आतंक से लड़ने के नाम पर कश्मीर की पूरी आबादी को आखिर क्यों समझ लिया गया है दुश्मन!

आज कश्मीर की जो स्थिति है, वहां आतंकवादी और उनके सक्रिय हमदर्दों या उनके लिए काम करने वालों की तादाद कुल आबादी का एक फीसदी भी नहीं है लेकिन आतंकवाद से लड़ने के नाम पर कश्मीर की पूरी आबादी को दुश्मन समझ लिया गया है।

सोशल मीडिया
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हाल के समय में कश्मीर में जिस तरह आम लोगों की हत्या हुई है, उससे देश के सामने वहां की एक अलग ही सच्चाई आई। कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। अक्तूबर के पहले हफ्ते में खास तौर पर जिस तरह अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लोगों की हत्या कर दी गई, उससे एकदम साफहो गया कि उन लोगों को चुनकर निशाना बनाया गया था। इससे आम लोगों, पत्रकारों से लेकर नेताओं तक के मन में यह सवाल घुमड़ने लगा है कि आखिर अचानक कश्मीर में सब कुछ गलत क्यों होने लगा है? हालांकि कश्मीर में रहने वालों और वहां हाल के घटनाक्रम पर बारीक नजर रखने वालों का मानना है कि इसका अंदेशा तो पहले से ही था। बहरहाल, पहले उठाए गए सवाल का जवाब एक अन्य सवाल में छिपा है- संघर्ष और हिंसाग्रस्त कश्मीर में क्या सही हुआ और क्या केन्द्र सरकार कश्मीर के मामले में लोगों से गलतबयानी कर रही है?

अगस्त, 2019 से ही नरेन्द्र मोदी सरकार इस बात को प्रचारित कर रही है कि कश्मीर में सबकुछ सामान्य हो रहा है और इसे अनुच्छेद-370 और 35-ए हटाने से जोड़कर यह कहती फिर रही है कि इन वैधानिक अवरोधों को खत्म करने से कश्मीर में विकास, शांति और प्रगति का नया दौर शुरू हो सका है। वहां सबकुछ सामान्य हो जाने की बात खास तौर पर तब कही जा रही थी जब कश्मीर का चप्पा-चप्पा सुरक्षा बलों की निगरानी में था और नेट सेवा बंद थी। वैसे, साइबर बंदी-जैसे हालत तो मोटे तौर पर अब भी है क्योंकि कश्मीर की आवाज कभी-कभार ही सुनने को मिलती है।

क्या कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल हो चुकी है या होने वाली है? दो साल से ज्यादा वक्त हो चुका है और पत्रकार सवाल तो पूछ नहीं पा रहे! ऊपर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सरकार के ‘भोंपू’ नए प्रोग्राम के जरिये चीख-चीखकर सरकार की ही बातों को साबित करने में लगे हैं। जब बात कश्मीर की होती है, तब सरकार की बात अंतिम होती है जिस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। वैसे तो पत्रकारों का सबसे बड़ा धर्म देश-समाज के सामने वैसे तथ्यों को लाना होता है जिसे सरकार छिपा रही हो। लेकिन जब कश्मीर की बात हो, ऐसा नहीं होता।

बड़े आराम से देखा जा सकता है कि कश्मीर की तथाकथित सामान्य स्थिति में जो कुछ कहीं छूट गया है, वह जीवन है। वही जीवन जो पहले से ही बरसों के उत्पीड़न तले किसी तरह गुजर रहा था, अगस्त 2019 के बाद तो जैसे एकदम ही उलटी दिशा में चलने लगा। एक ओर तो देश भर में जम्मू और कश्मीर के पूर्ण एकीकरण पर खुशी का माहौल था, कश्मीर के लोग बुनियादी नागरिक आजादी से भी मरहूम थे। उनकी किस्मत का फैसला उस संसद में हुआ जहां भाजपा के पास जबर्दस्त बहुमत था और कश्मीर के अवाम की बात करने वाला कोई नहीं था। जब सरकार ने नए कानूनों, नीतियों और शासन के तौर-तरीके तय करने का काम शुरू किया, तब भी कश्मीर के लोगों से राय-मशविरा नहीं की गई। क्या यह सब कश्मीर के लोगों को ज्यादा जुड़ाव और सशक्त महसूस करा सकता है या उलटे उनके मनोवैज्ञानिक आघात और अपमान को और गहरा कर सकता है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है।


जहां तक अनुच्छेद 370 का सवाल है, वैसे तो इसे दशकों पहले ही बेजान कर दिया गया था और यह अवाम के लिए भावनात्मक जुड़ाव से ज्यादा कुछ भी नहीं रह गया था। लेकिन इसके बाद के समय में जब नई दिल्ली को जम्मू-कश्मीर के बारे में बिना उससे पूछे कोई भी इकतरफा फैसला करने का एकाधिकार मिल गया, इसने कश्मीर के लोगों के जीवन के हर क्षेत्र- राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक– पर कभी न मिटने वाली छाप छोड़ दी है। क्या लोग उन फैसलों से खुश हैं? भारत के विशाल जनसमुदाय को आधिकारिक तौर पर बता-समझा दिया गया है कि कश्मीरी मूल के लोगों समेत जम्मू-कश्मीर में रहने वाले ऐसे भविष्य की उम्मीद कर रहे हैं जो ‘विकास और अमन’ की ओर ले जाएगा।

लेकिन अनुच्छेद-370 को हटाने का असर लोगों के निजी और सामूहिक जीवन पर किस तरह पड़ रहा है, इसके बारे में गहराई और संवेदनशीलता के साथ शायद ही रिपोर्ट की जा रही है जबकि ‘सामान्य स्थिति’ और ‘शांति’ की रिपोर्टिंग इतने जोरदार तरीके से की जाती है कि कुछ बुद्धिजीवी और उदारवादी तक गच्चा खा जाते हैं। सामान्य स्थिति के सबूत के तौर पर सड़क पर विरोध या पत्थरबाजी के न होने को बताया जा रहा है। लेकिन यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि सतह पर जो कुछ दिख रहा होता है, वह छलावा भी हो सकता है। विरोध और हिंसा सिर्फ गहरे होते अलगाव और असंतोष को ही नहीं दिखाते। इसके अलावा बाहर के लोगों को जो चीजें नहीं दिखाई देतीं, उनमें सबसे खास है राज्य की एजेंसियों का कभी खत्म न होने वाला जुल्म जिसे खास तौर पर घाटी के लोग रोजाना की जिंदगी में महसूस करते हैं।

बेशक यह जुल्म खून-खराबे की शक्ल में कम ही होता हो लेकिन एक ऐसा इलाका जिसके चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाबलों का पहरा हो, वहां नए कानूनों के जरिये यह तरह-तरह से होता है जिससे बाहर के बड़े-बड़े लोगों द्वारा यहां की जनसांख्यिकी को बदलने और व्यवसायों पर एकाधिकार कर लेने की आशंका पैदा होती है। ऐसी सेवा शर्तें जो किसी-न-किसी बहाने कर्मचारियों को निकाल बाहर करना आसान कर दे, अपराधिक मामले दर्ज कर देना, पुलिस थाने में बुला लेना, आए दिन लोगों के घरों पर धावे बोलने, लोगों को डराने-धमकाने जैसी हरकतें की जा रही हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लोगों को राजनीतिक जगह न मिल सके। इस तरह सिविल सोसाइटी से लेकर मीडिया तक विरोध-असहमति की जगह लगातार कम होती गई है।

वैसे, इस तरह की खबरों की कमी नहीं है जो जम्मू और कश्मीर के मौजूदा दमनकारी माहौल की ओर इशारा करती हैं जिसका स्वाभाविक नतीजा यह होता है कि लोगों में हताशा का भाव गहरा जाता है और कुछ लोग अपने मनोभाव को हिंसक तौर पर अभिव्यक्त कर बैठते हैं। फिर भी, यहां तक कि कुछ उदारवादी भी कश्मीर के सार्वजनिक जीवन के इस तरह के संकेतों को नजरअंदाज कर जाते हैं।


कुछ ही समय पहले की बात है। सोशल मीडिया चैट में जब मैंने कहा कि कश्मीर को दोजख में बदला जा रहा है, तो दिल्ली के एक दोस्त ने घाटी जाने वाले सैलानियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि कश्मीर में हालात सुधर रहे हैं और अर्थव्यवस्था बेहतरी की ओर है और कम-से-कम ‘मैदान के लोगों को इस स्वर्ग का आनंद उठाने को तो मिल रहा है।’ यह पहली बार नहीं है जब कश्मीर की अर्थव्यवस्था में एक छोटी-सी भागीदारी करने वाले पर्यटन को फलते-फूलते देखा गया हो। लेकिन इस बदलाव पर गौर करना दिलचस्प है। उदारवादी जो पहले कश्मीर को ‘सुरक्षा’ और ‘पर्यटन’ के चश्मे से देखते थे, अब इस नजरिये से देखने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत के लोग इसे कैसे देखते और फायदा उठाते हैं। एकीकरण के नाम पर इस क्षेत्र को भारत में विजय की ‘लूट’ जैसा माना जाता है और एकीकरण की इस प्रक्रिया में जम्मू-कश्मीर के लोगों की कहीं कोई चिंता नहीं की गई। भारतीय उदारवादी और मीडिया न तो यहां के लोगों की चुप्पी को समझ सके और न ही उनकी तकलीफ और उनके भोलेपन को और इससे सरकार को सख्ती से अपने हथकंडों को जमीन पर उतारने का मौका मिल गया। इस ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता कि कश्मीर की आबादी का बहुत छोटा-सा हिस्सा है जो अत्यधिक कट्टर है और जिसने बंदूक उठा लिया हो लेकिन इसकी भी सबसे बड़ी वजह यहां लगातार बना रहा उत्पीड़न का माहौल है। दिक्कत की बात यह है कि केन्द्र सरकार यह मानने को तैयार नहीं कि कश्मीर में उसने गलत किया है। यही वजह है कि कश्मीर एक खतरनाक अराजकता को ओर बढ़ता जा रहा है।

खबरों के नाम पर झूठ परोसने वाले चैनल पहले तो दो साल तक ढोल पीटते रहे कि जम्मू-कश्मीर में तेजी से ‘सामान्य स्थिति’ बहाल हो रही है और वहां ‘विकास’ का नया दौर शुरू हो रहा है। लेकिन जब आम लोगों की हत्याएं हुईं तो अब उन्हें ‘अफगानिस्तान प्रभाव और पाकिस्तान की करतूत’ बताकर पेश किया जा रहा है। इसमें संदेह नहीं कि उभरते भू-राजनीतिक परिदृश्य और अफगानिस्तान के उथल-पुथल की छाया कश्मीर पर पड़ने की आशंका है लेकिन यह भी समझना होगा कि असली खतरा तो अंदरूनी वजहों से पैदा होता है जो सीमा पार से चलने वाली खतरनाक रणनीति के लिए जगह तैयार करता है।

आज कश्मीर की जो स्थिति है, वहां आतंकवादी और उनके सक्रिय हमदर्दों या उनके लिए काम करने वालों की तादाद कुल आबादी का एक फीसदी भी नहीं है लेकिन आतंकवाद से लड़ने के नाम पर कश्मीर की पूरी आबादी को दुश्मन समझ लिया गया है। लोगों को इस तरह कगार पर धकेलने वाली यही नीति अगर जारी रही तो इससे कट्टरपंथियों का ही दायरा बढ़ेगा। जबकि होना यह चाहिए था कि कश्मीरियों के सपनों, उनकी आजादी, उनकी उम्मीदों को एक नई उड़ान दी जाती।

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