खरी-खरीः लोकतंत्र के दौर में ‘मोदी शाही’ भी और कितने दिन!

कभी शाही दौर में केवल बादशाह और उसके वजीर-ए-आजम की मनमर्जी चलती थी, वैसे ही इन दिनों भारत में बादशाह मोदी और उनके ‘वजीर-ए-आजम’ सरीखे अमित शाह की चल रही है। देश हो या विदेश हो, मीडिया हो या संसद, हर जगह इन दिनों केवल यही दो आवाजें ही हैं, जो गूंज रही हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

अंग्रेज आए और सौ वर्ष अपना शासन चलाकर आखिरकार चले गए। मुगल शाही तीन सौ से कुछ अधिक वर्षों तक देश पर छाई रही। आखिर 1857 में मुगलों का भी पतन हो गया। अरे बड़े-बड़े साम्राज्यों का पतन हुआ। इतिहास सिकंदर जैसे शाहों के उत्थान और पतन से भरा पड़ा है। आप तो जानते ही हैं कि सिकंदर जैसे विश्व विजेता को पंजाब के एक छोटे से राजा पोरस ने शब्दों से कैसे पराजित किया था। लब्बोलुआब यह है कि बड़ी से बड़ी शाही भी जनता के आगे नहीं टिक सकी। फिर आज हम-आप तो लोकतंत्र के काल में जी रहे हैं। ऐसे में भला किसी की ‘लोकतांत्रिक शाही’ कितने लंबे समय तक चल सकती है।

चौंकिए मत! जी हां, लोकतंत्र में भी शासक कभी-कभी सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण करते हैं कि शासन का स्वरूप राजशाही हो जाता है। भारत में भी इस समय ‘मोदी शाही’ का दौर चल रहा है। जैसे कभी शाही दौर में केवल बादशाह और उसके वजीर-ए-आजम की मनमर्जी चलती थी, वैसे ही इन दिनों भारत में बादशाह मोदी एवं उनके सरीखे ‘वजीर-ए-आजम’ अमित शाह की मंशा चल रही है। वह देश हो या विदेश हो, मीडिया हो अथवा संसद हो, हर जगह इन दिनों देश में केवल दो ही आवाजें हैं, जो गूंज रही हैं। मोदी राज में केंद्रीय मंत्रालयों में बैठे मंत्रियों की हैसियत राज दरबारियों की हो चुकी है।

लोकतांत्रिक प्रणाली में प्रधानमंत्री जब कोई फैसला लेता है तो वह उसको मंत्रिमंडल के सामने चर्चा के लिए पेश करता है। उस फैसले पर बाकायदा चर्चा होती है और फिर सर्वसम्मति से वह फैसला इस बिना पर तय होता है कि वह देशहित में है या नहीं। परंतु मोदी राज में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए फैसले पर केवल मोहर लगाने के लिए होती है। यदि ऐसा नहीं होता तो 8 नवंबर, 2016 की रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं राष्ट्र को संबोधित करके नोटबंदी का फैसला देश को पहले नहीं सुनाते। आप भलीभांति अवगत हैं कि नोटबंदी का एलान पहले दूरदर्शन और रेडियो पर हुआ। फिर उसके पश्चात प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल बैठक में गए जहां उपस्थित मंत्रियों ने ‘शाह मोदी’ के फैसले को गर्दन झुकाकर और ‘जी हुजूर’ कहकर स्वीकार कर लिया। संसद और दूसरे तमाम सरकारी तंत्रों का जो हाल है वह किसी से छुपा नहीं है। हद यह है कि अब लोग सुप्रीम कोर्ट पर भी उंगली उठा रहे हैं।

कटु सत्य यही है कि अब हम ‘मोदी शाही’ शासनकाल में जी रहे हैं। इस शासन काल में केवल मोदी का हुकुम और उनके चहेते गृहमंत्री अमित शाह की तूती बोलती है। बल्कि नरेंद्र मोदी के दूसरे शासनकाल में लोगों को कुछ यह शक होने लगा है किअमित शाह की शाही शायद मोदी पर भी छाई हुई है। क्योंकि राष्ट्रीय पटल पर अब मोदी जी कुछ कम और शाह जी कुछ ज्यादा नजर आ रहे हैं। याद दिलाऊं कि भारतीय संसद में जिस समय सरकार ने सफलतापूर्वक संविधान से अनुच्छेद 370 को रद्द कर जम्मू-कश्मीर के विशिष्ट अधिकारों को समाप्त किया, तो इस ऐतिहासिक बिल को पारित करवाने का श्रेय शाह साहब को ही मिला। हद यह है कि प्रधानमंत्री बिल पारित होने के पश्चात स्वयं संसद में शाह जी के पास चलकर आए और उनकी पीठ थपथपाई। अर्थात राजा ने मंत्री को धन्यवाद दिया। अब इस समय एनआसी बिल की चर्चा है। इसके साथ भी अमित शाह के नाम की चर्चा है, मोदी जी की नहीं।

मैं यह तो नहीं बता सकता हूं कि इस प्रकरण में किसका कद किससे बड़ा या छोटा हो रहा है। यह तो अंततः इतिहास ही तय करता है। परंतु दिल्ली वह राजनगरी है जो बहुत तेजी से हवा का रुख पहचान लेती है। शायद तब ही इन दिनों दिल्ली में अमित शाह की मोदी से कुछ अधिक ‘डिमांड’ है। इस नगरी में जाड़े के मौसम में हर बड़े मीडिया घराने का एक विशेष समारोह होता है। इसका लगभग नियम सा है कि इस समारोह के मुख्य अतिथि सामान्यतः प्रधानमंत्री होते हैं। परंतु अब यह नियम भी कुछ-कुछ बदल रहा है। अभी पिछले सप्ताह ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ग्रुप के ‘ईटी अवार्ड’ समारोह के मुख्य अतिथि अमित शाह थे। जब लोगों ने प्रश्न किए तो माननीय गृहमंत्री जी ने पूरी सरकार की ओर से जवाब दिए। मानो वह स्वयं प्रधानमंत्री का स्वर हैं जो मोदी जी की वाणी बोल सकते हैं।

अब इसका क्या रहस्य है, भगवान जाने अथवा मोहन भागवत जी जानें। परंतु यह याद दिला दूं कि दिल्ली नगरी उसी को ज्यादा झुककर सलाम करती है जिसका दबदबा ज्यादा होता है। और इन दिनों दिल्ली में लोग अमित शाह को कुछ ज्यादा ही झुककर सलाम कर रहे हैं। अब यह मत समझ बैठिएगा कि इन दिनों ‘मोदी शाही’ नहीं, परंतु ‘शाह शाही’ चल रही है। शाही तो अभी भी मोदी जी की है भले ही कुछ अंदाज बदल गए हैं। लेकिन अब जमीन से इस शाही के खिलाफ कुछ अच्छे इशारे मिल रहे हैं।

अभी ऊपर जिस ‘ईटी अवार्ड’ समारोह का जिक्र किया गया वह सारे देश में चर्चित हो गया। इसलिए नहीं कि कोई बड़ी घटना वहां घटी। घटना तो सामान्य अवस्था में छोटी सी ही थी लेकिन लोग इस बात पर चौंके बहुत। ‘ईटी अवार्ड’ समारोह सदा बड़े-बड़े उद्योगपतियों से खचाखच भरा रहता है। इस बार भी अंबानी, अडानी, बिरला जैसे घरानों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। वहां बजाज घराने के भीष्म पितामाह राहुल बजाज भी थे। उन्होंने खड़े होकर लगभग तमाम उद्योगपतियों की ओर से अमित शाह से प्रश्न कर लिया कि आजकल उद्योग क्षेत्रों में एक खौफ का माहौल है, कोई कुछ बोलने से डरता है। जबकि हम यूपीए सरकार के समय निडर होकर बोलते थे। जिस अमित शाह के सामने किसी की जुबान नहीं खुलती थी उनके सामने ऐसे बेबाक प्रश्न ने वहां उपस्थित लोगों को ही नहीं अपितु सारे देश को चौंका दिया।

भला यह किसकी मजाल की वह शाह साहब से सवाल कर ले। बस दूसरे ही रोज मंत्रियों से लेकर बीजेपी के संत्रियों तक सबने राहुल बजाज की फजीहत कर डाली। पर इतना जरूर है कि राहुल बजाज के एक प्रश्न ने जैसे स्वयं बीजेपी में जो चुप्पी लगी थी उसने उस चुप्पी को तोड़ दिया। दूसरे ही रोज कर्नाटक से अनंत हेगड़े की आवाज आई कि देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र का कुछ घंटों का मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया था कि वह 40 हजार करोड़ रुपयों को उसके ठिकाने तक पहुंचा सकें। ‘मोदी शाही’ में पैसों का ठिकाना कहां है सब भलीभांति परिचित हैं। अभी हेगड़े के बयान पर आंखें उठीं ही थीं कि यकायक भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन इंदौर से बोल उठीं कि इंदौर से नौ बार सांसद रहने के बाद अब उनकी इंदौर बीजेपी में कुछ नहीं चलती। ऐसे ही महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे ने ट्वीटर पर अपने को बीजेपी से नहीं जोड़ा तो तरह-तरह की अटकलें आरंभ हो गईं।

‘मोदी शाही’ के इस दौर में बीजेपी विरोधी स्वरों का पार्टी के बाहर और अंदर उठना शाहों के लिए कुछ अच्छा संकेत नहीं है। इन स्वरों से एक बात तो स्पष्ट है। वह यह कि देश में उद्योगपतियों से लेकर स्वयं बीजेपी के भीतर तक शासन के प्रति असंतोष छलक रहा है। देश में जो घुटन का माहौल है अब लोग उसके खिलाफ बोलने लगे हैं। किसी भी शाही व्यवस्था के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। शाही व्यवस्था खौफ पर चलती है। यदि खौफ टूट जाए तो शाही भी टूट जाती है। मोदी-शाह शाही के लिए भी राहुल बजाज और हेगड़े जैसे स्वर कुछ अच्छा संकेत नहीं हो सकते। क्योंकि अब खौफ छंट रहा है। अंत में बस इतना ही कह दूं कि जब अंग्रेजों और मुगलों की शाही सदा नहीं चली तो इस लोकतांत्रिक दौर में ‘मोदी शाही’ भी और कितने दिन!

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