कितने शुजात बुखारी?

राइजिंग कश्मीर के दिवंगत संपादक शुजात बुखारी

हत्यारे यह तो नहीं बताएंगे कि उन्होंने एक ऐसे पत्रकार को क्यों मार दिया जो कश्मीर में शांति की चाहत पर कुर्बान रहता था, जिसने खोखले गुस्से की जगह संवाद को महत्व दिया, जिसकी संवेदना और सहानुभूति जवाबी हिंसा का तर्क नहीं बनती थी, जिसका विरोध विध्वंस को आमंत्रण नहीं उससे मुक्त होने के लिए था।

राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी बेहद साहसी थे। इतने साहसी कि तीन जानलेवा हमलों को झेलने के बाद भी डटे रहे। अपनी पूरी समझ, हौसले, सच्चाई, ईमानदारी और साफगोई के साथ डटे रहे। लेकिन आज दहशतगर्दों ने आखिरकार उन्हें मार दिया।

वे श्रीनगर शहर के प्रेस कॉलोनी स्थित अपने ऑफिस से बाहर निकले ही थे कि उन पर गोलियों की बौछार कर दी गई। इस हमले में उनके दो सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। अब हत्यारे यह तो नहीं बताएंगे कि उन्होंने एक ऐसे पत्रकार को क्यों मार दिया जो कश्मीर में शांति की चाहत पर कुर्बान रहता था, जिसने खोखले गुस्से की जगह संवाद को महत्व दिया, जिसकी संवेदना और सहानुभूति जवाबी हिंसा का तर्क नहीं बनती थी, जिसका विरोध विध्वंस को आमंत्रण नहीं उससे मुक्त होने के लिए था। इतने किस्म के इंसानी हुनर से भरे शुजात बुखारी की ईद के एक दिन पहले हत्या कर दी गई।

शुजात बुखारी का चेहरा कश्मीर के बाहर कश्मीर के थोड़े से जाने-पहचाने चेहरों में एक था। उन्हें सुनकर, पढ़कर कश्मीर को लेकर एक उम्मीद जगती थी। ऐसा लगता था कि कश्मीर में सबकुछ पागलपन के हवाले नहीं हो चुका है, अब भी दो तरह के चरमपंथ के बीच खाली जगह बची हुई है जहां शांति के बाग बनाए जा सकते हैं। हिंसा और हिंसा की तैयारी में उलझे कश्मीर का आने वाला वक्त अलग हो सकता है। उन्होंने बार-बार यह एहसास कराया कि कश्मीर किसी मरघट का नाम नहीं है और इसे मरघट बनने से हर हाल में रोका जाना चाहिए।

उनके मरने के बाद जो बातें उन्हें जानने वाले, दोस्त-सहकर्मी उनके बारे में कर रहे हैं, उससे इतना तो पता चलता है कि पत्रकारिता और पत्रकारों की जो छवि हाल के वर्षों में बनी है या बनाई गई है, उससे बिल्कुल अलग उनकी पत्रकारिता थी और वे खुद पत्रकारों की उस चमकीली जमात का हिस्सा थे जिनकी तादाद अब नगण्य हो चुकी है।

शुजात बुखारी के चुनौतीपूर्ण पेशेवर जीवन की कई उपलब्धियां रहीं। मनीला विश्वविद्यालय से उन्होंने पत्रकारिता में एमए किया। वे अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ के ब्यूरो प्रमुख रहे। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले और वे कई संस्थानों में फेलो भी रहे। सार्वजनिक जगत में वे हमेशा एक सुलझे हुए इंसान के तौर पर पेश आते रहे और अपनी पत्रकारिता के जरिये तीखे सवाल पूछते रहे।

शुजात बुखारी जो थे और जो उन्होंने किया, वैसा वही लोग कर पाते हैं जिन्हें अपना वतन और अपना काम पसंद होता है। और अपने वतन से नफरत करने वाले उन जैसे लोगों की हत्या कर देते हैं।

शुजात बुखारी ने बार-बार यह सवाल पूछा था जिसे उनके जाने के बाद भी बार-बार पूछा जाना चाहिए - आखिर कितनी मौतों के बाद जान लेने की यह जिद खत्म होगी? आखिर कितनी मौतों के बाद?

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