विष्णु नागर का व्यंग्यः आखिर जस्टिस माधव जमदार ने इतनी हिम्मत कैसे की, जज लोया और मुरलीधर को भूल गए क्या!

ऐसे कटु वचन मत बोलो और बोलोगे तो हमारी आईटी सेल भी कुछ उल्टी बोल पड़ी तो फिर शिकायत मत करना कि देखो जज के साथ भी क्या सलूक हो रहा है! एक ट्वीट करवाने के केवल पांच रुपए लगते हैं और पार्टी के पास अरबों का खजाना है।

आखिर जस्टिस माधव जमदार ने इतनी हिम्मत कैसे की, जज लोया और  मुरलीधर को भूल गए क्या!
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बॉम्बे हाईकोर्ट के जज माधव जामदार साहब आप यह नहीं कहते तो आपका क्या बिगड़ जाता कि नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बना रखा है, वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते। वे विरोध करें तो उन पर केस कर दिया जाता है। वे बीजेपी सरकार मुर्दाबाद, अमित शाह मुर्दाबाद के नारे लगाएं तो तड़ीपार कर दिया जाता है। नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? इससे तकलीफ क्या है?

जिनसे आप पूछ रहे हैं न जज साहब, वे तो जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के छह दशक के बाद भी उनसे सवाल पूछ रहे हैं तो वे आपसे प्रश्न कर सकते हैं। आपको ट्रोल कर सकते हैं कि आपको इस सबसे तकलीफ क्या है ? आपको तो विरोध प्रदर्शन करना नहीं है, धरना देना नहीं है, आपको मुर्दाबाद-जिंदाबाद करना नहीं है। आपकी पत्नी, आपके बच्चे भी धरना देने, विरोध प्रदर्शन करने जाने वाले हैं नहीं! उनमें से किसी को तड़ीपार नहीं किया जा रहा है। फिर समस्या क्या है? हो तो साफ बताओ!

देवेन्द्र फड़नवीस से बोलो वरना सीधे अमित शाह से बोलो और चाहो तो प्रधानमंत्री से बोलो। वैसे नागपुर से भी बोल‌ सकते हो। उन्हें भी अलाऊ किया हुआ है पर ऐसे कटु वचन मत बोलो और बोलोगे तो हमारी आईटी सेल भी कुछ उल्टी बोल पड़ी तो फिर शिकायत मत करना कि देखो जज के साथ भी क्या सलूक हो रहा है! एक ट्वीट करवाने के केवल पांच रुपए लगते हैं और पार्टी के पास अरबों का खजाना है। वे ऐसी-ऐसी बेहूदा टिप्पणी करेंगे कि हवा टाइट से भी टाइट कर देंगे। इस बहाने वे बरनॉल का विज्ञापन खूब करेंगे और ये भी बताएंगे कि इसका उपयोग कहां और किस तरह करना है! आप भी यह चाहते हो तो बोलो। अमित मालवीय को आपके जवाब का इंतजार है!

और सुनो, जज साहब आपको इस पद पर, इतनी तनख्वाह और इतनी सुविधाओं के साथ इसलिए थोड़े बैठाया था कि दूसरों के दुख-तकलीफ से खुद भी तकलीफ पाओ। बैठाया इसलिए था कि सारी तकलीफों से, दुःखों से, अन्यायों और अत्याचारों से इतने अधिक ऊपर उठ जाओ कि कुछ भी गलत होता न दिखे और दिखे तो आंखों पर पट्टी बांध लो। सुनाई दे तो कान में रुई डाल लो। बीच-बीच में छोटा-मोटा न्याय करते रहो ताकि बड़े अन्याय में बिना पलक झपकाए हमारा साथ दे सको!


वैसे जज लोया के बारे में तो आपको सब मालूम ही होगा। इसी प्रदेश के थे। चलो बारह साल पुरानी बात है, भूल जाते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस मुरलीधर का नाम सुना होगा, कभी मिले भी हों शायद तो मालूम होगा कि वे नफरती भाषण देने वाले दिल्ली के भाजपाई नेताओं के खिलाफ केस दर्ज न करने के लिए दिल्ली पुलिस को बहुत जोर से फटकार रहे थे तो हमने उनका रातोंरात स्थानांतरण करवा दिया। सुबह होने का इंतजार भी नहीं किया!

गुजरात हाईकोर्ट के एक जज थे, अकील कुरैशी। उन्हें गुजरात हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश का दायित्व दे दिया गया था। कुछ ही घंटों में उनसे यह छीन लिया गया। पूछो क्यों, तो उनका अपराध यह था कि उन्होंने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ केस में अमित शाह को कभी पुलिस हिरासत में भिजवाया था। इसके बाद भी उन्हें बख्शा नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनने दिया गया। इसी तरह उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के विरुद्ध निर्णय दिया था तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने में काफी देरी की गई। उनकी वरिष्ठता को चूना लगा दिया गया।

तो जजों को भी सबक सिखाने के इतने उदाहरण हैं कि अब बिना सिखाए भी काफी जज सब सीख चुके हैं। अधिकांश पदों पर अब समझदार लोग बैठे हैं। हमने तो आपको भी समझदार ही समझा था पर क्या कहें? आपने तो हमारा भरोसा ही तोड़ दिया!

और जज साहब आपको इतना भी समझ में क्यों नहीं आया कि यह हिन्दू-मुस्लिम करने का स्वर्णयुग है। अजीब बात है कि इस युग में आपको सेकुलरिज्म की रक्षा करने की पड़ी है।आपको वहिद चौधरी नाम देखते ही समझ जाना चाहिए था कि ये मुल्ला है। इतना तो हर हिन्दू बच्चा भी समझता है मगर आप नहीं समझे। जिसे हमारी भाषा में मुस्लिमपरस्ती कहते हैं, वह आपने की। उसे न्याय देने की चिंता की और हिंदुत्व का खेल बिगाड़ने की कोशिश की। आप जज हैं, इसलिए हम बहुत नरमी से समझा रहे हैं वरना नरमी हमारे डीएनए में नहीं है। इसे आप धमकी या चेतावनी मत समझना और समझो तो भी कोई प्रॉब्लम नहीं क्योंकि सारी दुनिया में हमारे नेता का डंका बज रहा है। डंका फट गया है मगर कमाल है कि फिर भी बज रहा है!


आप केस सुन रहे थे वहिद चौधरी का और व्यंग्य हम पर कस रहे थे कि इधर दस साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो रही थी और उधर सदन में पार्टी बदलने पर बहस चल रही थी। आपने वाहिद चौधरी से कहा कि आजकल दलबदल चल रहा है, वाशिंग मशीन चालू है। आप भी उसमें घुस जाओ, पाक-साफ हो जाओ। हमारे मामले में आपका बोलना नहीं चाहिए। दिस इज नाट डन! आइंदा खयाल रखें। नौकरी करें और घर जाएं और बीवी-बच्चों के साथ खुश रहें! खुश रहने से बड़ी बात इस दुनिया में और क्या है!