होली व्यंग्यः लाल, पीला, हरा, नीला जैसा भी मुंह हो, रंगों से हो..

होली के दिनों में संयोग अच्छा लगता है, वियोग नहीं। इस दिन तो पति के परदेश जाने पर विरहिणी यही गाना गाती है कि होली आज जले चाहे काल जले, मोरे पिया से कहो मोसे आन मिले।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

अब भाई साहब जब फागुन बरसने लगा है तो बत्तमीजी या बेहयाई करने का इंतजार होली तक नहीं किया जाता। कई जगह तो बसंत के दिन होली की चीर गढ़ते ही बुआ भतीजे को लेकर गोद में बैठ गई थी। अब तक तो किस्सा खतम हो गया होगा या होने को होगा। करें भी तो क्या, राजनीति में तो बुआ-भतीजे की चली नहीं। साइकिल पंचर पड़ी हो तो चल नहीं पाती। बाकी सब सफाचट्ट समझो। जहां देखो वहीं एक से एक शाहीन बाग। सिर्फ एक दिल्ली का पुराना मुगल गार्डन ऐसा है, जहां सरकारी आदेश के बाद ही फूल खिलते हैं।

खैर, हुरियारे मौसम की बात करें तो तन-बदन दोनों तर-बतर हो जाएंगे। होली के दिन सरकारी पानी की बौछार की। शाहीन बाग वाले टैंकर कनाट प्लेस में पानी फ्री बांटेंगे। अबीर, गुलाल, पानी भरे गुब्बारे और लोगों को टोपी खींचने वाले लंगड़ मुफ्त बंटेंगे। गोबर और कीचड़ की सप्लाई तो कब से जारी है। जहां-जहां मीटर उखाड़ लिए गए हैं, वहां भी फ्री बिजली मिलेगी। कुछ भी कहो अच्छे दिन कभी न कभी तो आते ही हैं। चाहे सपनों में सही।

होली के लिए पुरानी पिचकारियों को तो पहले ही धोया-चमकाया जा चुका है। जहां-जहां पनघट बचे हैं, वहां-वहां मटकियां फोड़ने की प्रैक्टिस तो काफी पहले से चल रही थी। ठीक भी है फागुन में कौन बूढ़ा फूफा नहीं बौराता। ये दिन तो सफेद बालों में खिजाब लगाने के दिन हैं। साली और जीजा लोगों को एक दूसरे की याद आने लगी है। इस मस्ती भरे मौसम में तो लंपटों और छिछोरों का मन मचलने लगता है। पांव फिसलने लगता है। कई बेगैरत लोग केले के छिलके पर पांव रख कर फिसलने लगते हैं। वो छाती पीट-पीट कर गाना गाते हैं कि हम जो रपट जइहे तो हमें ना उठइयो। धुत्त होकर नाली में गिरने का अपना ही मजा है यार। ऐसे मतवाले मौसम में जिस बुजुर्ग का चरित्र नहीं खिसकता समझो अस्पताल ले जाने लायक है। गुड़ में नमक हो तो भइया चींटे नहीं लगते!

दिल्ली वालों की गुझिया खाने से कभी डाइबिटीज बढ़ जाती थी। अब दमा हो जाता है। अब होली की ऐसी मस्तानी ऋतु में जिसे लंतरानी और ऊंची-ऊंची न सूझे तो समझो भारत का नागरिक नहीं है। घुसपैठिये छुप-छुप कर होली खेलें तो मनाही नहीं है पर उसमें पॉलिटिक्स नहीं होनी चाहिए।


चतुर लोग तो ऐसे मौसम में पत्नी और प्रेमिका दोनों को हैंडल कर लेते हैं। जिस देवर की भाभी नहीं होती, उसकी वेदना वही भाभी जानती है जिसका कोई देवर न हो। जो राधा की पीर न जाने वो दिल्ली, बंबई का कृष्ण हो सकता है, मथुरा-वृंदावन का नहीं। हुरियारों का तो मौसमी गीत यही है कि-

बरसे रे फागुन रस बरसे

राधा-कन्हैया जी

भीगें इतर से

बरसे वो बरसे तो

ऐसे झमाझम

जैसे कोई बीबी

अपने पिया पे बरसे

बरसे रे फागुन रस बरसे।

ये गीत सुन कर अलमस्त लोग एक हाथ से ताली बजाने लगते हैं। होली पर बरसाने की लठमार होली की बड़ी चर्चा होती है। अब की बार लठमार होली पहले दिल्ली में चली। बृजमंडल में तो कोई मर्द बचा ही नहीं था जो अपनी पीठ पर गोपियों के लट्ठ झेल सके। चूंकि पूरी जमुना में भांग घोल दी गई थी अतः कुछ मर्द दिल्ली से भेजे गए। वो अभी तक लौटे नहीं हैं।

ये भी सच है कि ड्यूटी पर तैनात लोग चूंकि होली नहीं खेल पाते इसलिए खुन्नस में रहते हैं। पिछली होली की बात है। मैं टुन्न होकर बड़े आदर के साथ एक थाने में घुस गया। कुर्सी पर बैठे मामा जी को प्रणाम किया और चुटकी भर गुलाल का टीका उनके मस्तक पर लगा दिया। थोड़ा सा गुलाल उनकी वर्दी पर गिर गया। वे उखड़ गए। शायद उन्हें पता नहीं चला कि मैं उनकी बहन का बेटा हूं। आंखें तरेर ली। शक्ल से अहिंसावादी लगते थे लेकिन वर्दी पर पड़ा रंग देखकर नाथूराम गोडसे हो गए और अपनी गुस्सैल आंखों से मुझे गोली मार दी। मैं ‘हे राम’ भी न कह सका। उनका भन्नाता हुआ चांटा अब भी मेरे गालों में गरम है।

बहुत हो गया रंग-भंग। अब कुछ साहित्यिक होली हो जाए। इस प्रसंग में इतिहास नहीं, स्मृतियां छुपी हैं। यह तो आलोचकों द्वारा सिद्ध किया गया है कि प्रमुख साहित्यकार श्रीअमृत लाल नागर ने भांग को साहित्यिक ही नहीं सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्रदान की। बाकी जरूरी पेय पदार्थों को श्री श्रीलाल शुक्ल, श्री मुद्राराक्षस और श्री के. पी. सक्सेना जी का अत्यंत आत्मीय और अंतरंग सहयोग मिला। साहित्य के इतिहास में इन नशीले प्रसंगों का उल्लेख नहीं होता। ये जिम्मेदारी मैं अपने पर लेता हूं। कभी हमारे लखनऊ का हाल ये था कि जिसके मुंह से भभका निकले वो साहित्यकार निकलता था।


के. पी. भाई की कंजूसी का तो ये आलम था कि जैसे वे आधी मारुती गाड़ी में ढक्कन से पेट्रोल भरते थे वैसे ही होली में अपने घर आए मित्रों को चम्मच से पेय परोसते थे। शर्त ये थी कि मेहमान अपनी नमकीन अपने साथ लेकर आएं। वो कहते हैं न कि कम खर्च बालानशीं। श्रीलाल जी शाम होते ही उदार हो जाते थे। किसी न किसी को पकड़ लाते। उससे पूछते, मेरा कोई उपन्यास पढ़ा? वो कहता-तीन-चार पढ़ा। श्रीलाल जी पूछते-कौन सा? वो रटा-रटाया उत्तर देता, राग दरबारी। श्रीलाल जी पूरा गिलास उसके मुंह में उड़ेल देते। बेचारा रात देर तक घर नहीं पहुंच पाता।

ऐसो को उदार जग मांही। मुद्राजी चौकन्ने रहते। उतनी ही पीते जितने तक प्रगतिशीलता और प्रतिरोध क्षमता बनी रहे। वे सतर्क रहते थे कि बात-बात में क्रोधित हो जाने वाली उनकी दधीचि मुद्रा में आंच न आने पाए। वे बात-बात पर आलोचकों को शाप देते। ये बात अलग है कि शाप फलता नहीं था।

इस रसीले मौसम में हंसने-हंसाने पर ज्यादा जोर रहता है। हास्य कवि सम्मेलन और मजाकिये मुशायरों की रौनक लौट आती है। शब्दों से शिष्टाचार गायब। लफ्जों की आबरू नहीं। भदेसपन की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। वैसे भी होली में आप भदेस नहीं तो उत्तर प्रदेश भी नहीं। जिसकी उखड़ी किल्ली, वो दिल्ली नहीं।

हास्य कविता सुनाते समय कवियों के चेहरे सुरेंद्र वर्मा की तरह तटस्थ नहीं रहते। पहले खुद हंसते हैं और बाद में फरमाइश पर श्रोता। कविता सुनने के बाद लोग पहले आप-पहले आप करने लगते हैं। होली का त्योहार शोहदापन दिखाने, बदतमीजी करने का मौका देता है। मंत्र का असर देर से होता है, गाली का असर तुरंत। भद्दी बदतमीजियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा फहराने लगती हैं। ऐसी शालीन और सदाचार वाली होली किस काम की कि अपने कपड़े फांड़ें न दूसरों के। शिष्टाचार का अचार डालना है क्या? ऐसी मौत से तो जिंदगी अच्छी।

होली के दिनों में संयोग अच्छा लगता है, वियोग नहीं। इस दिन तो पति के परदेश जाने पर विरहिणी यही गाना गाती है कि- होली आज जले चाहे काल जले, मोरे पिया से कहो मोसे आन मिले। जिन महिलाओं की नियुक्ति अन्य महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस विभाग में होती है वे अपनी ड्यूटी बड़ी उदासी के साथ करती हैं। उनका सोचना भी ठीक है। हो सकता है कुछ आधुनिक महिलाएं इस दिन अपनी सुरक्षा की ज्यादा फिक्र न करती हों। ऐसी ही स्थिति के लिए एक गीत भी है कि- एक बार जाल फिर फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो। वैसे ये भी सही है कि अतिसुरक्षितों को ही सुरक्षा की चिंता रहती है। इधर तो जो महिला असुरक्षित न हो, वो महिला नहीं लगती।


लंपटों, शोहदों, गुंडों और बदमाशों को यूं भी होली-फोली की चिंता नहीं होती। वो छेड़खानी करने, सीटी बजाने, फब्तियां कसने के लिए किसी त्योहार का इंतजार नहीं करते। होली के दिन तो शरीफ घरों के लोग बत्तमीजी करते हैं। होली उन्हें यह परोपकार करने की पूरी छूट देती है। होलिकोत्सव में अंगों और रंगों की छटा निराली होती है।

होली में भले ही रंग भेद न होता हो, लेकिन समाज में तो अभी भी होता है, भाई साहब। राजनीतिक होली भी काली-सफेद नहीं होती। वहां एक दूसरे का मुंह काला करने की होड़ लगी रहती है। कभी दिल्ली लाल किले और कुतुबमीनार के कारण जानी जाती थी। इन दिनों शाहीन बाग।

पुराने जमाने में घोर दुश्मन भी होली पर एक दूसरे के गले मिलते थे। आज भी मिलते हैं पर हाथ में रंग नहीं खंजर रहता है। होली में तो प्यार से गले मिलने की परंपरा है। कभी-कभी तो ये भी ध्यान नहीं रहता कि जिसे गले लगाया गया वो कहीं गले ही न पड़ जाए। गुस्से से लाल-पीला मुंह बनाने से अच्छा है लाल, पीला, हरा, नीला जैसा भी मुंह हो, रंगों से हो। इस बार फागुन रस सभी जगह बरसे। हर मन हरसे। यही कामना है। आप सबको फागुन मुबारक। होली मुबारक।

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