विचार

बेगुसराय में कन्हैया के समर्थन में उतरा ‘अनहद’, प्रचार की सीमा के दौरान कीं 70 से ज्यादा सभाएं

बिहार की बेगूसराय सीट पर 29 अप्रैल को वोटिंग होनी है। इस सीट से जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार सीपीआई के उम्मीदवार हैं। कन्हैया के लिए इस बार सामाजिक संस्था ‘अनहद’ ने भी प्रचार किया। यह पहला मौका था जब अनहद ने किसी चुनाव में किसी खास उम्मीदवार का प्रचार किया हो।

फोटो : शबनम हाशमी

शबनम हाशमी

देश की कुछ चंद चर्चित लोकसभा सीटों में बेगूसराय की सीट भी शामिल है। बेगूसराय में29 अप्रैल को मतदान होना है। मैं 8 दिन के बाद कल रात दिल्ली लौटी हूं। जैसे जैसे दोस्तों को पता चला के ‘अनहद’ की टीम बेगुसराय में है, उनके सन्देश आते रहे - कन्हैया को यह कहना, कन्हैया को वह कहना। जब मैंने कहा की हम लोग कन्हैया से नहीं मिल पाएंगे तो काफी हैरानी भी जताई लोगों ने। पता चला की बीहट, जहां, कन्हैया का घर है, में जमावड़ा था देश के चारों तरफ से आए लोगों का।

लेकिन ‘अनहद‘ की पूरी टीम जिसमें हम दस लोग शामिल थे, हमें फुर्सत ही नहीं मिली के बीहट की तरफ जा पाते। सुबह 8 बजे से रात 1-2 बजे तक रोज़ कहां वक़्त निकल गया मालूम नहीं चला।

‘अनहद’ एक दिल्ली की संस्था है जिसकी स्थापना गुजरात 2002 के नरसंहार के बाद की गई थी। ‘अनहद’ ने पिछले 16 वर्षों में देश के विभिन्न भागों में नफरत और हिंसा की राजनीति के खिलाफ प्यार, भाईचारा और अमन का संदेश पहुंचाने के लिए बड़े बड़े कार्यक्रम किए हैं। अनहद की स्थापना के बाद से हमने लगातर चुनाव के समय लोकतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता के लिए बड़े आंदोलन किए हैं। हम परचों और नुक्कड़ सभाओं के द्वारा लोगों तक हमारा संदेश लेकर जाते हैं।

‘अनहद’ ने कभी किसी पार्टी के लिए प्रचार नहीं किया, किसी उम्मीदवार के लिए भी नहीं किया, हमारा प्रचार हमेशा लोकतन्त्र की रक्षा और संविधान की रक्षा के लिए किया गया। यह पहली बार है जब हमने एक हफ्ते का प्रचार सीधा एक उम्मीदवार के लिए किया है।

पिछले पांच वर्षों में पूरे देश में जो नफरत, हिंसा का सहारा लेकर अराजकता का माहौल बनाया गया है और जिस तरह की गरीब विरोधी नीतियों की वजह से हज़ारों किसानो ने आत्महत्या की, महिलाओं के बलात्कार हुए, बलात्कारियों के पक्ष में सत्ता पक्ष के नेताओं ने रैली निकाली, नोटबंदी के बहाने गरीबों को लूटा गया, जी एस टी के ज़रिए व्यापारियों के धंधे ठप किए गए, न्यूनतम बैंक बैलेंस के बहाने लाखों गरीब लोगों के बैंक खाली कर दिए गए, प्रधान मंत्री मोदी विदेशों की यात्रा करते रहे और बजाए देश के लिए समझौता करने के वो पूंजीपतियों के लिए समझौता करते रहे, भीड़ तंत्र द्वारा 90 से ऊपर लोगों को बेहरेमी से पीट पीट कर मार दिया गया, हर आवाज़ उठाने वाले को देशद्रोही क़रार दे दिया गया, सरकारी पैसे का एक बड़ा हिस्सा केवल प्रचार में लगाया गया, जिस तरह हमारे सब संवैधानिक ढांचों को एक एक करके ख़त्म करने या तानाशाही हुकूमत द्वारा उनको बर्बाद करने की मोहिम की गई, उसमे पहली बार हमने फैसला किया कि इस बार हम सीधा प्रचार में उतरेंगे।

हमारी टीम में प्रताप सिंह नेगी दिल्ली से, मीर हैदराबाद से, फैज़ान आलम छात्र दिल्ली से, मनीष राय बेगुसराय से, मसूद इकबाल कटिहार से, देव देसाई युवा लीडर गुजरात से, गौहर रज़ा प्रसिद्ध वैज्ञानिक और कवि दिल्ली से, लीना दबीरू वकील और जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता दिल्ली से और शबनम हाशमी, ‘अनहद’ की संस्थापक और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। ‘अनहद’ की 10 लोगों की टीम का एक हफ्ते का कैम्पेन 26 अप्रैल की रात खत्म हो गया। हमने इस दौरान करीब 70 मोहल्ला मीटिंग कीं।

हमने छोटी बलिया, लाखमिनिया, बारबिगही, छोटी संन्हा, बड़ी संन्हा, पांचवीर, तेतरी, बड़ी बलिया उत्तर, पोखरीया, बड़ी बलिया दक्षिण, कल्लू चक, कस्बा, सालेह चक, हुसैना, सिरजा, लड़वरा, कारीचाक, हसनपुर, फूलकरी, बखरी, छोटी मौजी, लार्वारा, कारीचक, हसनपुर, फूलकारी, खाटॉपुर उत्तर, खाटॉपुर दक्षिन, खाटॉपुर हेमरा टोला, चक हामिद, खाटॉपुर मस्जिद टोला, इमआदपुर, छोटी खाखरवा, बड़ी खाखरवा, घाघरा और अन्य कई जगह पर कार्यक्रम किए।

बहुत दलीलें दी जा रही हैं, कन्हैया के बारे में बहुत अफवाहें फैलाई जा रही हैं। कन्हैया के साथ खड़े होने का एक बहुत सोचा समझा फैसला था। एक बुलंद नौजवान आवाज़ देश में जे एन यू से उठी और उसपर भी देशद्रोह का झूठा इल्ज़ाम लगाया गया, उस पर कचेहरी के अंदर हमला कराया गया और जेल में डाल दिया गया। लेकिन बेगुसराय की धरती के बेटे कन्हैया ने सर नहीं झुकाया। कन्हैया की आवाज़ आज के हालात में देश के स्तर पर सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों से टक्कर लेने के लिए एक अहम आवाज़ है। आज कन्हैया भारत के नौजवान, महिलाओं, बुज़ुर्गों के दिलों में प्रतिरोध की लड़ाई का एक अहम प्रतीक बन चुका है। कन्हैया की आवाज़ रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के वक़्त भी बुलंद थी , नजीब के ग़ायब होने पर भी बुलंद थी , किसानों की आत्महत्या पर भी उसकी आवाज़ सुनायी देती है और जब उन में दलितों पर हमले होते हैं या जब भीड़ तंत्र द्वारा गौरक्षा के नाम पर बेहरमी से एक के बाद एक 90 से ऊपर लोगों की सड़कों पर लिंचिंग हुयी तब भी उसकी आवाज़ बुलंद थी।

कन्हैया की आवाज़ जाति , धर्म, समुदाय , क्षेत्र से ऊपर उठ कर आज हर एक गरीब, हर पीड़ित की आवाज़ है। कन्हैया देश के नैजवानों की धड़कन में शामिल है आज।

हम गठबंधन के उम्मीदवार की इज़्ज़त करते हैं, लेकिन आज संसद में और पूरे देश में कन्हैया की आवाज़ चाहिए। एक ऐसी बुलंद आवाज़ चाहिए जो बग़ैर डरे फासीवादी, गैर लोकतांत्रिक और तानाशाह ताकत का सामना कर सके। कन्हैया फासीवादी ताक़तों के सामने एक बुलंद आवाज़ होने के साथ-साथ, हमारे उस बराबरी के सपने की भी आवाज़ है जो हमने स्वतंत्र भारत के लिए देखा था, एक ऐसा भारत जो सबका है, जहां सबको समानता से रहने का अधिकार है।

हमारी पीढ़ी के सामाजिक कार्यकर्ता जो पिछले 5-6 दशक इस बराबरी की लड़ाई में, इस ख्वाब को साकार करने में लगा चुके हैं और उन्हें लगने लगा था की शायद हमारे बराबरी का समाज बनाने का सपना कभी पूरा नहीं होगा , उन्हें अब कन्हैया और उसके जैसे बहुत सारे नौजवान साथियों में एक ऐसी शम्मा दिखती है , जो हमारे जाने के बाद भी जलती रहेगी।

तुम नफरत नफरत नफरत हो

हम प्रेम , मोहब्बत प्यार अमन

हम भगत सिंह, हम राजगुरु

हम इंक़लाब का नारा हैं

हमें उम्मीद है कि बेगूसराय के आम लोग अपने धरती के बेटे को संसद भेजेंगे क्योंकि यह हम जानते हैं के कन्हैया रोज़ पैदा नहीं होते।

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