आकार पटेल का लेख: भारत में लिंचिंग को रोकना देश का नेतृत्व कर रहे नेताओं की जिम्मेदारी

जिस पैमाने पर और निरंतरता के साथ यह हत्याएं हो रही हैं वह अपने आप में एक कहानी है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि जनता के तौर पर हमें इसे लेकर ज्यादा चिंता है और यह हमारे बारे में कई चीजें बताता है। हम जिसे भीड़ कहते हैं वह असल में भारतीय समाज है।

फोटो: सोशल मीडिया
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आकार पटेल

लगभग दो सदियों से अखबार निकल रहे हैं और अगर हम 1780 के भी अखबार को उठाएं तो उसमें कई खबरें आज जैसी ही होंगी। कहीं एक भारतीय पिता ने प्रेम में पड़ने के कारण अपनी बेटी को मार डाला (एक अपराध जिसे हम ‘इज्जत के लिए हत्या’ कहते हैं)। हम यह उम्मीद करते हैं कि आधुनिकता और शहरीकरण इस तरह की आदिम प्रतिक्रियाओं को समाप्त कर देगा, लेकिन लगता है कि कई मोर्चों पर भारतीय बिल्कुल नहीं बदले और 2018 में भी इज्जत के लिए हत्या लगातार होती रहती है। एक और चीज जिसे हम पीछे नहीं छोड़ पाए, वह है लिंचिंग। शब्दकोश में इसका अर्थ है किसी को कथित अपराध के लिए बिना कानूनी ट्रायल के मार देना। मेरे लिए यह समझना आसान नहीं है कि कैसे लोगों का एक समूह, जिनमें कई लोग एक दूसरे से परिचित नहीं होते, साथ मिलकर एक ऐसे आदमी को मार देता है जिसे वह जानता तक नहीं।

इस सप्ताह एक अजीब सी खबर आई कि लिंचिंग को रोकने के लिए त्रिपुरा सरकार ने जिस व्यक्ति को भेजा था उसे ही गांव वालों ने लिंचिंग में मार दिया। सुकांत चक्रवर्ती नाम का यह शख्स गांव-गांव घूमकर बच्चा-चोरी करने वालों के बारे में सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों की सच्चाई बता रहा था। वह एक लाउडस्पीकर पर लोगों से बोल रहे थे कि ऐसे किसी अफवाह पर विश्वास न करें। तभी उनकी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई और उनके साथ मौजूद दो लोगों पर भी हमले किए गए।

मैं इस खबर के बारे तब तक नहीं जान पाया जब तक मैंने उसे विदेशी अखबार में नहीं पढ़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमारे मीडिया में, खासतौर पर राष्ट्रीय टीवी चैनलों के लिए, लिंचिंग अब कोई बड़ी खबर नहीं रह गई है।

न्यूजरूम खास तरीके से सूचनाओं को आगे बढ़ाता है और जो खबरें लगातार आती है उन्हें महत्व नहीं दिया जाता है क्योंकि वह ‘खबर’ ही नहीं रह जाती है। लिंचिंग के साथ यही हुआ है, जो धीरे-धीरे अखबारों के पहले पन्ने और टीवी चैनलों के प्राइम टाइम बहस से बाहर हो गई है। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि हिंसा खत्म हो चुकी है, बल्कि वह और ज्यादा बढ़ी ही है। सिर्फ पिछले महीने में, 12 भारतीय लिंचिंग में मारे गए, 2-2 असम, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, बंगालस तेलंगाना में और एक-एक गुजरात और कर्नाटक में।

इन घटनाओं का तो लेखा-जोखा है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि कई ऐसी घटनाएं होंगी जिन पर पुलिस ने अपने तरीके अपनाकर पर्दा डाल दिया होगा। सिर्फ ओडिशा में पिछले 30 दिनों में 28 लोगों पर 15 हमले रजिस्टर किए गए हैं।

हमारे देश में जो हो रहा है उसे पढ़कर विदेशी लोग भयभीत हैं। उनके लिए यह समझना आसान नहीं है कि क्यों ऐसी चीजें 2018 में भी हो रही हैं। हम इतने चिंतित भी नहीं हैं कि कोई कार्रवाई कर पाएं। लिंचिंग पर कोई ‘मन की बात’ भी नहीं हो रही है और ऐसी हिंसा के खिलाफ पहले पन्ने पर कोई विज्ञापन भी नहीं आ रहा है और हमारे राष्ट्र और समाज को इससे कितना नुकसान हो रहा है।

अगर सरकार इसके बारे में चिंतित है तो सिर्फ एक बात हो सकती है कि इसे महत्व नहीं दिया जा रहा है।

एक प्रकाशन जो इस तरह की नफरत से भरी हिंसा की घटनाओं का लेखा-जोखा रख रहा था, उसे सरकार ने ऐसा करने से रोकने के लिए कहा, और उसने रोक दिया।

सरकार का बचाव करने वाले कहते हैं कि यह कानून-व्यवस्था की समस्या है और राज्य का मसला है। यह दोनों चीजें सही हैं। लेकिन हम सभी लोगों के लिए यहां एक भूमिका है कि हम अपने आप से पूछें कि लिंचिंग क्या है और यह क्यों होती है।

लगातार होने वाली इस सार्वजनिक हिंसा की तीन वजहे हैं:

पहला, हमारे समाज और धर्म की संरचना के कारण हमारी पहचान सामूहिक है। हम समुदायों को लेकर पहले से चली आ रही धारणा को मानते हैं - बुद्धिमान ब्राह्मण, हिंसक कसाई, मुर्ख नाई आदि। हम व्यक्ति के गुणों को नहीं मानते। सच्चाई यह है कि कोई भी दो लोग एक जैसे नहीं होते।

इसकी वजह से भीड़ के लिए यह आसान हो जाता है क्योंकि इसके पहले कि गुस्से को बढ़ाया जाए और आरोपी के खिलाफ हिंसा शुरू की जाए, उसके बारे में उसकी सामुदायिक पहचान के अलावा सिर्फ थोड़ी सी और सूचना चाहिए होती है।

दूसरा, हिंसा को नियंत्रित करना मुश्किल है क्योंकि भारत में सरकार छोटी है और वह कमजोर है। समाज की सारी कमजोरियां सरकार के पास हैं और समूचित संसाधन नहीं होने की वजह से इस पर दबाव और बढ़ जाता है। भीड़ द्वारा की गई हिंसा की शायद ही कोई घटना आखिरकार कोर्ट में सजा पाती है।

ऐसी जगहों पर भी जहां राज्य की मशीनरी मौजूद है, वह या तो भीड़ को चुनौती देने में सक्षम नहीं है या फिर ऐसा करना नहीं चाहती। एक ताजा उदाहरण को लें, जाहिद नाम के एक शख्स को लिंचिंग में मार दिया गया बावजूद इसके कि उसने अर्द्धसैनिक बलों के कैम्प में शरण ले रखी थी।

तीसरा, आमतौर पर राज्य या व्यक्ति जो हिंसा को नियंत्रित करते हैं, वहीं इसमें भागीदार होते हैं। कानून का राज कमजोर है और इसकी वजह से हत्या हो सकती है, यह जानकारी भी नेताओं को ऐसे कानून लाने से नहीं रोकती जो ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देते हैं जैसे कि बीफ बैन।

अगर भारत में लिंचिंग लगातार हो रही है तो यह उन लोगों की जिम्मेदारी है जो देश का नेतृत्व करते हैं कि वह इसे रोकने की कोशिश करें, इसे बढ़ाएं नहीं।

जिस विदेशी अखबार ‘द गार्जियन’ में मैंने लिंचिंग की खबर देखी, उसे भी पूरा मामला ठीक से समझ नहीं आ रहा था। इसने रिपोर्ट किया, “वीडियो, जैसे पाकिस्तानी सुरक्षा वीडियो होते हैं जिनमें दिखाया जाता है कि एक बच्चे का दो लोग मोटरबाइक पर अपहरण कर रहे हैं, उन्हें सच्ची घटना मान लिया जाता है और उनके साथ अभिभावकों को हाई अलर्ट पर रहने का मोबाइल संदेश भेजा जाता है। इस नकली चेतावनी की प्रतिक्रिया में लोगों में उन्माद फैल जाता है।”

उसने जोड़ा, “हमलों के सिलसिले की वजह से - जिसके निशाने पर ज्यादातर बाहरी होते हैं - सरकारी अधिकारी भी प्रभावशाली प्रतिक्रिया दे पाने में लाचार महसूस कर रहे हैं, क्योंकि जागरूकता अभियान और सार्वजनिक अलर्ट का बहुत सीमित प्रभाव हो रहा है।

लिंचिंग की प्रतिक्रिया में त्रिपुरा ने पूरे राज्य में इंटरनेट पर रोक लगा दी। मेरे लिए यह चकित करने वाला कदम है और यह दिखाता है कि सरकार सोचती है कि सार्वजनिक हत्याओं को रोकने का तरीका व्हाट्सएप को रोकना है।

जिस पैमाने पर और निरंतरता के साथ यह हत्याएं हो रही हैं वह अपने आप में एक कहानी है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि जनता के तौर पर हमें इसे लेकर ज्यादा चिंता है और यह हमारे बारे में कई चीजें बताता है। हम जिसे भीड़ कहते हैं वह असल में भारतीय समाज है।

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Published: 01 Jul 2018, 8:57 PM