मृणाल पांडे का लेख: प्रवासियों की घर वापसी भयावह सपने जैसा, गावों में भी राहत नहीं, नरकीय जीवन जीने को मजबूर

प्रवासियों की भीड़ अचानक उमड़ने से सभी राज्यों के गांवों में डर, अकुलाहट और रोष है। पहली वजह शहरों से आए लोगों से संक्रमण फैलने का डर है। हाल में दिल्ली से संक्रमित हो कर लौटे मृतकों को मुखाग्नि देने से गांव में मना करने पर पुलिस ने ही क्रिया कर्म कराए।

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

सूरदास बहुत पहले लिख गए थे, ‘मेरो मन अनत कहां सुख पाये, जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आये।’ हर प्रवासी देश-देशांतर भटक कर अंत में घर वापसी के लिए जहाज के पंछी की तरह अकुलाता है। लेकिन घर वापसी हमेशा सुखद नहीं होती। हालिया खबरों के अनुसार, लंबे प्रवास और कठिन यात्रा के बाद उत्तराखंड से केरल तक हमारे लाखों प्रवासी मजदूरों की अचानक घर वापसी उनमें से कइयों के लिए एक अकथनीय दु:स्वप्न बन गई है। गृह प्रदेशों की राज्य सरकारों को यह भी ठीक-ठीक मालूम नहीं था कि गरीबी, पानी की कमी, खेतिहर वर्ग की सरकारी उपेक्षा की वजह से पिछले दशक में उनके कितने बाशिंदे शहर जा कर बिदेसिया बन गए हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने 2.5 लाख प्रवासियों की वापसी के लिए रजिस्ट्रेशन और इंतजाम किया, लेकिन केंद्र का कहना है कि बंगाल के 30 लाख और नागरिकों को भी घर वापसी का इंतजार है। उत्तर प्रदेश सरकार 10 लाख की वापसी की उम्मीद कर रहा था, लेकिन अब तक वहां 25 लाख प्रवासी पहुंच चुके हैं, और सिलसिला अभी जारी है। उत्तराखंड के लिए तो कई दशकों से शहरी पलायन एक बड़ी सच्चाई थी। मशहूर था कि वहां का पानी और जवानी उसके काम नहीं आते। इधर, साल भर पहले खबरें आ रही थीं कि अब लोग सपरिवार मैदान पलायन कर रहे हैं और लगभग 1,000 गांव उजाड़ हो गए हैं। महामारी के चलते जब उनमें से अधिकतर के छोटे-मोटे काम छूट गए तो वे भी अब अकल्पनीय रूप से बड़ी तादाद में बसें भर-भरकर उन घरों को लौट रहे हैं जहां वे कभी टिक कर नहीं रहे, न रोजी-रोटी कमाई थी।

प्रवासियों की भीड़ अचानक उमड़ पड़ने से सभी राज्यों के गांवों में डर, अकुलाहट और रोष है। पहली वजह दिल्ली, सूरत, मुंबई से आए लोगों से संक्रमण फैलने का डर है। हाल में दिल्ली से संक्रमित हो कर लौटे मृतकों को मुखाग्नि देने पंडित या बिरादरी का कोई नहीं जुटा, सो पुलिस ने ही क्रिया कर्म कराए। झारखंड में गोवा से लौटे सात लोगों को अपने ग्रामीण परिजनों के फैसले के इंतजार में हफ्ते भर गांव के बाहर पेड़ के नीचे रहना पड़ा। सूरत से बांदा जिले के गांव में लौटी गर्भिणी जिसको ट्रेन में ही प्रसव हुआ, को भी पहली रात गांव के बाहर अपने नवजात के साथ स्कूल की इमारत में काटनी पड़ी। जब कुछ पत्रकारों ने उसकी दयनीय हालत पर शोर किया तो स्थानीय प्रशासन सोते से जागा और माता-शिशु के लिए एम्बुलेंस आई। कई प्रवासी पलायन के समय अपने हिस्से की जमीन परिजनों या बटाईदारों को जोतने-बोने को दे गए थे। जब तक उनका तीज-त्योहार में ही आना-जाना होता था, कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन अब यह जानकर कि वे शहरी रोजगार खोकर दोबारा गांव में ही खेती करने का इरादा रखते हैं, कई रिश्तेदारों की नजरें बदल गई हैं और उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, कौशांबी और फतेहपुर से जमीन के बंटवारे पर परिवारों में हिंसक झड़पों की खबरें आने भी लगी हैं। कई राज्यों में युवा लड़कियों ने शहरों में घरेलू कामगार का काम करते हुए बूढ़े अशक्त माता-पिता और बीमार भाई-बहन को अपनी कमाई पर पाला, वे खुद के बोझ बन जाने पर चिंतित और शर्मिंदा महसूस कर रही हैं। जिस तरह के काम जितने वेतन पर वे करती रहीं, वे तो उनको गांवों में मिलेंगे नहीं। पर जाएं तो जाएं कहां?

मेहनतकश कमासुत लोगों में से अधिकतर पढ़े-लिखे हैं और घर के कई सदस्यों के अलग-अलग काम पकड़ने के बाद वे स्थायी मध्यवर्गीय शहरी बनने के सपने देख रहे थे। उनको अचानक सपरिवार बच्चों का स्कूल छुड़ाकर तमाम तकलीफें झेल कर अपने ही राज्य और अपने ही गांव के लोगों के बीच लौटना पड़ा है। ग्रामीण जीवन की दरिद्रता और शहरी सुविधाओं की कमियों से निबटना, फिर जान है तो जहान है मानकर मनरेगा की मजूरी करना और उस सरकारी मदद के लिए भी ठेकेदारों के आगे हाथ जोड़ना उनको एक मर्मांतक अनुभव प्रतीत होगा ही। अधिकतर प्रवासी जो किराए के घरों या बस्तियों के बीच रह रहे थे, जब कभी ब्याह-शादी, तीज-त्योहार पर ‘घर’ जाते थे तो तोहफों का अंबार और ग्लैमरमय शहरी जीवन की तमाम रंगीन कहानियां लेकर आते थे। उनको सुनने गांव के महत्वाकांक्षी युवा रात-रात भर बैठे रहते थे। वे इस बार खाली जेब और लंबी यात्राओं से हलकान हैं। कई कोविड से संक्रमित हो चुके हैं, और कई खराब पानी और गंदगी से डायरिया या अन्य रोगों से पीड़ित हो रहे हैं। उनके गांवों में सैनिटाइजर या साबुन तो छोड़िए हाथ मुंह-धोने तक को साफ पानी मिलना भी दुश्वार है। बीमार पड़े तो पाते हैं कि पास के शहरों में अब अधिकतर अस्पताल निजी हैं। सरकारी अस्पतालों में तिल धरने की जगह नहीं। गंभीर रूप से बीमार मरजी को इलाज के लिए मीलों बैलगाड़ीय, टेंपो में ले जाना, तमाम बिलों का भुगतान करना आज उनके लिए असंभव है। शहरों के विपरीत जात-पात, छुआछूत के बंधनों से जूझना, टूटे परित्यक्त पुश्तैनी घरों की मरम्मती, बच्चों, पत्नी की हाय-हाय और पारिवारिक कलह के बीच सोशल डिस्टेन्सिंग या सैनिटाइजेशन की बात करना तो उनके लिए फिलहाल असंभव है। मई के अंतिम सप्ताह तक लगभग 22 लाख प्रवासी मजदूर महानगरों से गांवों को रवाना हो चुके थे और उतने ही जाने को गठरियां बांधे तैयार हैं। विशेषज्ञों की राय में यह तकरीबन देश के कुल संक्रमित लोगों का एक चौथाई भाग है। संक्रमण शहरों से गांव पहुंच चुका है। महामारी बढ़ी तो हमारे राज्यों का दशकों से उपेक्षित स्वास्थ्य कल्याण तंत्र इनसे किस तरह निबटेगा?

जब महामारी के शुरुआती दिन थे तब तालाबंदी कर दी गई और बेरोजगार मजदूरों को उनके याचना करने पर भी घर नहीं भेजा गया। अब, जब तालाबंदी को चौथे चरण में लगातार क्रमश: खोला जाने लगा है और माल के उत्पादन के लिए तमाम प्रोत्साहन पैकेजों की घोषणाएं हो रही हैं, तो फटाफट बसों, ट्रेनों, यहां तक कि हवाई जहाज से भी परिवहन बहाल कर दिया गया। इस सबसे भारी अफरातफरी मची है। फैक्टरियां-दुकानें खुल तो गईं लेकिन मालिकों का कहना है कि उनके पास पर्याप्त प्रशिक्षित कामगार बचे हैं, न ही ताजा माल आ रहा है। उधर, शहरों में पुलिस और कॉलोनियों में आरडब्ल्यूए के नित नए फरमानों की वजह से भ्रमित डरे लोग बाजार नहीं जा रहे। कहना ही पड़ेगा कि इस संगीन स्थिति में उद्योग जगत और आम जनता-दोनों से जमीनी स्तर पर सरकारी तंत्र बार-बार अमानवीय दबंगई से पेश आ रहा है। जिनके पास कुछ जमा पूंजी थी, वे महज समझदारी से खामोश हैं। पर महाराज की जय हो, और जी हुजूरी करने वालों के कारण सत्ता के धड़े में एक अजीब आत्मतुष्टि का माहौल बन गया है। एक बड़ी बिस्कुट निर्माता कंपनी ने हुमक कर अपने बिस्कुटों को आत्मनिर्भरता अभियान से जोड़कर उनकी नई ब्रांडिंग कर दी। लेकिन जाने-माने आर्थिक अखबार बताते हैं कि उनके 30,000 से अधिक कामगर घर वापस चले गए हैं। मांग है, पर आपूर्ति नहीं हो पा रही। देश के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के उत्पाद में 65 फीसदी की गिरावट आ गई है, निर्माण कार्यों का भी 60 फीसदी काम रुका हुआ है, क्योंकि न मजदूर बचे हैं और न जरूरी कच्चा माल मिल रहा है, ऊपर रोज नए आदेश मिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश ने तो अध्यादेश निकाल कर रोजगार कानूनों में बदलाव कर दिया है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्ति नाराज बताए जाते हैं। बस बाबुओं की फौज की मौज है।

हमारे राजनीति और अर्थजगत का नेतृत्व समय रहते तीन सच्चइयां समझ लें: एक, उनकी पहली जिम्मेदारी पार्टी विशेष या शेयर धारकों के प्रति नहीं, अपने कर्मियों और उपभोक्ताओं के प्रति है। उन दोनों को रुसवा करके वे अपने भक्तों-शेयर धारकों को भी बहुत दिन संतुष्ट नहीं रख सकेंगे। दो, लगातार विकास के लिए उनके द्वारा सरकार की ठकुरसुहाती से कहीं जरूरी है, लगातार नया रचना और पुराना सामंती ढर्रा त्यागना। सरकार ही नहीं, सारी दुनिया का हाथ तंग है। अब जो कड़ी स्पर्धा कर सकेगा, वही बचेगा। और सही स्पर्धा कर पाने के लिए कार्यकुशलता साबित कर चुके उन मतदाताओं/कर्मियों की वह स्वामी भक्ति अर्जित करनी जरूरी है, जिनको काम निकल जाने के बाद चुसे आम की गुठली की तरह घूरे पर फेंकने के बाद आप खो चुके हैं। अंतिम बात यह, कि हर बड़ा राजनीतिक दल या आर्थिक उपक्रम अपने मुखिया से जोखिम उठाकर नई राह बनाने की उम्मीद करता है। यह तभी संभव है जब टीम में नेतृत्व की नीयत के प्रति पक्का भरोसा हो। इस समय महामारी पर सांप्रदायिक बवाल काटना और दलगत राजनीति करना आग से खेलने जैसा है।

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