भारत-चीन रिश्ते: दायरे में संवाद, पहरे में कारोबार

ब्रिक्स सम्मेलन में जमी बर्फ पिघलने के बावजूद चीन के साथ आर्थिक निर्भरता, सीमा विवाद और विनिर्माण की पेचीदा चुनौतियां बरकरार

दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फोटो : Getty Images)
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दिल्ली में अभी-अभी संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को शायद किसी बहुत आक्रामक या ऐतिहासिक घोषणापत्र के लिए याद न रखा जाए। लेकिन केवल इसी बात पर उलझे रहना भारत के लिए इसके कूटनीतिक महत्व को नजरअंदाज करना होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स सम्मेलन वास्तव में भारत-चीन रिश्तों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने में मददगार साबित हुआ?

भारत की कूटनीतिक उपलब्धि केवल यह नहीं थी कि उसने इस सम्मेलन का आयोजन किया-वह तो वैसे भी इस बार ब्रिक्स का अध्यक्ष था-बल्कि असल बात यह थी कि उसने उन देशों के बीच एक साझा घोषणापत्र तैयार करवाने में सफलता पाई जिनके हित आपस में अक्सर टकराते रहते हैं। अपने तमाम तनावों के बावजूद ईरान और संयुक्त अरब अमीरात एक ही मेज पर बैठ सके; चीन ने पहलगाम आतंकवादी हमले की निंदा करने वाले मसौदे पर हस्ताक्षर किए; और सदस्य देश अपने बिल्कुल अलग-अलग खेमों के बावजूद पश्चिम एशिया में शांति वार्ता पर रजामंद हो सके। भारत ने 2023 में जी-20 अध्यक्षता के दौरान भी कुछ ऐसा ही कर दिखाया था, जब यूक्रेन युद्ध पर तीखे मतभेदों के बीच एक साझा सर्वसम्मत भाषा तलाश ली गई थी।

सम्मेलन के इतर नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय मुलाकात इस साझा बयान से कहीं अहम थी। सात वर्षों में पहली बार शी भारत की यात्रा पर आए थे। दोनों नेताओं ने व्यापारिक रिश्तों, बाजार तक पहुंच, व्यापार के संरचनात्मक असंतुलन और दोनों मुल्कों के नागरिकों के आपसी संवाद पर चर्चा की। आधिकारिक बयानों में सीमा पर शांति बनाए रखने का भी नपा-तुला जिक्र किया गया। इसे अभी से यह मान लेना के दोनों देशों में ‘सुलह’ हो गई, जल्दबाजी होगी, लेकिन यह आगे बढ़ने का एक बड़ा मौका जरूर है।

भारत और चीन पड़ोसी हैं, जो मिलकर समूची मानवता के एक-तिहाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। भूगोल को मिटाया नहीं जा सकता। न ही उनका सीमा विवाद रातों-रात खत्म होने वाला है। 1988 में राजीव गांधी को दी गई डेंग जियापोंग की वह मशहूर सलाह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है: यदि हमारी पीढ़ी सीमा विवाद को सुलझाने की समझदारी नहीं जुटा पा रही है, तो इसे आने वाली अधिक समझदार पीढ़ी के लिए छोड़ देना चाहिए।

इसका मतलब यह कतई नहीं कि गलवान को भुला दें, जहां 2020 में भारत के 20 जांबाज सैनिक शहीद हुए थे। सीमाओं की हर हाल में मुस्तैदी से रक्षा होनी चाहिए। लेकिन सीमा पर तनाव को पूरे द्विपक्षीय रिश्ते को बंधक बनाने की छूट नहीं दी जा सकती। दरअसल, भारत और चीन पहले से ही मुद्दों को अलग-अलग खानों में बांटकर आगे बढ़ने पर काम कर रहे हैं। बिश्केक में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने पाकिस्तान, रूस और अन्य देशों के साथ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मानकों को खारिज करने वाले साझा प्रस्ताव पर दस्तखत किए। यदि ऐसे अंतर्विरोधों को एससीओ और ब्रिक्स के बहुपक्षीय मंचों पर साधा जा सकता है, तो द्विपक्षीय स्तर पर भी ऐसा किया जा सकता है। 

भारत और चीन के बीच ये अलग-अलग खाने हैं: सीमा सुरक्षा; व्यापार और निवेश; तकनीक; नदियां और उनके जल अधिकार; हिमालयी पारिस्थितिकी; जलवायु परिवर्तन; विश्व व्यापार संगठन में सुधार; परमाणु अप्रसार; विश्वविद्यालय, पर्यटन और संस्कृति; और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर चयनात्मक सहयोग।


व्यावहारिकता का आर्थिक आधार ठोस और निर्विवाद है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 112 अरब डॉलर हो चुका है। इसके बावजूद हमारी निर्भरता सिर्फ सस्ते खिलौनों तक सीमित नहीं। चीन हमें जीवनरक्षक दवाओं के लिए जरूरी एपीआई (कच्चा माल), इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे, भारी मशीनरी, सोलर उपकरण और दुर्लभ खनिज मुहैया कराता है। गलवान के बाद भारत ने चीनी निवेश और तकनीकी पहुंच पर सख्त पाबंदियां लगाईं। फिर भी आयात बढ़ता गया। राजनीतिक दूरी बनाने की कोशिशों से हमारी आर्थिक निर्भरता रत्ती भर कम नहीं हुई।

2019 के बैंकॉक आसियान शिखर सम्मेलन में आरसीईपी (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी) से भारत का अचानक बाहर निकलना हमारे लिए गंभीर चेतावनी होना चाहिए। भारत ने नौ साल तक इसपर बातचीत की, लेकिन चीनी आयातों की बाढ़ के कथित डर के चलते 2019 में अचानक वार्ता से किनारा कर लिया। विडंबना यह है कि वे चीनी आयात फिर भी भारतीय बाजार में घुसते चले गए। हम आरसीईपी में दी गई छूट के तहत उन शर्तों को पंद्रह साल टाल सकते थे। इस समझौते से बाहर निकलकर भारत ने एशियाई उत्पादन नेटवर्क का अभिन्न हिस्सा बनने का मौका गंवा दिया। रिश्ते बेशक एकतरफा दिखें, लेकिन चीन को भी भारत की उतनी ही जरूरत है।

चीन के पास जबर्दस्त आर्थिक ताकत जरूर है, लेकिन उसकी अपनी कमजोरियां भी हैं। उसकी आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है, कामकाजी आबादी सिकुड़ रही है, रियल एस्टेट क्षेत्र संकट में है, कर्ज का भारी बोझ है, घरेलू खपत कमजोर बनी हुई है और उसकी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता को नए विदेशी बाजारों की सख्त दरकार है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि जनसांख्यिकी दबाव, गिरती उत्पादकता और निवेश पर घटते मुनाफे के चलते चीन की मध्यम अवधि की विकास दर धीमी रहने वाली है।

दूसरी तरफ, भारत दुनिया के सबसे बड़े और तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है, जिसके पास युवा श्रम बल है और यह उस चीनी पूंजी के लिए एक मुफीद ठिकाना है जो दुनिया के अन्य हिस्सों में बंदिशों का सामना कर रही है। ऐसे में सही रणनीति ‘चीन को पूरी तरह बाहर रखने’ की नहीं, बल्कि यह कहने की होनी चाहिए: ‘अगर आप भारतीय बाजार तक पहुंच चाहते हैं, तो यहीं बनाइए, रोजगार दीजिए, कलपुर्जे यहीं से खरीदिए और भारत से ही निर्यात कीजिए।’

इसकी शुरुआत बीवाईडी के साथ भारत में फैक्ट्री लगाने की रुकी हुई बातचीत को शुरू करके क्यों नहीं की जा सकती? बीवाईडी दुनिया की अग्रणी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी है। भारत में विस्तार की उसकी महत्वाकांक्षाएं गलवान के बाद निवेश पर लगी रोक की भेंट चढ़ गईं। उसे बातचीत की मेज पर वापस लाया जाए, लेकिन भारत की अपनी शर्तों पर-स्थानीय विनिर्माण, भारतीयों को रोजगार, स्थानीय सप्लायरों का विकास, डेटा की कड़ी सुरक्षा और विनिर्माण में भारतीय मूल्य-संवर्धन की अनिवार्य शर्त के साथ।

प्रेस नोट 3 (2020 श्रृंखला), जिसने चीन से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर नकेल कसी थी, उसे अंधी शंका के बजाय जोखिम-आधारित जांच-पड़ताल की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। दूरसंचार नेटवर्क में चीनी हिस्सेदारी का सवाल उस निष्क्रिय चीनी पूंजी से बिल्कुल अलग है जो किसी राजमार्ग, गोदाम, जल परियोजना या सिंचाई तंत्र को वित्तीय मदद दे रही हो। यह ‘दायरे में रहकर सीमित व्यवहार’ का वह व्यावहारिक नीतिगत प्रस्ताव है जिसे नितिन पई, अजय शाह और इस लेखक ने सितंबर 2025 में बताया था। इसका सीधा नियम है: प्रबंधन नियंत्रण दिए बिना पूंजी स्वीकार कीजिए, संवेदनशील चीनी तकनीक को पूरी तरह बाहर रखिए और बुनियादी ढांचे के गैर-संवेदनशील क्षेत्रों से शुरुआत कीजिए। 


कुछ छोटे दरवाजे तुरंत खोले जाने चाहिए। चीनी पर्यटकों, कारोबारी प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और इंजीनियरों के लिए वीजा नियमों को आसान बनाया जाए। चीनी पर्यटकों के लिए बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर और नालंदा को जोड़कर एक विशेष बौद्ध सर्किट तैयार किया जाए। विश्वविद्यालयों के आपसी सहयोग को पुनर्जीवित किया जाए। सिनेमा, खेलकूद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जाए।

इसके साथ ही, भारत को चीन के विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार तक पहुंच के लिए कहीं अधिक मजबूती से अपनी बात रखनी होगी। व्यापार घाटे का समाधान केवल चीनी आयात घटाना नहीं हो सकता। असली रास्ता यह है कि भारतीय दवाएं, खाद्य उत्पाद, आईटी सेवाएं, मनोरंजन और अन्य उत्पाद बड़े पैमाने पर चीनी बाजार में जगह पाएं।

कारोबारी सुगमता रैंकिंग में निचले पायदान और पश्चिमी शैली के लोकतांत्रिक संस्थानों के अभाव के बावजूद चीन का असाधारण आर्थिक विकास इस बात की याद दिलाता है कि उसे उसकी जमीनी हकीकत के साथ समझना होगा, न कि किताबी सिद्धांतों के चश्मे से। भारत को न तो चीन की अंधी नकल करनी चाहिए और न ही उससे डरने की जरूरत है। भारत को सीखना चाहिए, मुकाबला करना चाहिए और अपनी रणनीतिक क्षमताएं गढ़नी चाहिए-विशेष रूप से एयरोस्पेस, रक्षा, सेमीकंडक्टर, अहम खनिज, फार्मास्यूटिकल्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में। 

चीन के साथ रिश्तों में आने वाली नरमी का यह कतई मतलब नहीं होना चाहिए कि भारत अमेरिका, यूरोप, जापान या क्वाड के साथ अपने रिश्तों को कमजोर करे। भारत को ब्रिक्स, एससीओ, क्वाड, जी-20 और अन्य सभी उपयोगी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक साथ सक्रिय रहना चाहिए। भारत के भविष्य के कूटनीतिक फैसले इनमें से किसी एक रिश्ते के बंधक नहीं बन सकते। इसे ही कहते हैं असली ‘रणनीतिक स्वायत्तता’। अगले साल ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन के हाथों में होगी। आने वाले बारह महीने कूटनीतिक पहल के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।

रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने के लिए भावनात्मक दोस्ती या आंख मूंदकर किए जाने वाले भरोसे की नहीं, बल्कि पारस्परिक हितों और दूरदर्शी कूटनीतिक कल्पना की जरूरत होती है। जहां जरूरी हो, वहां अपनी सीमाओं की हिफाजत कीजिए। जहां मुकाबला लाजिमी हो, वहां डटकर मुकाबला कीजिए। जहां मुमकिन हो, सहयोग कीजिए। और इस संवाद से जो समय और अवसर मिले, उसका उपयोग खुद को आंतरिक रूप से मजबूत बनाने में कीजिए।

 (अजीत रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं; साभार: द बिलियन प्रेस)