'यह जानकर कैसा लगेगा कि आप तो देश से मोहब्बत करते हैं, पर देश नहीं...'

आजाद भारत को घेर रखी गुलामी की तमाम दीवारों पर जब हम 76 वें साल की लकीर खींच रहे हैं, तो इस मुकाम पर हमारे दो मुस्लिम नागरिक याद दिला रहे हैं कि आजादी की इस यात्रा में हमने मूक दर्शक बनकर उनके भरोसे को तोड़ा है। पहले पढ़िए सबीका अब्बास नकवी को...

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सबीका अब्बास नकवी

दक्षिणपंथी बिग्रेड की ओर से कई तरीके से मुझे कई दफा अपमानित किया गया। बुल्ली बाई, सुल्ली डील्स जैसे संबोधन और अनगिनत रेड्डिट सबग्रुप्स (निजी प्रतिक्रियाओं को जगह देने वाला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) की दिलों को भेद देने वाली प्रतिक्रियाएं। स्तंभित ‘नहीं’ होने की अपनी क्षमता से मैं हतप्रभ हूं। यह संताप और भय मेरे रोजाना के जीवन का हिस्सा हो गया है। नूंह में जब से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा शुरू हुई है, मैं नहीं समझती, हममें से कोई ठीक से सो सका है। मुझे अपना घर जला दिए जाने के सपने आते हैं।

नूंह की घटना के बाद एक हफ्ते के भीतर मेरे चचेरे भाई और भतीजे ने अपनी मुस्लिम पहचान की वजह से गंभीर भेदभाव झेला है। हम वीडियो कॉल के जरिये जब जुड़े तो रो पड़े। रात भर अपने समुदाय की सुरक्षा की दुआएं कीं। अड़ोस-पड़ोस में हर एक के बारे में पता किया। 
लेकिन हमें ऑफिस जाना पड़ा। इन सबके बाद भी समाज हमसे सामान्य तरीके से काम करने की अपेक्षा कर रहा था जबकि हमारे घर जला दिए गए थे, व्यापार तहस-नहस कर दिए गए थे।

किसी पर कोई असर नहीं।

मेरे चचेरे भाई और मैं काफी दिनों बाद मिले और- शक नहीं- हाल में हम सबने जो भेदभाव झेला, उस बारे में लंबी बातचीत की। सामान्य बातचीत और हंसी-मजाक की जगह हम इस देश में अपने भविष्य को लेकर सामूहिक तौर पर चिंतित थे। घृणा, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की रोजाना की खबरों से ही जगने वाला समुदाय दूसरे लोगों की तरह ‘गॉसिप करने’ या सामान्य बातचीत करने की बात कैसे सोच सकता है?

हमारे ‘वजूद’ पर गुस्से और विलाप के अस्पष्ट क्षणों से जो कुछ आता है, उसके आधार पर मैं लिख रही हूं कि हम लोगों, भारतीय मुसलमानों के लिए कैसे ‘सामान्य हालात’ का कोई मतलब नहीं रह गया है। सपना देखने और स्वतंत्र, सुरक्षित भविष्य की योजना बनाने और उसे अमल में लाने की कोई सूरत नहीं बची।

हम सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट में जोर से अपने नाम लेने, सलाम वालेकुम और खुदा हाफिज कहने से परहेज करने लगे हैं। संपादकीय लिखने की बात हो या फिर चोरी-जैसी छोटी-सी घटना की एफआईआर कराने के लिए पुलिस स्टेशन जाने की, हमें डर लगने लगा है। हम उन पर कैसे यकीन कर सकते हैं? जो कुछ हम झेल रहे हैं, उसमें वे भी तो एक पक्ष हैं?


जब हम अपने घरों में नमाज अदा करते हैं, तब भी पुलिस बुला ली जाती है! किसी पर कोई असर नहीं है। हम कहां जाएं? मस्जिद और मदरसे जलाए जा रहे, मजार तहस-नहस करने के लिए लोग अभियान चला रहे हैं। हमें मारा जा रहा है, हमारी लिंचिंग की जा रही है। किसी पर कोई असर नहीं है। 

जो हमारा नरसंहार करने की बात कहते हैं, हम उन्हें पुरस्कृत किए जाते और माला पहनाए जाते देखते हैं। जो हमारे खिलाफ हिंसा करते हैं, उन्हें हम लगातार मंच दिए जाते देखते हैं। किसी पर कोई असर नहीं है। 

हमारे ऑफिस के सहकर्मी धर्मांध हैं जो धूर्ततापूर्वक इस्लामोफोबिक चुटकले सुनाते हैं और दक्षिणपंथी सरकार की जीत पर हमारे तीन मंजिला भवनों को सजाया जाता है। किसी पर कोई असर नहीं है। 
जब भी हम अपना सोशल मीडिया फीड रीफ्रेश करते हैं, हमें निशाना बनाता हुआ पॉडकास्ट, रैली, हेट स्पीच, ट्रेन्डिंग हैशटैग, मीम दिखता है। किसी पर कोई असर नहीं है। मुस्लिम महिलाओं की ऑनलाइन नीलामी की जाती है। अदालत गुनाहगारों के भविष्य के लिए चिंता जाहिर करती है। किसी पर कोई असर नहीं। 
 

हमारी लाशों, जली बस्तियों और हमें खलनायक बनाकर चुनाव लड़े और जीते जाते हैं। किसी पर कोई असर नहीं है। 
मैं शायद ही किसी मुसलमान को जानती हूं जिसने किराये पर मकान पाने में मुश्किलें न झेली हों। ब्रोकरों और मकान मालिकों का हमें घूरना और उनकी नजरों में हमारे लिए नफरत, यह आए दिनों का अनुभव है। इन्हीं वजहों से हम दाखिला रद्द कराते हैं, नौकरी छोड़ देनी पड़ती है। किसी पर कोई असर नहीं है। 

मुसलमानों को गुंडों और फिर सरकार द्वारा लूटा जाता है, उनकी लिंचिंग की जाती है, उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाता है। किसी पर कोई असर नहीं है।

जब हमारी लाशों का जिक्र टीवी के समाचार चक्र तो छोड़िए, नीचे की टिकर में भी न हो तो भला कोई कैसे सपने देखे, कैसे खूबसूरत भविष्य की योजना संजोए और कैसे रोजमर्रा की जिंदगी को सामान्य तरीके से जीए? किसी पर कोई असर नहीं है। 


जरा सोचिए, उस इंसान को कैसा महसूस होता होगा, जो अपने देश से तो मोहब्बत करता है लेकिन देश उससे मोहब्बत नहीं करता? मैं उस देश के लिए काला कपड़ा पहनना और फर्श-ए-अजा बिछाना चाहती हूं जिसने इस बात को सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय तौर पर वोट किया कि हमें खत्म कर दिया जाए।

जब हम मारे जा रहे हों और हमें खत्म किया जा रहा हो, वह अपना रोजमर्रा का काम ऐसे कर रहा हो जैसे कुछ हुआ ही न हो। एक देश जो ‘मौत के कुएं’ में गाड़ी चला रहे व्यक्ति के लिए ताली बजा रहे लोगों की तरह हो जो मन ही मन चाह रहे हों कि करतब दिखाने वाला वह इंसान गिरकर मर जाए। 

वे न सिर्फ हमें मिटाना चाहते हैं और बाजारों और थिएटरों, गांवों और कॉलोनियों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों, शहरों और ऑफिसों से बाहर करना चाहते हैं बल्कि नैरेटिव बनाने और फैसले लेने की प्रक्रिया वाली जगहों से भी हमें निकाल बाहर करना चाहते हैं। युवा मुसलमान जेलों में हैं, हमारे दोस्त जेलों में हैं। सामाजिक न्याय की बात करने वाले जागरूक लोग खामोश करा दिए गए हैं। किसी पर कोई असर नहीं है। 

रात में हमारा रूटीन टूट रहा है, सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने से पहले हमें दस हजार बार सोचना पड़ता है, सुरक्षित तरीके से घर पहुंचने के लिए कई तरीके से अपनी पहचान छिपानी पड़ती है, यही कहानी दोहराते-दोहराते हम थक गए हैं। किसी पर कोई असर नहीं है।

हमारे कुछ दोस्त हैं जिन्होंने हमारी जगह नफरत को चुना और हमारा साथ छोड़ दिया। एक पूर्व मित्र और यूनिवर्सिटी के सहपाठी नियमित तौर पर अपमानजनक टेक्स्ट भेजते और मेरी मुस्लिम पहचान पर धूर्त टिप्पणी करते रहते हैं। एक अन्य दोस्त ने अपनी शादी में घृणा फैलाने वाले को आमंत्रित किया, एक अन्य ने एक ऐसे व्यक्ति से अपने आर्ट शो का उद्घाटन कराने का वादा किया जिसने मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार की अपील की थी।

हमारा एक साथी कलाकार इस बात पर गर्व महसूस करता है कि नरसंहार करने वाले एक पागल ने उसके काम की सराहना की। कोई चिंता नहीं करता कि यह हमें किस तरह छोटा महसूस कराता है। कितने अनपेक्षित, कितने घृणित! किसी पर कोई असर नहीं है। 


मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ है, इतना कुछ कि अपनी रोजाना की जिंदगी में अपनी उदासी के बारे में अपने हर साथी नागरिक को बताना चाहती हूं लेकिन इसका क्या कोई मतलब है, अगर मुझे कहा जाए कि हमारे लिए तुमसे प्रेम करना भी मुश्किल है? आप कैसे प्रेम करेंगे अगर दिलों की गहराई से जानते हों कि लव लेटर्स से ज्यादा खून की जरूरत है? 

किसी पर कोई असर नहीं है, फिर भी हम एक दूसरे का खयाल रखते हैं। हम पैसे इकट्ठा करते हैं, मुस्कुराते हैं, मुश्किल हालात में भी चुटकुले सुनाते हैं और अपने अंदर उम्मीदों की पौध को धीरे-धीरे सींचते हुए जिंदा रखने की कोशिश करते हैं।

मैं चाहती हूं कि हम प्रतिरोध करने, विरोध करने, बहादुरी और साहस दिखाने के लिए रोजाना न जगें। मैं चाहती हूं, हम सामान्य तरीके से पढ़ें, काम करें, सांस लें; जो चाहें, पहनें; जो चाहें, खाएं; सपने देखें, जीएं। लेकिन यह सब मुश्किल से मुश्किल होता जा रहा है। हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य आपसी भाईचारे की कमी और हमारे आसपास के लोगों की खामोशी है। मैं आपसे बोलने का अनुरोध नहीं करने जा रही हूं। मैं आपको नींद से भी जगाने नहीं जा रही हूं। आपको आपकी नफरत से भी बाहर निकलने को नहीं कहूंगी। यह भी नहीं कहूंगी कि हमारा खयाल रखो। 
क्योंकि मैं तो एक ही चीज जानती हूं:  
इस जुल्म में जो खामोश रहें 
जालिम भी वही, कातिल भी वही। 

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