कितनी खूबसूरत थी दुनिया इन स्वंयभू खुदाई खिदमतगारों के बगैर...

एक बार मिजवां में बातचीत के दौरान किसी प्रसंग पर कैफ़ी आज़मी ने कहा था कि इस मुल्क में कोई मुसलमान ऐसा नहीं मिलेगा, जिसके दस-पंद्रह हिन्दू दोस्त नहीं हों और न ही ऐसा कोई हिन्दू, जिसके दस-पंद्रह मुसलमान दोस्त न हों।

बरेली के इसी सेंट अल्फॉनसस चर्च के बाहर क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बजरंग दल से जुड़े लोगों ने हनुमान चालीसा का पाठ किया था (फोटो - प्रभात)
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प्रभात सिंह

आधी रात हो चुकी थी। अचानक बाहर कहीं से पटाख़ों के तेज़ धमाकों की गूंज सुनाई दी। एक के बाद एक, लगातार। नए साल के आगाज़ की ज़ोरदार मुनादी। शहर भर में जगह-जगह चल रहे जश्न में बुझा दी गई बत्तियां शायद अब जल उठी होंगी। शहर जाग रहा था, या कहें कि पूरा मुल्क ही। यों दुनिया भी कहां सो रही होगी! हमारा जागना, ये जश्न, मौज-मस्ती की ये महफ़िलें, मगर ‘बहुत पहले अपने मुकद्दर से किया वायदा’ पूरा करने का जोश थोड़े ही है। यह तो कैलेंडर बदलने का जश्न है।

तोपों की सलामी जैसे धमाकों, शोर-संगीत के बीच उलझा उल्लास, कुछ पहचाने और कुछ अनजाने चेहरों की मुबारकबाद वाले विज्ञापनों से भरे हुए अख़बार, इनबॉक्स संदेशों की भरमार, शुभकामनाओं के बेशुमार नोटिफ़िकेशन, सोशल मीडिया में छा जाने की होड़, यह सब जज़्बात से कहीं ज़्यादा एक ख़ास तरह की मशीनी पाबंदी जैसे मालूम होने लगते हैं। सोचता हूं कि कैलेंडर बदलने से सचमुच क्या तारीख़ भी बदलती है! दिलो-दिमाग़ और हमारे ग़ौर-ओ-फ़िक्र के दायरे पर भी इसकी कोई छाप पड़ती है क्या! इस सोच को उम्र का तक़ाज़ा मान सकते हैं, अख़बारनवीस का दिमाग़ी फ़ितूर या कि अभी हाल के कुछ वाक़ये, जिनसे हमारा शहर गुज़रा है और जिनकी नौइयत शहर के मिज़ाज, समाजी जज़्बात और ज़िंदगी में ख़लल डालने वाली लगती है।

ख़बरों के मामले में इंटरनेट की दुनिया ‘जंगल की आग की तरह’ वाले मुहावरे का पर्यायवाची है। सो 24 दिसंबर की शाम की यह ख़बर तेज़ी से आम हुई कि बरेली के सेंट अल्फोंसस कैथेड्रल के बाहर बजरंग दल के सदस्यों ने धरना दिया और हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। बजरंग दल के लोगों की दलील थी कि क्रिसमस के जलसे में स्कूली बच्चों के ज़रिये ऐसी नाटिका का मंचन हुआ, जिसमें कथित तौर पर हिन्दू धर्म औऱ समाज को ग़लत रौशनी में पेश किया गया था। इसकी वजह से बच्चों और उनके मां-बाप को ठेस पहुंची। क़रीब आधा घंटे तक धरने और नारेबाज़ी के बाद पुलिस को शिकायत देकर वे लोग लौट गए।

यह कैथेड्रल सिविल लाइंस से सटे कैन्टोमेंट के इलाक़े में बिशप कोनरॉड स्कूल कैंपस के भीतर बना हुआ है। क्रिसमस के मौक़े पर तीन दिन का मेला यहां की पुरानी रवायत है। चर्च के साथ ही पूरा कैंपस रंगीन रौशनी में नहा उठता है, खाने-पीने के स्टॉल बाहर दूर तक लग जाते हैं, सांस्कृतिक आयोजन होते हैं और इतनी भीड़ जुटती है कि पैदल चलना भी आसान नहीं होता, गाड़ियों की गुंजाइश तो ख़ैर होती ही नहीं। स्कूली बच्चों और उनके घर वालों के साथ ही यह शहरियों का मेला भी होता है, ख़ासकर नौजवानों का। मेला यानी कि मिलना-जुलना, खाना-पीना, मौज-मस्ती। याद नहीं पड़ता कि इस बार की तरह के ऐतराज की नौबत पहले कभी आई हो। 


बाद में ईसाइयों के सामुदायिक पोर्टल ‘कैथोलिक कनेक्ट’ ने बरेली के बिशप इग्नेशियस डिसूजा के हवाले से लिखा कि इस वाक़ये की वजह शायद कोई ग़लतफ़हमी थी, क्योंकि स्कूल के कार्यक्रम में तो समकालीन सामाजिक मुद्दों पर बात की गई थी। बक़ौल बिशप, स्कूल मैनेजमेंट के ख़िलाफ़ एफ़आईआर लिखाने के लिए पुलिस से शिकायत की गई, मगर शिकायत करने वालों ने अपने आरोप की पुष्टि के लिए कोई सबूत नहीं पेश किया गया। चर्च पर विरोध-प्रदर्शन के बारे में पुलिस ने चर्च को पहले ही आगाह कर दिया था, हिफ़ाज़त के लिहाज़ से पुलिस भी तैनात कर दी थी।

वैसे धर्म और रीति-रिवाज के जानकार तो यह भी बताते हैं कि हनुमान चालीसा का भाव शांति, श्रद्धा और समर्पण है, इसलिए ग़ुस्से या जल्दबाज़ी में, सूर्यास्त के तुरंत बाद और नहा-धोकर शुद्ध हुए बिना इसका पाठ नहीं किया जाना चाहिए। मुमकिन है कि नाराज़ लोग भी यह बात जानते रहे होंगे। हमारे शहर के ताने-बाने पर ग़ौर करें तो कैथेड्रल का मेला तो जुटा ही, बड़े दिन पर क्राइस्ट मेथोडिस्ट चर्च पर लगने वाले मेले में हमेशा की तरह मज़े की भीड़ जुटी। अयूब ख़ां चौराहे से चौकी चौराहे की तरफ़ आने वाली चर्च की तरफ़ की सड़क पर गाड़ियां चलने पर पाबंदी थी, उस रोज़ वह सिर्फ़ पैदल वालों की रहगुज़र थी।

बरेली का क्राइस्ट मेथोडिस्ट चर्च तो हर साल क्रिसमस के मौके पर गुलजार होता ही है और शहर के लोग भी इसमें खूब हिस्सा लेते हैं (फोटो - प्रभात)
बरेली का क्राइस्ट मेथोडिस्ट चर्च तो हर साल क्रिसमस के मौके पर गुलजार होता ही है और शहर के लोग भी इसमें खूब हिस्सा लेते हैं (फोटो - प्रभात)

सवेरे की प्रार्थना के बाद चर्च के दरवाज़े बंद थे, पर कैंपस गुलज़ार था। यीशु के जन्म की झांकी सजी थी, कैंपस में तीन-चार चौड़ी मेज़ें जोड़कर लगा दी गई थीं, अक़ीदतमंद जहां जाकर मोमबत्तियां रौशन करते, बंद दरवाज़े के सामने जाकर सिर झुकाते और फिर बच्चों को लेकर खिलौनों, खाने-पीने के ठिकानों की तरफ़ आ जाते जो पूरी सड़क पर आबाद थे। अपनी पत्नी, पोती और भतीजों को लेकर पहुंचे गवर्नमेंट कॉलेज के सहपाठी राजेश बाबू मौर्य इसी भीड़ में मिले। बताया कि अपने बच्चों की पढ़ाई के दिनों से ही वह हर साल मेले में आते ही हैं, और वजह इतनी ही कि यहां आकर अच्छा लगता है। प्रसंगवश इतना और कि शहरी इलाक़े में कुल 0.78 फ़ीसद ईसाई (2011 की जनगणना के मुताबिक़ 0.33 फ़ीसद ही) आबादी है, और कैन्टोमेंट के इलाक़े में 2.03 फ़ीसद।

क्रिसमस के मौके पर यीशू के जन्म की झांकी (फोटो - प्रभात)
क्रिसमस के मौके पर यीशू के जन्म की झांकी (फोटो - प्रभात)

यह ख़बर अभी खलबली मचा ही रही थी कि 27 दिसंबर को राजेंद्रनगर के डेन कैफ़े में एक और हादसा गुज़रा। नर्सिंग स्कूल की एक छात्रा शिवांगी अपने जन्मदिन का जश्न मनाने के लिए अपने स्कूल के दोस्तों के साथ कैफ़े में गई थी। कुछ देर बाद नारे लगाते हुए वहां पहुंची भीड़ ने हंगामा खड़ा कर दिया। ख़ुद को बजरंग दल का सदस्य बताने वाली इस भीड़ ने शिवांगी के दोस्तों में शामिल वाक़िफ़ और शान को पकड़कर पीटना शुरू कर दिया। उन्हें बचाने की कोशिश करने वालों के साथ भी हाथापाई की और प्रेमनगर पुलिस के आने के थोड़ी देर बाद बाइकों पर सवार होकर बड़ी शान से रुख़सत हुए।


पुलिस ने चोटें खाए वाक़िफ़ और शान के साथ ही कैफ़े चलाने वाले शैलेंद्र गंगवार को हिरासत में ले लिया और थाने ले जाकर शांति भंग करने के आरोप में उनका चालान कर दिया। इंस्पेक्टर राजबली सिंह की दलील यह थी कि उन दोनों लड़कों की मौजूदगी ही हंगामे की वजह बनी थी।

इसे लेकर जब पुलिस की ख़ासी लानत-मलानत हुई तो कुछ को नामज़द करके 24-25 लोगों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट लिखी गई, एक नाबालिग समेत छह लोग गिरफ़्तार भी हुए। रिपोर्ट में नामज़द और भीड़ के अगुवा ऋषभ ठाकुर के बारे में बजरंग दल के महानगर संयोजक केवलानंद गौड़ ने यह कहकर किनारा किया कि ऋषभ को 14 दिसंबर को ही संगठन से निकाला जा चुका है और इस घटना से बजरंग दल का कोई लेना-देना नहीं है।

इस क़िस्म के तर्ज-ए-अमल से हालांकि ज़माना भी अब नावाक़िफ़ नहीं है। मगर जिस रोज़ ऋषभ ठाकुर ने अपनी बेगुनाही जताते हुए ‘लव जेहाद’ के ख़िलाफ़ हंगामे को जायज़ बताने वाला अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, उसी रोज़ सुभाषनगर पुलिस ने अफ़सरों को बताया कि उसे ज़िला बदर करने का ऑर्डर तो अगस्त में ही हो गया था और चोरी के मामले में जुलाई में वह जेल जा चुका है। उस पर जानलेवा हमले का मुक़दमा भी चल रहा है।

कैफ़े में हुए हादसे के बाद से शिवांगी सदमे के हाल में हैं। उस रोज़ की पार्टी में शरीक़ दस लोगों में वे छह लड़कियां और चार लड़के थे। नाम-निहाद ‘लव जेहाद’ के हल्ले के बारे में अपनी तक़लीफ़ बयान करते हुए उसने मीडिया को बताया कि साथ पढ़ने वाले से दोस्ती का ऐसा कोई पैमाना नहीं होता।

शिवांगी की बातें सुनते हुए जो ख़्याल सबसे पहले आया, वह यह कि किसी जश्न में शामिल दस लोगों में कौन किस मज़हब को मानने वाला है, इस बारे में आख़िर ऋषभ और उसकी टोली को ख़बर कैसी हुई? और फिर नेहा दीक्षित की किताब ‘मैनी लाइव्ज़ ऑफ़ सईदा’ में तथाकथित ‘लव जेहाद’ के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने वालों के काम करने के तरीक़े और उनके तंत्र की याद आई। याद आया कि एक बार मिजवां में बातचीत के दौरान किसी प्रसंग पर कैफ़ी आज़मी ने कहा था कि इस मुल्क में कोई मुसलमान ऐसा नहीं मिलेगा, जिसके दस-पंद्रह हिन्दू दोस्त नहीं हों और न ही ऐसा कोई हिन्दू, जिसके दस-पंद्रह मुसलमान दोस्त न हों। अपने जन्मदिन की ख़ुशी में शिवांगी का अपने दोस्तों को शामिल करना समाज के किसी ख़ुदाई-ख़िदमतगार को भला क्यों खटकने लगा होगा!


और फिर प्रो. कृपानंदन भी याद आए। इसलिए कि ज़माना भी उन्हें नज़ीर के तौर पर देखता था। जंग-ए-आज़ादी के सिपाही, बरेली कॉलेज में अंग्रेज़ी के शिक्षक, दानिश्वर, सर्वोदयी, शहर की रौशन ख़्याल जमात के चमकते सितारे और मुअज़्ज़िज़ शहरी। ज़किया ख़ातून उनकी विद्यार्थी थीं, और बाद में उनकी शरीक़-ए-हयात। दोनों ने एक छत के नीचे ज़िंदगी गुज़ार दी। ज़किया ख़ातून मज़हब की पाबंद और प्रो. कृपानंदन कुछ हद तक काफ़िर। उनके दो बेटे अशोक और एंजिल। सोचता हूं कि तब कहीं ज़्यादा मज़हबपरस्ती के बावजूद ऐसे ख़ुदाई-ख़िदमतगारों के बग़ैर वह दुनिया कितनी ख़ूबसूरत थी।

हंगामे के मुल्जिम देर-सबेर पकड़ लिए जाएंगे, हो सकता है कि अपने किए की सज़ा भी पाएं, मगर शिवांगी के दिमाग़ पर जो छाप रह जाएगी उसका क्या, उनके दोस्त शान और वाक़िफ़ की चोटें ठीक हो जाने के बाद भी वे उम्र भर क्या यह हादसा भूल पाएंगे। दुआ कीजिए, जतन कीजिए कि हादसा मानकर भूल ही जाएं, नहीं तो वही मंसूबा पूरा होगा, जो ऐसे हादसे रचने का मानस तैयार करता है। फ़ैज़ लुधियानवी याद आते हैं,

तू नया है तो दिखा सुबह नई शाम नई

वरना इन आंखों ने देखे हैं नए साल कई।।

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