राम पुनियानी का लेखः BJP राज में नफरत का बढ़ता दायरा, हिंसा के खिलाफ सरकार की भूमिका पर उठते सवाल

जहां एक ओर नफरत, हिंसा और ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है वहीं भाईचारा, जो हमारे संविधान के प्रमुख मूल्यों में एक है, पर भीषण प्रहार हो रहे हैं। स्वाधीनता आंदोलन ने देश के सभी सम्प्रदायों को एक किया था। अब समय आ गया है कि उन मूल्यों को पुनर्जीवित किया जाए।

फोटोः सोशल मीडिया
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राम पुनियानी

दो हफ्ते पहले 16 फरवरी 2023 को जुनैद और नासिर कुछ रिश्तेदारों से मिलने अपने घर से निकले। उन्हें एक गौरक्षा समूह की बर्बर हिंसा का सामना करना पड़ा। ये समूह बिना किसी भय के हरियाणा और उसके आसपास के इलाकों में सक्रिय हैं। इस त्रासद घटना से यह पता चलता है कि ये समूह कितने खुलकर काम कर रहे हैं और किस तरह पुलिस से उनकी सांठगांठ है। ये दोनों मुस्लिम युवक जब अपने घर वापस लौट रहे थे तब उन्हें कथित गौरक्षकों की गैंग ने घेर लिया। उनकी जमकर पिटाई की गई और फिर उन्हें पुलिस थाने ले जाया गया। वे गंभीर रूप से घायल थे परंतु पुलिस ने न तो उन्हें अस्पताल भेजा और न ही हमलावरों को पकड़ा। गैंग के सदस्य नासिर और जुनैद को एक सूनी जगह पर ले गए, उन्हें एक कार की पिछली सीट से बांध दिया और फिर कार में आग लगा दी। इस बर्बर अपराध में इस्तेमाल की गई कार पहले पुलिस वाहन के रूप में पंजीकृत थी।

कारवां-ए-मोहब्बत के संस्थापक हर्ष मंदर मृतकों के परिवारों को ढाढ़स बंधाने उस क्षेत्र में गए। उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस' में लिखा, ‘‘मोनू मनेसर के सोशल मीडिया पेजों से गुजरते हुए मैं सन्न रह गया। वह और उसकी गैंग के सदस्य आधुनिक हथियारों को लहराते हुए, पुलिस की जीपों के सायरन की आवाज की नकल करते हुए, वाहनों पर गोली चलाते हुए और लोगों को बुरी तरह पीटते हुए अपने वीडियो लाईव स्ट्रीम करते हैं।"

इस भयावह घटना की निंदा और विरोध के बीच दो महापंचायतें बुलाई गईं। अपराधी राजस्थान से थे और अपराध हरियाणा में हुआ था। इन महापंचायतों को आरएसएस से जुड़े बजरंग दल, विहिप और हिन्दू सेना नाम के एक अन्य संगठन का पूरा समर्थन प्राप्त था। इन महापंचायतों में एक बार फिर जहर उगला गया। पहली महापंचायत में घोषणा की गई कि अगर इस गौरक्षक दल के मुखिया मोनू मनेसर को पकड़ने राजस्थान की पुलिस आएगी तो वे लोग अपने पैरों पर चलकर वापस नहीं जा पाएंगे। दूसरी महापंचायत, जो 22 फरवरी को हुई, में आस्था मां नामक एक महिला ने लव जिहाद का मुद्दा उठाया और श्रोताओं से कहा कि वे हिन्दू लड़कियों पर नजर डालने वालों को न बख्शें।


इस बीच तीन दोषियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और यह पता चला है कि वे पुलिस के मुखबिर थे। पिछले कुछ सालों से गौरक्षकों की कारगुजारियों में तेजी से वृद्धि हुई है। सन् 2019 के बाद से तो वे छुट्टे सांड बन गए हैं। सन् 2015 में हरियाणा सरकार ने गौवंश संरक्षण एवं गौसंवर्धन अधिनियम पारित किया। सन् 2019 में इस अधिनियम में संशोधन कर गायों का परिवहन करने वालों के लिए सजा का प्रावधान किया गया। इसके बाद से गुंडों के कई नए समूह गठित हो गए हैं।

वे मवेशियों को ले जा रहे वाहनों को रोकते हैं और उनसे सौदेबाजी करते हैं। सौदा न पटने पर मारपीट की जाती है। यह उन लोगों के साथ भी होता है जिनके पास मवेशियों का परिवहन करने की वैध अनुमति होती है। क्या हम यह मान सकते हैं कि पुलिस को इसकी जानकारी नहीं होगी? मेवात इलाके के मुसलमान कई हिन्दू रीतिरिवाजों का पालन करते हैं। वे मुख्यतः दूध का व्यापार करते हैं और अक्सर मोनू मानेसर जैसे गुंडों और उनकी गैंगों के हमलों का शिकार बनते रहते हैं। पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है।

गाय और बीफ को विघटनकारी सांप्रदायिक राजनीति करने वालों ने अपना एक प्रमुख हथियार बना लिया है। एक अन्य जुनैद, जो मदरसे में पढ़ता था, की एक ट्रेन में इस शक की बिना पर लिंचिंग कर दी गई कि उसके टिफिन में बीफ है। मोहम्मद अखलाक और पहलू खान पर क्या गुजरी यह हम सब जानते हैं। लिंचिंग को मुसलमानों को आतंकित करने का हथियार बना लिया गया है। अखलाक की हत्या के बाद ‘अवार्ड वापसी' का सिलसिला शुरू हुआ था जिसके अंतर्गत देश के कई शीर्ष वैज्ञानिकों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने सरकारी पुरस्कार लौटा दिए थे।

इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘सन् 2010 से 2017 के बीच के आठ सालों में गाय से जुड़े मुद्दों को लेकर हुई हिंसा के शिकारों में से 51 प्रतिशत मुसलमान थे। ऐसी 63 घटनाओं में कुल 28 लोग मारे गए जिनमें से 86 प्रतिशत मुसलमान थे। इनमें से 57 प्रतिशत घटनाएं मई 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद हुईं और 63 में से 32 घटनाएं बीजेपी-शासित राज्यों में हुईं। यह विश्लेषण 25 जून 2017 तक हुई घटनाओं पर आधारित है।"


मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ विषवमन सभी सीमाएं पार कर चुका है। आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों के अलावा हिन्दू सेना जैसे दर्जनों नए संगठन उभर आए हैं। बड़े नेता कहते जाते हैं कि इन संगठनों को कानून अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए और ये संगठन ठीक यही करते रहते हैं। अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का गर्व से प्रचार किया जाता है। मोनू मनेसर ने हरियाणा में हुई घटना को फेसबुक पर लाईव स्ट्रीम किया था। शंभूलाल रैगर ने अफ्राजुल को मौत के घाट उतारने का वीडियो बनाया था जिसे सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया।

इस तरह की घटनाओं में शामिल लोगों का सार्वजनिक अभिनंदन भी होता है। कलीमुद्दीन अंसारी के हत्यारे का तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने स्वागत किया था। आठ साल की आसिफा की कश्मीर में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। इस अपराध में शामिल लोगों के समर्थन में जुलूस निकाले गए। कम्प्यूटर इंजीनियर मोहसिन शेख की पुणे में हुई हत्या के आरोपियों को अदालत द्वारा बरी कर दिए जाने के बाद उन्हें एक ‘विजय जुलूस‘ में शहर में घुमाया गया। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उन्होंने उत्तर प्रदेश में गाय का शव एक खेत में फेंके जाने की घटना में कानून सम्मत कार्यवाही की।

हमारे प्रधानमंत्री ने एक भाषण में कहा कि महाराणा प्रताप ने गौरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। गत 26 फरवरी 2023 को वाशी (नवी मुंबई) में एक विशाल ‘हिन्दू जन आक्रोश रैली' निकाली गई जिसमें लव जिहाद और लैंड जिहाद करने के लिए मुसलमानों के खिलाफ अभद्र नारे लगाए गए। गोदी मीडिया के एक जाने-माने एंकर ने एक चार्ट के जरिए यह समझाया कि भारत में कितने प्रकार के जिहाद हो रहे हैं। भारत में मीडिया में गोएबेलों की कमी नहीं है।

जहां एक ओर नफरत, हिंसा और ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है वहीं भाईचारा, जो हमारे संविधान के प्रमुख मूल्यों में से एक है, पर भीषण प्रहार हो रहे हैं। स्वाधीनता आंदोलन ने देश के सभी सम्प्रदायों को एक किया था। अब समय आ गया है कि उन मूल्यों को पुनर्जीवित किया जाए। शांति, प्रेम और बंधुत्व के बिना देश प्रगति नहीं कर सकता।

(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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