गरीब देशों को पीछे छोड़ दिया अगर वैक्सीनेशन में, तो दुनिया का कभी पीछा नहीं छोड़ेगा कोरोना वायरस

वैक्सीन लगाकर अमीर देशों की जनता के स्वास्थ्य की रक्षा कुछ देर को हो भी जाए, पर गरीब देशों में वायरस बचा रहा, तो महामारी की लहरें बार- बार आएंगी। इसे रोकना जरूरी है।

फोटो : सोशल मीडिया
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प्रमोद जोशी

जी-7 सम्मेलन में गरीब देशों को 100 करोड़ वैक्सीन देने की घोषणा हुई, पर यह ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ है। उधर, दक्षिण अफ्रीका में कोविड-19 की तीसरी लहर चल रही है और पूरी दुनिया में तीसरी लहर का खौफ है।

इतिहास बताता है कि महामारियों की लहरें आती हैं। आम तौर पर दूसरी लहर तक लोगों की इम्यूनिटी बढ़ जाती है। पर दक्षिण अफ्रीका और भारत में यह बात गलत निकली। दुनिया की बड़ी आबादी को समय रहते टीके लगा दिए जाएं, तो संभव है कि संक्रमण को कम करने में सफलता मिले, पर ऐसा तभी होगा जब वैक्सिनेशन समरूप होगा।

दुनिया में टीकाकरण इस जनवरी से शुरू हुआ। इसमें वैश्विक असमानता साफ दिखती है। 190 से ज्यादा देशों में इस हफ्ते तक 2.34 अरब से ज्यादा टीके लग चुके हैं। वैश्विक आबादी को करीब 7.7 अरब मानें तो इसका मतलब है कि करीब एक तिहाई आबादी को टीके लगे हैं। पर इस डेटा को ठीक से पढ़ें, तो पता लगेगा कि टीकाकरण विसंगतियों से भरा है।

पिछले रविवार के ब्लूमबर्ग वैक्सिनेशन ट्रैकर में दर्ज कुछ देशों में हुए टीकाकरण पर ध्यान दें। इन देशों में जितनी आबादी को कम-से-कम एक टीका लगा है, उसके प्रतिशत पर नजर डालें, तो अंतर दिखेगा। अमेरिका में 52, ईयू 43, ब्रिटेन 61.8, जर्मनी 48.1, फ्रांस 46.5, इटली 47.8 यूएई 47.3, चीन 31, दक्षिण कोरिया 22, रूस 12.3, जापान 12 और भारत में करीब 17.0 फीसदी आबादी को कम-से-कम एक टीका लगा है। अब दूसरी तरफ देखें। फिलीपींस 4.1, मलेशिया 9.0, ईरान 4.7, मिस्र 2.8, म्यांमार 3.4, पाकिस्तान 3.6, बांग्लादेश 3.5, श्रीलंका 9.3, इराक 1.1, अफगानिस्तान 1.3, सूडान 1.0, वेनेजुएला 0.8, यमन 0.7, केमरून 0.3 और अल्जीरिया तथा द सूडान 0.1। बहुत देशों में टीकाकरण शुरू ही नहीं हुआ है।


असमानताओं की भरमार

अमेरिका से ईयू देश पीछे हैं। वहीं भारत, रूस और दक्षिण कोरिया इन देशों से पीछे। अफ्रीकी देश एकदम पीछे। ईयू की योजना है कि गर्मियों में 70 फीसदी आबादी को दोनों डोज लगजाएं। अमेरिका का लक्ष्य है 4 जुलाई के स्वतंत्रता दिवस तक 64 फीसदी आबादी का टीकाकरण हो जाए। सबसे पहले टीकाकरण अमेरिका में शुरू हुआ, फिर ब्रिटेन में और फिर ईयू में। उनकी आबादी कम है, हमारी ज्यादा। बराबरी संभव नहीं।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के रुचिर अग्रवाल और गीता गोपीनाथ ने महामारी के खात्मे का एक प्रस्ताव बनाया है। इसके अनुसार, इस साल के अंत तक दुनिया की 40 फीसदी और अगले साल जुलाई तक 60 फीसदी आबादी का वैक्सिनेशन हो जाना चाहिए। साथ ही बड़े स्तर पर टेस्टिंग और ट्रेसिंग का काम चलाया जाए। इस अध्ययन के अनुसार, इस काम की कुल लागत होगी करीब 50 अरब डॉलर यानी करीब प्रति व्यक्ति चार डॉलर या करीब 280 रुपये। यह निहायत छोटी रकम है। इतने छोटे निवेश पर दुनिया में इतना बड़ा परिणाम कभी हासिल नहीं हुआ है। दुनिया में औषधि निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फार्मास्युटिकल मैन्यूफैक्चरर्स एंड एसोसिएशंस के 23 अप्रैल के एक बयान में कहा गया है 2021 के अंत तक पूरी दुनिया में 10 अरब वैक्सीन की डोज बनाना संभव है।

दुनिया में उच्च आय वर्ग के देशों की कुल आबादी है 1.2 अरब, मध्य आय वर्ग के देशों की 1.2 अरब, भारत और चीन की आबादी करीब-करीब बराबर, यानी 1.4 और 1.4 यानी 2.8 अरब मानें और निम्न आय वर्ग के 92 देशों की आबादी 2.5 अरब, यानी कुल मिलाकर 7.7 अरब लोगों को अगले अप्रैल तक टीका लगाना होगा। ऐसा हुआ, तभी महामारी से छुटकारा मिलेगा।

पर यह इतना सरल नहीं। जी-7 सम्मेलन की मुख्य चिंता चीन की घेराबंदी थी न कि वैक्सीन के वैश्विक कार्यक्रम पर। जरूरत इस बात की है कि महामारी पर इसी साल काबू पाया जाए। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि इस वायरस से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 10 ट्रिलियन डॉलर की हानि हो सकती है। दुनिया के आधे लोगों का रोजगार छिन सकता है। वैक्सीन लगाकर अमीर देशों की जनता के स्वास्थ्य की रक्षा कुछ देर को हो भी जाए, पर गरीब देशों में वायरस बचा रहा, तो महामारी की लहरें बार- बार आएंगी। इसे रोकना जरूरी है।

कुछ देश पूरी आबादी को वैक्सीन देने पर तुले हैं जबकि दुर्भाग्य है कि बहुत से गरीब देशों को एक भी खुराक नहीं मिली है। सवाल है कि जैसे मुद्राकोष के अर्थशास्त्री वैश्विक वैक्सिनेशन की परिकल्पना कर रहे हैं, क्या वैसा वैश्विक स्वास्थ्य के लिए नहीं किया जा सकता? किया जा सकता है, पर उसके लिए दुनिया की समझ विकसित करनी होगी।

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