‘वाट्सएप यूनिवर्सिटी’ से किए जा रहे मिथ्या, झूठे प्रचार के दौर में ऐतिहासिक शोध, परिप्रेक्ष्य में जरूरी है जवाब देना

ऐतिहासिक रूप से सांस्कृतिक विविधता हमारे राष्ट्रीय और सभ्यतागत चरित्र का प्रतीक है। वहीं, सांप्रदायिकता और कट्टरवाद की विनाशकारी खींचतान से समाज बुरी तरह आहत होता रहा है। धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीतिक लामबंदी देश और समाज को हर कालखंड में प्रभावित करती रही है

फोटो: सोशल मीडिया
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रज़ीउद्दीन अकील

आज के रक्तरंजित राजनीतिक माहौल में विचारधाराओं के संघर्ष और इतिहास को अपने हित-स्वार्थों के लिए तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने के संदर्भ में इतिहास लेखन की ऐतिहासिक विधियों और दर्शन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण विषय-वस्तुओं को समझना जरूरी है। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से बाहर सार्वजनिक ज्ञान-क्षेत्र में पहचान की राजनीति-हिंदू-मुसलमान, जात-पात, राष्ट्रवाद, क्षेत्रीयता या भाषाई पहचान के मुद्दे और इससे जुड़े संघर्ष में इतिहास का इस्तेमाल एक हथकंडे के रूप में किया जाता है। इस तरह के राजनीतिक जोड़- तोड़ में ऐतिहासिक साक्ष्यों और तथ्यों पर सामाजिक स्मृतियों और मान्यताओं को प्राथमिकता दी जाती है। तथ्य और सत्य को मिथ्या प्रचार और दुष्प्रचार से दबा दिया जाता है। अकादमिक संस्थानों में अपनी पैठ बना लेने वाले ऐसे तत्व तथ्यों की व्याख्या और विवेचनमें अपने पूर्वाग्रह की सड़ांध फैलाकर ऐतिहासिक विमर्श को भी दूषित करते हैं। पूर्वाग्रह से दूषित इस तरह की व्याख्याएं ऐतिहासिक कम बल्कि राजनीतिक प्रोपेगेंडा ज्यादा होती हैं।

अकादमिक, प्रोफेशनल या पेशेवर इतिहास की बुनियादी रूपरेखा पर नजर डालें तो यह आज की राजनीति से परे विगत से जुड़े मुद्दों, घटनाओं और प्रश्नों का खुद उनके संदर्भ में ऐतिहासिक महत्व को समझने का एक निरंतर प्रयास है। यह कार्य स्रोतों- साक्ष्यों और तथ्यों के प्रति सच्ची निष्ठा से किया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे न्यायालयों में जजों से अपेक्षा की जाती है। इस तरह यह काम पूरी जिम्मेदारी, ईमानदारी, निरपेक्ष और वस्तुनिष्ठ तरीके से तथ्यों के आधार पर किया जाता है। यह संभव है कि तथ्यों की व्याख्या और विवरण में पूर्वाग्रह और वस्तुनिष्ठता का सवाल खड़ा हो जाए लेकिन नैरेटिव या आख्यान को राजनीति से प्रेरित होने के बजाय ऐतिहासिक पद्धति तथा शोध के पैमाने पर खरा उतरना चाहिए। यह आख्यानगद्य या पद्य में भी हो सकता है जैसा कि हम प्राचीन और मध्यकालीन काव्यों में देखते हैं- यानी इतिहास कविता की शक्ल में भी लिखा जा सकता है, बशर्ते उसमें जानबूझकर यथार्थ, सत्यता या वास्तविकता को तिलांजलिन दे दी गई हो। आज भी इतिहास लेखन सच के पैमाने पर जूझ रहा है। साक्ष्यों और तथ्यों की प्रमाणिकता के आधार पर प्रासंगिक ऐतिहासिक प्रश्नों के विश्लेषण का काम इतिहासकार विभिन्न पारंपरिक और नए तरीकों से कर रहे हैं। वे इस ऐतिहासिक धारणा पर कायम हैं कि इतिहासकारों की उनकी समकालीन सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं से प्रतिबद्धता इतिहास में निष्पक्षतावाद के आदर्शोंका उल्लंघन है। इस तरह एक ऐसे दौर में जब विघटनकारी राजनीति ने लोगों को वैमनस्यकी अफीम पिलाकर समाज को दो या उससे अधिक टुकड़ों- हम और वह अथवा दोस्त और दुश्मन, में बांटकर एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया है, तो ऐसे में इतिहासकार या तो ऐसी घटिया दर्जे की राजनीतिका शिकार हो सकता है या फिर राजनीतिक दबाव या लालच से ऊपर उठकर विद्वता की नई मिसाल कायम कर सकता है। अच्छे इतिहासकारों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने समय की ओछी राजनीति से अपना दामन बचाकर विद्वता की उत्कृष्टता को अपने ईमान और दर्शन का पैमाना समझें। ऐसा करने वाले इतिहासविद ऐतिहासिक विमर्श के नए आयाम को तलाश रहे होते हैं, ताकिशोध के पैरामीटर्स या परिधिको जरूरी विस्तार या फैलाव प्रदान किया जा सके।


इसके साथ ही, वाट्सएप यूनिवर्सिटी से किए जा रहे मिथ्या प्रचार का जवाब भी ऐतिहासिक शोध और परिप्रेक्ष्य में देना जरूरी है। पिछले दो-तीन दशकों में साहित्य और इतिहास के बीच के अंतर और अंतर्संबंधों को उजागर करते हुए उत्तर- आधुनिकतावादी चुनौतियों को भी निरंतर जवाब देने की आवश्यकता पड़ी है। ऐतिहासिक शोध को पूरी तरह से निरर्थक, मनगढ़ंत और भाषाई जालसाजी करार देने वाले विरोधी तत्वभी अब समकालीन इतिहास लेखन के महत्व को पूरी तरह नहीं नकार रहे हैं। इतिहासकारों ने भी साहित्य और लैंगिक संबंधी अध्ययनों से निकलकर आने वाले प्रश्नों के संदर्भ में शरीर, कामुकता और आध्यात्मिकता के बीच के प्रतिच्छेदन के विश्लेषण को समकालीन ऐतिहासिक शोध का प्रमुख मुद्दा बनाया है। यह काम हवा में नहीं होता है बल्कि इससे यह समझने का प्रयास किया जाता है कि किस तरह का राजनीतिक संदर्भ कैसे सामाजिक तानों-बानों की तश्कील करता है। किस राजनीतिक संदर्भमें कैसा साहित्य निकलकर आता है और कैसी राजनीति कैसा समाज बनाती है। आज की राजनीति वाट्सएप फॉरवर्ड के सहारे जहालत के अखाड़े में ज्ञानके उत्कृष्टधरोहरों को मिसमार (नष्ट) करना चाहती है। वहीं दूसरी ओर, हाल के ऐतिहासिक अध्ययनों ने हाशिये पर धकेले गए लैंगिक पहचान और दूसरी विशिष्ट पहचान के मुद्दों को भी पुनर्जीवित कर दिया है। इसका मतलब यह है कि खेल अभी बाकी है। लेकिन किसी वर्ग विशेष द्वारा अपने राजनीतिक वर्चस्व की बुनियाद पर मनमानी चलाने की एक सीमा है। यहां इतिहास से सबक सीखने की जरूरत है।

अंग्रेजी औपनिवेशिक काल से पहले के भारत में- मध्ययुगीन और शुरुआती आधुनिक दौर में, तुर्क, अफगानऔर मुगल शासनसे संबंधित दुष्प्रचार ने एक तरह से उस दौर के इतिहास को और भी सार्थक बना दिया है। विशेषकर, मध्यकालीनभारत का समुचित ज्ञान इतिहास लेखन के पेशेवर- शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक रूपों के बीच के तनाव को कम कर सकता है, बशर्ते कि राजनीतिक तांडव और लोभ सार्वजनिक ज्ञान-क्षेत्रको पूरी तरह गर्त में धकेल कर न छोड़ दे। विद्वता और राजनीतिके बीच शर्मो-हया की लक्ष्मण रेखा कायम रहे।

हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, जात-पात, क्षेत्रीयता और संकुचित राष्ट्रवाद की राजनीति में इतिहास का दुरुपयोग नस्वच्छ राजनीति के लिए अच्छा है और नही ऐतिहासिक ज्ञान की न्यूनतम जरूरत के लिए। पढ़ी-लिखी और समझदार जनता के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। मनुष्य ने प्राचीनतम काल से इतिहास रचा है। मध्यकालीन भारत में इतिहास लेखन की विशाल और जीवंत परंपराएं देखने को मिलती हैं। ये परंपराएं संस्कृत और फारसी सहित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं और नाना प्रकार की शैलियों में पाई जाती हैं। इनका अध्ययन एक सभ्यसमाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। और एक सभ्यसमाज का पुनर्निर्माण आज के वक्त की जरूरत है।


मध्ययुगीन और प्रारंभिक आधुनिक भारत की विभिन्न सांस्कृतिक प्रथाएं, बौद्धिक परंपराएं तथा धार्मिक प्रतिद्वंदिता के साथ-साथ राजनीतिक संरक्षण और दुरुपयोग के सवाल आदि मिलकर हमारी सांस्कृतिक विरासत का निर्माण करते हैं जो पिछली शताब्दियों से होकर हम तक पहुंची हैं और जिन्हें बहुलतावादी विविधता को बनाए रखने के लिए संरक्षित किया जा सकता है। इसके बरअक्स, निर्मित विरासत- ऐतिहासिक स्मारकों, वास्तुकला आदिसहित इन सांस्कृतिक धरोहरों को एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए ध्वस्त भी किया जा सकता है जो अपने ही अतीत से अनभिज्ञहै। राजनीतिक पीड़ा से ग्रसित ऐसे समाज का ताना-बाना अंततः छिन्न- भिन्न होकर अपने समय और स्थान की सांस्कृतिक दरिद्रता और खोखलेपन का परिचायक बनता है। वहीं, ऐतिहासिक ज्ञान से लबरेज बौद्धिक चेतना एक ऐसे समाज को संवारती है जहां घरों और संस्थानों के दरवाजे और खिड़कियां सांस्कृतिक पदचिह्नों की आवाजाही के लिए खुले होते हैं और लोग बंद बक्सों में छुपे चूहे बनकर नहीं रह जाते।

ऐतिहासिक रूप से सांस्कृतिक विविधता हमारे राष्ट्रीय और सभ्यतागत चरित्रका प्रतीक है। दूसरी ओर, सांप्रदायिकता और कट्टरवाद की विनाशकारी खींचतानसे समाज बुरी तरह आहत होता रहा है। धर्मके नाम पर की जाने वाली राजनीतिक लामबंदी देश और समाज को हर कालखंडमें प्रभावित करती रही है। लेकिनइतिहास गवाह है किइस तरह की ओछी राजनीतिअंततः पूरी तरह डिसक्रेडिट या कलंकित हो जाती है क्योंकिसांस्कृतिक धरोहरों की नींव काफी मजबूत, समावेशी और एकीकृत होती है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे महाग्रंथों के संस्कृत और देशज भाषाओं में पाए जाने वाले विभिन्नरूपों, आदिग्रंथ (गुरु ग्रंथ साहिब) में शामिल संतों और गुरुओं के आध्यात्मिक उपदेश, मलिक मोहम्मद जायसी-जैसे सूफी कवियों द्वारा रचित प्रेमाख्यान(‘पद्मावत’), मध्यकालीन इतिहासकारों की संस्कृत, फारसी और देशज भाषाओं में लिखी गई ऐतिहासिक कृतियां और मुगल दौर की अकबरी विचारधारा का बखानकरती कृतियां ‘अकबरनामा’ और ‘आईन-ए-अकबरी’ के अतिरिक्त विभिन्न काल और क्षेत्रों की साहित्यिक रचनाएं और स्थापत्य एवं चित्रकला की अनगिनत मिसालें भारतीय संस्कृतिकी एक समेकित रूपरेखा पेश करती हैं। इन सब को मिटाकर देश और समाज को हमेशा के लिए बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है।

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Published: 25 Oct 2020, 7:01 PM
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