इतिहास के वे जननायक जो थे सांप्रदायिक एकता की मिसाल, पर आज उनका हो रहा है ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल

1857 की घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है कि मध्यकाल में तथा 1858 से पहले भारत की जनता और राजनीति अपने मूल रूप में साम्प्रदायिक नहीं थी। एक ओर मंगल पांडेय, लक्ष्मीबाई, तांत्याटोपे, नाना साहब थे तो दूसरी ओर बख्त खान, बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह भी थे।

फोटो: सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

भारतीय इतिहास में ऐसे कितने ही उदाहरण मौजूद हैं जब मुसलमान शासकों ने मंदिरों के लिए मुक्त हृदय से दान दिया और विभिन्न धर्मों के विद्वानों की सहायता की। वृंदावन और मथुरा के मंदिरों से मुगल शासकों के घनिष्ठ संबंधों के बारे में यहां के मंदिरों से अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज प्राप्त हुए हैं। ऐसे 50 से अधिक दस्तावेजों के आधार पर दो विख्यात इतिहासकारों तारापद मुखर्जी और इरफान हबीब ने अपने एक अध्ययन में बताया है कि अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ ने न केवल इन मन्दिरों की सहायता के लिए बहुत-सी जमीन दी थी अपितु मन्दिरों के प्रबन्ध में उत्पन्न झगड़ों को सुलझाने में, मन्दिरों के ठीक रख-रखाव और मन्दिरों के सेवकों की समस्याओं को सुलझाने में उनकी व उनके अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती थी।

मथुरा क्षेत्र में मन्दिरों और मन्दिर-सेवकों के लिए मुगल राज्य की ओर से दी जाने वाली सहायता को व्यवस्थित करने के लिए सम्राट अकबर ने कई फरमान जारी किये। इन फरमानों द्वारा वृन्दावन, मथुरा और उसके आसपास के क्षेत्र के 35 मन्दिरों के लिए 1000 बीघा जमीन की व्यवस्था की गई।

अकबर ने इबादत खाना (प्रार्थना भवन) बनवाया जहां हिन्दू-मुस्लिम, जैन, ईसाई, पारसी सब धर्मों के अनुयायी व विद्वान धार्मिक विचारों के आदान-प्रदान में हिस्सा लेते थे। अकबर ने एक बड़ा अनुवाद का विभाग खोला जहां गीता, रामायण, महाभारत, अथर्ववेद व बाइबल का अनुवाद फारसी में हुआ। अकबर ने हिन्दू-मुस्लिम दोनों चित्रकारों को संरक्षण व प्रोत्साहन दिया। अकबर के समकालीन राणा प्रताप ने मुस्लिम सेनापति को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी, सिंधी मुसलमानों को जागीर दी और मुसलमान चित्रकारों को संरक्षण दिया। अकबर और प्रताप दोनों अपनी जगह महान थे।

विख्यात इतिहासकारों के अनुसार अयोध्या के एक तीर्थस्थान के रूप में विकसित होने में मुसलमान नवाबों से प्राप्त संरक्षण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिन्दुओं के पवित्र धार्मिक स्थलों का संरक्षण और उनके मन्दिरों को दान देना नवाबों की नीति का एक अभिन्न अंग था। नवाब सफदरजंग के दीवान ने अयोध्या में कई मन्दिर बनवाए और कुछ की मरम्मत करवाई।

शिवाजी हमारे देश के महान जननायक हैं, पर दुर्भाग्य से कुछ साम्प्रदायिक संकीर्ण विचारों वाले संगठन इस जननायक के प्रति लोगों की श्रद्धा का गलत उपयोग एक समुदाय विशेष के विरुद्ध लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए करते रहे हैं। कितने दुख की बात है कि जो जननायक वास्तव में देश के विभिन्न समुदायों की एकता के प्रतीक हैं उन्हीं का उपयोग देश की एकता में दरार डालने के लिए किया जाता है।

अपनी पुस्तक ‘न्यू हिस्ट्री आफ द मराठास’ (मराठों का नया इतिहास) में जी एस सरदेसाई लिखते हैं, “शिवाजी अपने गुरुओं से सलाह किए बिना कोई महत्त्वपूर्ण कार्य आरम्भ नहीं करते थे। इस संदर्भ में (गुरु के चुनाव में) हिन्दू और मुस्लिम सन्तों के बीच कोई भेद नहीं था। वे सबको समान आदर देते थे। अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के सामने जहां उन्होंने पूजा के लिए जगदीश्वर का मन्दिर बनवाया वहीं मुस्लिमों के लिए एक विशेष मस्जिद भी बनवाई।”

सरदेसाई आगे लिखते हैं, “हिन्दू धर्म की रक्षा की भूमिका में शिवाजी ने मुस्लिम समुदाय के प्रति या उनके धर्म के प्रति कभी कोई नफरत नहीं दिखाई। पूरी धार्मिक आजादी उनका आदर्श था और इसी का प्रचलन उनके राज्य में था। बाबा याकूत जैसे मुस्लिम सन्तों के प्रति उनमें बहुत आदर था व उनके धर्म स्थल को शिवाजी की ओर से आर्थिक सहायता भी मिलती थी। शिवाजी के अनेक मुस्लिम सहायक थे जो तन-मन से उनसे सहयोग करते थे।

‘शिवाजी - एक देशभक्त का चित्रण’ (पोट्रेट आफ ए पैट्रियोट) नामक पुस्तक में वी बी कुलकर्णी लिखते हैं, “शिवाजी की अन्य धर्मों के प्रति इज्जत उतनी ही गहरी थी जितनी अपने धर्म के प्रति। मुस्लिम व ईसाई धार्मिक व्यक्तियों के प्रति उन्होंने बहुत आदर दिखाया। केल्सी के बाबा याकूत को वे अपने आदरणीय मित्र व अपने पर कृपा करने वाले के रूप में देखते थे। अनेक मुस्लिम धर्म स्थलों को उनकी सरकार से उदार सहायता मिलती थी। सूरत में जब वे फादर एमब्रोस को मिले तो उनके प्रति भी उन्होंने ऐसी ही इज्जत दिखाई। जैसे वे मन्दिर और गीता की बहुत इज्जत करते थे, वैसे ही मस्जिद और कुरान की बहुत इज्जत करते थे। युद्ध के समय कभी कुरान उनके हाथ में आ जाती थी तो इसे किसी मुस्लिम धार्मिक व्यक्ति को सौंप देते थे।”

सोलहवीं शताब्दी में दक्खन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण शासक अली आदिल शाह था जिसे लोग सूफी कहते थे। वह हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई धार्मिक लोगों से धर्म के बारे में विचारों का आदान-प्रदान करता रहता था। उसने बहुत अच्छी लाइब्रेरी बनाई जिसमें संस्कृत के विद्वान वामन पंडित को नियुक्त किया। उसके उत्तराधिकारी इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय को ‘गरीबों का दोस्त’ कहा जाता था। धर्म में सहिष्णुता के कारण उसे जगत गुरू भी कहा जाता था। वह संगीतज्ञों का बहुत बड़ा संरक्षक था व अपनी नई राजधानी नौरसपुर में उसने बहुत से संगीतकारों को एकत्र किया। अपने गीतों में उसने कई बार सरस्वती देवी की वन्दना की है। कई हिन्दू मन्दिरों और संतों को उसने संरक्षण दिया। पन्थरपुर के धार्मिक स्थानों को भी उसने सहायता दी व यह स्थान महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का केन्द्र बन गया।

पन्द्रहवीं शताब्दी में काश्मीर में राजा जैन-उल-अब्दीन ने, जिन्हें इज्जत से ‘बुड शाह’ या “महान राजा” कहा जाता है, धार्मिक सहिष्णुता की अच्छी मिसाल कायम की। इस राजा ने मन्दिर बनवाए व हिन्दुओं के त्यौहारों में सार्वजनिक तौर पर शामिल हुआ। पिछले शासकों की गलतियों से जो हिन्दू भाग गए थे, उसने उन्हें वापिस लाने के लिए संदेशवाहक भेजे। वह संस्कृत और फारसी दोनों का विद्वान था। उपनिषदों के एक बड़े हिस्से को फारसी में अनुवाद करवाने में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वर्ष 1857 में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जो विद्रोह भारत के अनेक भागों में भड़क उठा, उसमें हिन्दू मुस्लिम एकता स्पष्ट देखी गई। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर विपिन चन्द्र ने लिखा है, “1857 के विद्रोह की शक्ति बहुत कुछ हिन्दु-मुस्लिम एकता में निहित थी। सैनिक तथा जनता हो या नेता, हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच पूरा-पूरा सहयोग देखा गया। सभी विद्रोहयों ने एक मुसलमान बादशाह को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया था। मेरठ के हिन्दू सिपाहियों के मन में पहला विचार दिल्ली की ओर कूच करने का ही आया। हिन्दू और मुसलमान विद्रोही और सिपाही एक दूसरे की भावनाओं का पूरा-पूरा सम्मान करते थे। उदाहरण के लिए विद्रोह जहां भी सफल हुआ वहीं हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करते हुए फौरन ही गौ-हत्या बन्द करने के आदेश जारी कर दिए गए। वास्तव में 1857 की घटनाओं से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि मध्यकाल में तथा 1858 से पहले भारत की जनता और राजनीति अपने मूल रूप में साम्प्रदायिक नहीं थी।”

इस विद्रोह में एक ओर मंगल पांडेय, लक्ष्मीबाई, तांत्याटोपे, नाना साहब और बिहार के कंवर सिंह थे तो दूसरी ओर बख्त खान, बेगम हजरत महल और फैजाबाद के मौलवी अहमतुल्लाह ने भी उनका साथ दिया। अवध की बेगम हजरत महल ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध जमकर लड़ाई की।

इसके बाद भी स्वाधीनता सेनानियों व समाज-सुधारकों ने विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के मेल-जोल और एकता पर बल दिया। स्वामी विवेकानन्द ने लिखा, “हमारी अपनी मातृभूमि के लिए दो महान धर्मों - हिन्दुत्व तथा इस्लाम का संयोग ही - एकमात्र आशा है।” अन्यत्र उन्होंने कृत्रिम सीमाएं लांघते हुए लिखा, “मेरा ईश्वर दुखी मानव है, मेरा ईश्वर पीड़ित मानव है, मेरा ईश्वर हर जाति का निर्धन मनुष्य है।”

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