मृणाल पांडे का लेख: आखिर कितनी मौतें और हों कि नेतृत्व सच्चाई स्वीकार कर नए सिरे से संकट से निपटने के बारे में सोचे!

हम अक्सर सदियों के कैनवास पर विचार करने के आदी हैं। वह समय बीत चुका है। उनकी हदबंदी से बाहर आकर हमको ही नहीं, सरकार को भी तमाम मानाभिमान और शक त्याग कर नए सिरे से दूसरों की दी हुई बुरी से बुरी खबरों को भी सही तरह से झेलना और उनसे सीखना है।

फोटो : Getty Images
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मृणाल पाण्डे

सत्तर के दशक में जब अमेरिकी युवा हजारों की तादाद में वियतनाम युद्ध से ताबूतों में बंद होकर घर लाए जा रहे थे और हर कैंपस में हाथ उठाकर वियतनाम युद्ध में अमेरिकी भागीदारी और सरकारी हिंसा का विरोध हो रहा था, उस समय जानेमाने लोकगायक बॉब डिलन का एक गीत बहुत मशहूर हुआ। शीर्षक था, ब्लोईंग इन द विंड (हवा में बिखरते हुए)। आज अपने देश में यहां से वहां तक प्राण वायु के लिए जल बिन मछली की तरह छटपटाते लोगों, उनके निस्सहाय आर्तनाद करते परिजनों और पार्किंग स्थलों तक में जलती चिताएं देखने के बाद कठोर हुकुम सुना, तो अचानक देश काल की सीमाएं तोड़कर वह गाना याद आ गया। खासकर ये चंद पंक्तियां :

‘कितनी देर तक वे ऊपर ताकेंगे, कि जिसके बाद उनको आसमान दिखने लगे?

कितने जोड़ी कान चाहिए उनको, मानवीय आर्तनाद सुन पाने के लिए?

कितनी मौतें और होंगी, कि वे मानेंगे कि हां, लोग सचमुच मर रहे हैं?

बहुत सारे लोग !’

यह सच है कि कोविड की वैश्विक महामारी मानवता के आगे इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती है। पर हमें यह मानने पर मजबूर भी करती है कि बिना पक्की स्थानीय जड़ों के सिर्फ शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव तथा जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों तथा मीडिया के चतुर निर्वहन से पाया उधार का सुख कितनी जल्द चुक जाता है। फरवरी तक हम सीना फुलाए कहते घूम रहे थे कि भारत ने कैसे- कैसे तरक्कीयाफ्ता देशों से कहीं अधिक तेजी से कोविड को हरा दिया है; कि हमारी तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था को लॉकडाउन नहीं गिरा पाया, वह फिर से कल्ले फेंकने लगी है; कि दुनिया की महाशक्तियों के साथ आत्मनिर्भर भारत के ऐसे मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय रिश्ते बन चुके हैं, जैसे पिछली सरकारों के समय में अकल्पनीय थे। ऐसी बातें हर कहीं विज्ञापनों और गोदी मीडिया की मार्फत प्लाट देख-सुनकर जब विपक्ष के नेताओं, चंद ईमानदार अफसरों और (गोदी मीडिया बनने से बिदकते रहे) मीडिया, सोशल मीडिया के कुछ डिजिटल प्लेटफार्मों तथा गैर सरकारी संगठनों ने जब सत्ता पक्ष को सयाने सचिव माल्यवंत की तरह आगाह किया कि हुजूर, दुनिया के कई देशों में कोविड की दूसरी लहर अधिक मारक बनकर लौट आई है और बेहतर हो कि समय रहते उससे निबटने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों को दुरुस्त किया जाए जो बदहाल हो चुके हैं। इसके लिए तमाम विपक्ष शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से भी स्थानीय तैयारियों पर मशविरा होना जरूरी है ताकि देश के लिए आफत की इस घड़ी में तुरंत सक्रिय हो सकने वाला एक सही प्रोटोकॉल बनाया जा सके।

पर पतन की घड़ियों में सदा से ढिल्ली किल्ली वाली दिल्ली ऊंचा सुनती है। बॉब डिलन के अनुसार, उसने जब ऊपर ताका तो आसमान नहीं देखा, न ही उसके कानों ने आर्तनाद सुना या मौतों की भयावह व्यापकता को स्वीकारा। सुधार की या बड़ी रैलियों, धार्मिक जमावड़ों को बंद रखने की सलाह देने का सीधा मतलब लगाया गया कि कहने वाला देशद्रोही और सत्तापक्ष के खिलाफ षड्यंत्र रचने वाली विपक्ष समर्थित किसी गुप्त बिरादरी का भाग हैं। हर बुरी खबर को देश विरोधी बता कर खबर देने वालों को सरकार पहले ही नाना कानूनों की हथकड़ी-बेड़ियों से इस कदर जकड़ चुकी थी कि महामारी की दूसरी थपेड़ के लगने पर वही हुआ जिसका डर था। स्थानीय तौर पर हमारी सारी स्वास्थ्य कल्याण व्यवस्थाएं, हमारी विश्व में सबसे बड़ी वैक्सीन उत्पादन क्षमता के दावे, हमारे ऑक्सीजन प्लांटों की कैपैसिटी सब हर दिन भरभरा कर गिर रहे हैं और सरकार के पुरजोर खंडन के बावजूद आम नागरिकों ही नहीं, विश्व बिरादरी के बीच भी हम खुद पर दुनिया के संभवत: सबसे बड़े कोविड महामारी के असहाय शिकार होने का ठप्पा लगवा चुके हैं।

पिछले सात सालों में देश में जिस बहुसंख्यवादी मानसिकता और जीवन पद्धति का निर्माण हुआ है, उसमें काफी कुछ ऐसा है जिसका हमारे सामाजिक दायित्व बोध और नैतिक वृत्तियों पर गहरा असर पड़ा है। महारोग के फैलने को इसी बीच कुंभ मेले या बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियों के आयोजन से जोड़ा गया तो तुरंत बातचीत की धारा अल्पसंख्य समुदाय के साल भर से पहले के जमावड़े और विपक्षी दलों के द्वारा भी बड़ी रैलियां करने से जोड़ने की उतावली दिखने लगी। सच तो यह है कि इस महाविपत के बीच समुदायों, धर्मों या राजनैतिक विचारधारा का मतलब कई विभिन्न समूहों के बीच अनिवार्य सह-अस्तित्व बनना बचने की इकलौती सही राह है। जब लाखों की तादाद में हर माह नए लोग संक्रमित हो रहे हों और रोजाना हजारों मर रहे हों, तो समय समझौतों और सह-विमर्श का होता है, टकरावों और कानूनी धमकियों का नहीं। यह अनायास नहीं है कि इस सप्ताह की मन की बात में प्रधानमंत्री जी ने शहरी और ग्रामीण जनता के बीच काम करने वाले स्वैच्छिक संगठनों और मीडिया से कोविड के खिलाफ लड़ाई में सरकार की मदद की गुहार लगाई है। यह समय याद दिलाने का नहीं कि इन सभी वर्गों की बेबाक ईमानदार की गत सात बरसों में उपेक्षा ही नहीं हुई, उनपर सरकार की आलोचना के जुर्म में तरह-तरह की कानूनी कार्रवाइयां की गईं, सामाजिक स्वास्थ्य कल्याण का कार्य कर रहे संगठनों को बाहर से मिलनेवाली आर्थिक मदद को प्रतिबंधित कर उनका काम इस हद तक बाधित किया गया कि वे सब इस समय शिथिल पड़ चुके हैं। फिर भी उनमें हौसला है।

संकटकालीन मुहावरे में हम अक्सर सदियों के कैनवास पर विचार करने के आदी हैं। वह समय बीत चुका है। उनकी हदबंदी से बाहर आकर हमको ही नहीं, सरकार को भी तमाम मानाभिमान और शक त्याग कर नए सिरे से दूसरों की दी हुई बुरी से बुरी खबरों को भी सही तरह से झेलना और उनसे सीखना है। हां, दुनिया भर में इस समय दवा या जीवनरक्षक चिकित्सा उपकरण निर्माताओं के बीच मुनाफाखोरी हो रही है, होगी। लेकिन बाजारवाद और उपभोक्तावाद पिछले सत्तर बरसों में एक कटु यथार्थ बन चुके हैं जिनको अभी गरिया कर कुछ हासिल नहीं होगा। न ही उनको तुरत वासांसिजीर्णानि की तरह त्यागना संभव है।

हां, अमेरिका के राष्ट्र प्रमुख ने कहा कि भारत मैत्री में हाउडी वगैरा ठीक हैं, पर इस समय उनकी प्राथमिकता अपने नागरिकों मतदाताओं की जीवन रक्षा है। इसलिए नोबेल शांति पुरस्कार की इच्छा होते हुए भी वे अपनी वैक्सीन बड़ी तादाद में वितरित नहीं कर सकते। अलबत्ता भारत एक स्वायत्त देश है, पर उनकी चीन से अधिक हमारी भारी स्पर्धा है, इसलिए बिना आज्ञा लिए वे हिंद महासागर में उसकी गतिविधियों की निगरानी को अपने जहाजी बेड़े जब चाहे भेज सकते हैं। उधर, पाकिस्तान ने जिसे हम कोसते नहीं थकते, अपने नागरिक तथा सरकारी- दोनों मंचों से भारत की जनता के लिए सद्भाव तथा मदद देने की इच्छा जताई है। यहां तक कि इस समय जब हमारे महान अरबपति क्रिकेटर जेबें बंद किए खामोश खड़े हैं, एक अंग्रेज खिलाडी कमिंग्स ने अपनी इस दौरे की सारी कमाई भारत को दी है। पाकिस्तानी क्रिकेट के बड़े खिलाड़ियों ने भी भारतीय जनता के लिए सद्भावना जाहिर की है।

जिस तरह साहित्य रचने में शब्द की स्वतंत्र स्थिति और जनभाषा दोनों को खुले दिल से स्वीकार करके ही उत्तम लिखा जा सकता है, राजनीति में भी सचमुच का स्मरणीय जन नेता बन पाने के लिए अपनी महत्ता का सार्वजनिक प्रदर्शन स्थगित कर, आम जनता, उसके प्रतिनिधियों तथा विपक्षी दलों के साथ निरंतर सांप- नेवला युद्ध का मोह भी छोड़ना बहुत जरूरी है। आखिर कितनी मौतें और हों कि नेतृत्व स्वीकार करे कि लोग बड़ी तादाद में मर रहे हैं। बहुत सारे निरपराध लोग! इस महामारी ने हमको नए सिरे से घरेलू और वैश्विक- दोनों स्तरों पर अपनी नीतियां बनाने के लिए विपक्ष और विरोधियों से बेहतर तालमेल की तरफ धकेला है। हमको इस सारी स्थिति को विनयपूर्वक स्वीकार कर नए सिरे से इस आफत से निपटने और उसके बाद देश को फिर स्वस्थ बनाने पर सोचना होगा।

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