मोदी सरकार में निष्पक्ष पत्रकारिता एक जानलेवा व्यवसाय बना, पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत छठे स्थान पर
वर्ष 2014 से 2024 के बीच देश में 28 पत्रकारों की हत्या की गई, जिसमें से लगभग आधे जमीन पर अवैध कब्जा, रेत खनन और अन्य पर्यावरणीय मुद्दों पर पत्रकारिता कर रहे थे। इसी दौरान 30 महिला पत्रकारों के साथ हिंसा, अपमान, चरित्र हनन जैसी वारदातें की गईं।

हमारे देश में मेनस्ट्रीम मीडिया में तो पत्रकार बचे ही नहीं हैं, सभी चाटुकार हैं। निष्पक्ष पत्रकार केवल बहुत छोटे मीडिया संस्थानों में या फिर कुछ हद तक सोशल मीडिया पर बचे हैं। मेनस्ट्रीम के पत्रकारों और चाटुकारों ने केवल जनता को उनके सरोकारों वाले समाचार से दूर ही नहीं रखा है बल्कि निष्पक्ष पत्रकारों के जीवन को खतरे में डाल दिया है। हमारे देश में निष्पक्ष पत्रकारिता एक जानलेवा व्यवसाय बन गया है। कभी निष्पक्ष और खोजी पत्रकारिता पर वाहवाही मिलती थी, अब मोदी जी के विकसित भारत में इसके लिए जान देनी पड़ती है।
वर्ष 2014 से 2024 के बीच देश में 28 पत्रकारों की हत्या की गई, जिसमें से लगभग आधे जमीन पर अवैध कब्जा, रेत खनन और ऐसे ही दूसरे पर्यावरणीय मुद्दों पर पत्रकारिता कर रहे थे। इसी दौरान 30 महिला पत्रकारों के साथ हिंसा, अपमान, चरित्र हनन जैसी वारदातें की गईं, 148 पत्रकारों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई गई। पत्रकारों की हत्या या इनके विरुद्ध हिंसा और चरित्र हनन में सरकारें, पूंजीपति, माफिया और सत्ता में बैठी पार्टी के कार्यकर्ता सभी शामिल रहते हैं। मेनस्ट्रीम के चाटुकार तो अब बेरोजगारी और गरीबी के फायदे बताने लगे हैं, मोदी जी को भारत का पर्यायवाची बताने लगे हैं और विपक्ष को देश के लिए खतरा साबित करने में लगे हैं।
कमेटी टू प्रोटेक्ट जरनलिस्ट्स (CPJ) की हाल में प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में दुनिया के 22 देशों में 129 पत्रकार या मीडियाकर्मी मारे गए और यह संख्या एक नया रिकार्ड है। यह संस्था वर्ष 1992 से लगातार पत्रकारों पर होने वाली हिंसा का लेखाजोखा रख रही है, पर किसी भी एक वर्ष में मारे गए पत्रकारों की यह संख्या अभूतपूर्व है। मारे गए पत्रकारों की सूची में कुल 2 हत्याओं के साथ भारत का स्थान छठा है। भारत के साथ ही पड़ोसी देश पाकिस्तान भी छठे स्थान पर है। नेपाल और बांग्लादेश में लंबे हिंसक आंदोलनों के बाद भी केवल 1-1 पत्रकार की हत्या हुई।
इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया लगातार अस्थिर होती जा रही है, अनेक देश युद्ध और कुछ देश गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहे हैं- ऐसे में पत्रकारों पर जोखिम बढ़ जाते हैं और अब तो इजरायल और सूडान जैसे देशों की सेनाएं पत्रकारों पर सीधे हमले करने लगी हैं। जिन देशों में युद्ध नहीं हो रहे हैं– मेक्सिको, भारत और फ़िलिपींस– जैसे देशों में भी पत्रकारों पर हिंसा बढ़ती जा रही है। कुल 129 हत्याओं में से लगभग दो-तिहाई हत्या अकेले इजरायल के सुरक्षाकर्मियों ने फिलिस्टिन के विरुद्ध युद्ध में की है– यह संख्या 86 है। इसके बाद 9 हत्याओं के साथ सूडान, 6 हत्याओं के साथ मेक्सिको, रूसी सैनिकों द्वारा यूक्रेन में 4 हत्याएं, फ़िलिपींस में 3 पत्रकारों की हत्या और इसके बाद 2 हत्याओं के साथ भारत है। पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की कुल हत्याओं में से तीन-चौथाई हत्याएं अशांत या युद्ध वाले क्षेत्रों में की गई हैं।
पत्रकारों या अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित हरेक रिपोर्ट भारत की एक प्रजातंत्र वाली नहीं बल्कि निरंकुश तानाशाही वाली तस्वीर प्रस्तुत करती है, जिसमें अभिव्यक्ति पूरी तरह से गुलाम है। ऐसी हरेक रिपोर्ट में आंकड़े भले ही एक-दूसरे से अलग हों पर तथ्य केवल यही बताते हैं कि सत्ता निष्पक्ष मीडिया का दमन कर रही है। जनवरी के शुरू में ही इंटेरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स की रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2025 में हमारे देश में 4 पत्रकारों की हत्या की गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर 23 देशों में 128 पत्रकारों की हत्या की गई, जिसमें 11 महिलाएं थीं। हत्या के संदर्भ में फिलिस्तीन, सूडान, पेरू, यूक्रेन और यमन के बाद छठे स्थान पर भारत है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकारों की सबसे अधिक हत्याएं मध्य-पूर्व के देशों में 74 और फिर 18 हत्याओं के साथ अफ्रीका दूसरे स्थान पर है। तीसरे स्थान पर एशिया-प्रशांत का क्षेत्र है जिसमें 15 पत्रकार मारे गए। इन 15 पत्रकारों में से 12 पत्रकार तो भारत और इसके पड़ोसी देशों में मारे गए– भारत में 4, पाकिस्तान में 3, अफगानिस्तान में 2, बांग्लादेश में 2 और नेपाल में 1। इन आंकड़ों से ही भारत और इसके पड़ोसी देशों में पत्रकारों पर बढ़ते खतरों का आभास होता है।
फ्री स्पीच कलेक्टिव नामक संस्था के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में 8 पत्रकारों और एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की हत्या की गई। इन हत्याओं के अतिरिक्त केवल सत्ता की नीतियों के विरोध में आवाज उठाने के लिए 117 लोगों को, जिनमें पत्रकार भी शामिल हैं, पुलिस ने अरेस्ट किया, 40 पर हिंसक हमले किए गए, 19 का चरित्र हनन किया गया। मोदी जी के विकसित भारत में सत्ता के मंत्री-संतरी द्वारा उगले गए हेटस्पीच पूरी तरीके से मान्य हैं, जबकि पत्रकारों और सामान्य नागरिकों के फ्रीस्पीच के अधिकार का पूरी तरीके से दमन किया जा रहा है।
वर्ष 2025 में सत्ता द्वारा 14875 मामलों में फ्री स्पीच के अधिकारों का दमन किया गया, 208 लोगों को तमाम कानूनी धाराओं में आरोपित किया गया और 3070 बार इंटरनेट की बंदी की गई। वर्ष 2025 में 11385 मामलों में सरकार ने अपने सेंसरशिप के अधिकारों का दुरुपयोग किया– इसमें से अधिकतर मामलों में सही सूचना के प्रसार को रोकने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर यूजर के संदेशों को ब्लॉक करना है।
हमारे देश में हेटस्पीच भाषा का एक नया नॉर्मल है। ध्रुवीकरण वाली भाषा बोलिए, हिंसा को भड़काइए, झूठ-फरेब वाली भाषा बोलिए– सत्ता की यही भाषा बन गई है। सत्ता को हेटस्पीच से इस कदर लगाव हो गया है कि अब तो फ्रीस्पीच उसे गाली लगने लगी है। अब तो न्यायालयों को भी हेट स्पीच की भाषा ही फ्री स्पीच नजर आने लगी है। निष्पक्ष पत्रकारों की भाषा लगातार दबाई जा रही है, कुचली जा रही है और मेनस्ट्रीम का झूठ और फरेब ही समाचार बन चुका है।
इस कट्टर दक्षिणपंथी सत्ता और मीडिया के आका पूंजीपति धन्ना सेठ हैं, जिन्हें सरकार सबकुछ दान कर देने पर आमदा है। पूंजीवाद का एक सीधा सा उसूल है– जनता की समस्याएं नजरअंदाज कर एक नई समस्या पैदा करना और फिर उसके समाधान के नाम पर जनता से सबकुछ लूट लेना। इस “सबकुछ” में केवल संसाधन और श्रम ही शामिल नहीं हैं बल्कि सबसे पहले मौलिक अधिकारों की लूट होती है। देश में जो सत्तानशीं हैं, उनका एक प्लेबुक है, हरेक घटना का एक ढर्रा है। जब भी कोई सत्ता से प्रश्न करता है, सत्ता शांत आंदोलनों में भी हिंसा पैदा करती है। कम से कम इस सत्ता के लिए कुछ नर-बलियां कोई मायने नहीं रखती हैं।
हिंसा होते ही मीडिया और सत्ता पर काबिज हिंसा के पुजारी किसी एक को बली का बकरा बनाने में व्यस्त हो जाते हैं। कुछ ही मिनटों के अंदर उसके पाकिस्तान से संबंध उजागर हो जाते हैं, पाकिस्तानी उसके मेहमान हो जाते हैं, तमाम अवैध विदेशी फंड सामने आते हैं, पुलिस के बड़े अधिकारी शर्मनाक तरीके से प्रेस को ब्रीफ करते हुए आरोपों की झड़ी लगा देते हैं। आश्चर्य यह है कि किसी घटना से चंद मिनट पहले भी इनमें से कोई जानकारी सत्ता या पुलिस किसी के पास नहीं रहती है, पर चंद मिनटों में ही मीडिया और सत्ता फर्जी वीडिओ और समाचार गढ़ कर किसी भी प्रतिष्ठित व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा करार देती है। अनेक मामलों में तो हमारी तथाकथित न्याय व्यवस्था भी इसमें पूरी भागीदारी निभाती है। जाहिर है, ऐसे में सच बोलना ही सबसे बड़ा अपराध है और सच बोलने वाले आतंकवादी– कम से कम हमारे देश की व्यवस्था ऐसा ही मानती है।
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