव

हमारे यहां ट्रैफिक अनुशासन अभी भी मुख्यतः पुलिस की उपस्थिति से पैदा होता है, नागरिक विवेक से नहीं। चौराहे पर पुलिसकर्मी खड़ा हो तो लाल बत्ती का सम्मान होता है। कैमरा लगा हो तो गति कम हो जाती है। लेकिन जैसे ही निगरानी दिखाई नहीं देती, नियमों का महत्व भी कम हो जाता है। इसका अर्थ है कि हमने नियमों को नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनाया है। नियम अभी भी बाहरी दबाव हैं।

एक स्वस्थ समाज में व्यक्ति लाल बत्ती इसलिए नहीं मानता कि पुलिस देख रही है, बल्कि इसलिए मानता है कि दूसरी दिशा से आने वाला व्यक्ति भी उसी तरह सुरक्षित घर पहुंचना चाहता है जैसे वह स्वयं चाहता है। हमारे यहां यह बोध कमजोर है।

दुर्घटना को लेकर भी सामाजिक दृष्टि विचित्र रूप से हल्की है। ‘एक्सीडेंट हो गया’, ‘गलती हो गई’, ‘ऐसा तो हो जाता है’ जैसे वाक्य कई बार उस गंभीरता को ढंक देते हैं जिसमें किसी की जान जा सकती है। निश्चित रूप से हर दुर्घटना जानबूझकर नहीं होती। सड़क पर अनपेक्षित घटनाएं होती हैं। लेकिन दुर्घटना के बाद चालक का व्यवहार उसकी नागरिकता की असली परीक्षा है। घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना, पुलिस को सूचना देना और घटनास्थल पर रुकना न्यूनतम मानवीय दायित्व होना चाहिए। इसके उलट भाग जाना अपराध को और गंभीर बनाता है।


सरकारें दुर्घटना के बाद सक्रिय होती हैं

सिया मामले में भी आरोपी की ओर से यह कहा गया कि टक्कर के बाद वह इसलिए रुका नहीं क्योंकि उसे आशंका थी कि बाइक सवार उसे पीट सकते हैं। दूसरी ओर सिया ने सवाल उठाया कि यदि टक्कर दुर्घटनावश हुई थी तो घायल व्यक्ति की स्थिति देखने के लिए चालक रुका क्यों नहीं। इन दोनों दावों का निर्णय जांच करेगी, लेकिन यह प्रश्न व्यापक है- दुर्घटना के बाद हमारी पहली चिंता घायल की होती है या अपनी सुरक्षा, अपनी कार और अपने कानूनी बचाव की?

यहां प्रशासन की भूमिका भी सामने आती है। भारत में सड़क सुरक्षा के लिए शिक्षा, इंजीनियरिंग, प्रवर्तन और आपात चिकित्सा- चार स्तरों वाली रणनीति की बात लंबे समय से की जाती रही है। इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, स्पीड कैमरा, सीसीटीवी, स्वचालित नंबर प्लेट पहचान जैसी व्यवस्थाओं के प्रावधान भी हैं। हिट एंड रन पीड़ितों के लिए मुआवजे की राशि बढ़ाई गई है और ‘गुड सेमेरिटन’ यानी दुर्घटना में घायल की मदद करने वाले व्यक्ति की सुरक्षा के लिए भी नियम बनाए गए हैं।

फिर भी जमीन पर प्रश्न वही है- क्या इन व्यवस्थाओं ने हमारी सड़क संस्कृति बदली है? सरकारें दुर्घटना के बाद सक्रिय दिखाई देती हैं। कोई मामला वायरल हो जाए, मीडिया में चर्चा हो, जन आक्रोश पैदा हो तो पुलिस कार्रवाई करती है, टीमें बनती हैं, गिरफ्तारी होती है और बयान जारी होते हैं। लेकिन सड़क सुरक्षा का वास्तविक अर्थ दुर्घटना के बाद अपराधी पकड़ना नहीं, दुर्घटना होने से पहले उसे रोकना है।

‘दुर्घटना रोकने वाली व्यवस्था’ में बदलना होगा

यही वह जगह है जहां प्रशासन का सुधार-सरोकार कमजोर दिखाई देता है। किस चौराहे पर सबसे अधिक दुर्घटनाएं होती हैं? कहां वाहन अनावश्यक गति से चलते हैं? किन सड़कों पर पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग नहीं है? कहां प्रकाश व्यवस्था अपर्याप्त है? किस मार्ग पर बार-बार सड़क दुर्घटनाएं होती हैं? किस आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक मर रहे हैं? किन परिस्थितियों में दोपहिया वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं? इन सवालों पर लगातार काम करने वाली स्थानीय सड़क-सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

दुर्घटना को ‘घटना’ मानकर दर्ज कर लेना और फिर अगली घटना की प्रतीक्षा करना सुधार नहीं है। सड़क सुरक्षा में प्रशासन को ‘दुर्घटना के बाद की पुलिस’ से ‘दुर्घटना रोकने वाली व्यवस्था’ में बदलना होगा। सड़क की डिजाइन, गति सीमा, कैमरा आधारित प्रवर्तन, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग, स्कूल और अस्पताल क्षेत्रों में गति नियंत्रण, लाइसेंस प्रक्रिया, नियमित ड्राइविंग प्रशिक्षण और दुर्घटना-प्रवण स्थानों का वैज्ञानिक ऑडिट- इन सबको नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बनाना होगा।

सिर्फ जुर्माना बढ़ाने से भी संस्कृति नहीं बदलेगी। कानून का निश्चित और समान रूप से लागू होना अधिक महत्वपूर्ण है। जब चालक को विश्वास हो कि कैमरा न होने पर भी उल्लंघन दर्ज होगा, पुलिस की अनुपस्थिति में भी कार्रवाई होगी और प्रभावशाली व्यक्ति होने से कानून नहीं बदलेगा, तभी अनुशासन भीतर जाएगा।


नागरिक संस्कृति की भी विफलता

आंकड़े भी बताते हैं कि समस्या कितनी गंभीर है। 2023 में देश में 1,60,509 दुर्घटनाएं घातक थीं और सड़क दुर्घटना की गंभीरता लगभग 36 मौत प्रति 100 दुर्घटनाएं थी।  विश्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि भारत दुनिया के सड़क दुर्घटना-संबंधी मृतकों में लगभग 11 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, जबकि दुनिया के वाहनों में भारत की हिस्सेदारी लगभग 1 प्रतिशत है।

यह केवल यातायात व्यवस्था की विफलता नहीं है। यह नागरिक संस्कृति की भी विफलता है।हमें बच्चों को ट्रैफिक नियम याद कराने से अधिक उन्हें दूसरे मनुष्य के जीवन का मूल्य समझाना होगा। ड्राइविंग स्कूलों में केवल वाहन चलाना नहीं, सड़क पर व्यवहार सिखाना होगा। लाइसेंस को अधिकार नहीं, जिम्मेदारी का प्रमाण बनाना होगा। और घरों में भी बच्चों के सामने यह सामान्य नहीं किया जाना चाहिए कि लाल बत्ती तोड़ना, गलत दिशा में निकल जाना या तेज गति से चलना कोई ‘चतुराई’ है।

हमें यह भी समझना होगा कि सड़क पर गुस्सा निजी मामला नहीं है। जब कोई व्यक्ति अपने क्रोध में दूसरे वाहन का पीछा करता है, रास्ता रोकता है या वाहन को टक्कर मारता है तो उसका निजी आक्रोश सार्वजनिक हिंसा में बदल चुका होता है।

सड़कें मनुष्यों के लिए होती हैं

सिया की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने कैमरे के सामने घटित एक घटना को हमारे सामने रख दिया। कैमरा न होता तो कितनी घटनाएं केवल ‘दुर्घटना’ कहकर समाप्त हो जाती हैं, इसका अनुमान लगाना कठिन है। यही कारण है कि तकनीक को केवल अपराध पकड़ने का साधन नहीं, सड़क संस्कृति बदलने का उपकरण बनाना होगा।

लेकिन अंततः कोई कैमरा हमारी जगह संवेदनशील नहीं हो सकता। सड़क पर हमारी असली परीक्षा उस समय होती है जब कोई पुलिसकर्मी नहीं होता, कोई कैमरा नहीं होता और कोई हमें देखने वाला नहीं होता। हम तब कितनी गति से चलते हैं, लाल बत्ती पर रुकते हैं या नहीं, पैदल व्यक्ति को रास्ता देते हैं या नहीं, और दुर्घटना होने पर रुकते हैं या भागते हैं- यही हमारी नागरिकता का वास्तविक परिचय है।

सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं होतीं। वे मनुष्यों के लिए होती हैं। जिस समाज में सड़क पर दूसरे मनुष्य का जीवन दिखाई देना बंद हो जाए, वहां समस्या केवल हिट एंड रन की नहीं रह जाती। तब असली दुर्घटना हमारे भीतर हो चुकी होती है।

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