आकार पटेल का लेख: ट्रंप शासन ने मान लिया था भारत में नहीं होता नागरिक अधिकारों का उल्लंघन, क्या अब ऐसा हो पाएगा!

अमेरिका में इस बार डेमोक्रेट्स ने एक उदारवादी नजरिए के साथ चुनाव लड़ा। मानवाधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन से जुड़कर एक बड़ा संदेश दिया। मानवाधिकारों की वकालत करके ही डेमोक्रेटिक पार्टी (जिसमें प्रमिला जयपाल भी हैं) और मजबूत हुई।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

अमेरिकी चुनाव में इस बार चेन्नई की एक महिला ने फिर से जीत दर्ज की है। उनका नाम प्रमिला जयपाल है और वह अमेरिकी कांग्रेस की प्रोग्रेसिव काकस की प्रमुख हैं। कुछ महीने पहले, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विदेशी मामलों पर अमेरिका की संसदीय समिति के साथ एक बैठक को रद्द कर दिया था, इस समिति के अध्यक्ष रिपब्लिकन थे और सदस्य डेमोक्रेट। जयशंकर के बैठक रद्द करने का कारण था कि इससमिति में प्रमिला जयपाल भी शामिल थीं जिन्होंने एक प्रस्ताव सामने रखते हुए भारत में कश्मीर में संचार सेवाएं बंद करने का विरोध करते हुए इस कम्यूनिकेशन ब्लैकऑउट को खत्म करने की मांग की थी। जयशंकर ने कहा था कि वे इस समिति से तभी मिलेंगे जब इसमें प्रमिला जयपाल नहीं होंगी, जाहिर है अमेरिकियों ने इससे इनकार कर दिया था।

जयशंकर को विदेश मंत्री होने के नाते भारतीयों के टैक्स से वेतन इसलिए दिया जाता है ताकि वे विदेश में भारत के हितों की रक्षा करें, लेकिन उन्होंने तो इसके बजाए बैठक ही छोड़ दी क्योंकि इसमें एक गंभीर बातचीत होने वाली थी, या फिर हो सकता है कि वह किसी सीधे टकराव से बचना चाह रहे हों। अमेरिकी मीडिया में उनके बैठक छोड़कर भाग जाने की सूचना के बाद, कैलिफोर्निया से सांसद कमला हैरिस ने ट्वीट किया: "किसी भी विदेशी सरकार द्वारा कांग्रेस (संसद) को यह बताना गलत है कि कैपिटल हिल (अमेरिकी प्रशासन का मुख्यालय) में होने वाली बैठक में कौन से सदस्य शामिल होंगे। "

जयशंकर को लगा होगा कि वे ऐसा कर सकते हैं क्योंकि अमेरिकी प्रशासन की बागडोर एक रिपब्लिकन डोनल्ड ट्रंप के हाथ में थी जो मानवाधिकारों की जरा भी परवाह नहीं करते। लेकिन दिसंबर 2019 में एस जयशंकर जो कर चुके हैं, उसे दोबारा करना उनके लिए जरा मुश्किल होगा।


दरअसल भारतीय जनता पार्टी कुछ ऐसे काम काफी मेहनत से किए हैं जो इससे पहले किसी भी भारतीय सरकार ने नहीं किए हैं। भारत ने अमेरिकी चुनाव में दखल देने की कोशिश की और ट्रंप को दोबारा जिताने के प्रयास किए। ओवरसीज़ फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी नाम के एक समूह ने पिछले साल सितंबर में खुद को एक अधिकारिक विदेशी एजेंट के रूप में अमेरिका में रजिस्टर कराया। जैसे ही बीजेपी को यह पता लगा, बीजेपी ने इन भारतीय-अमेरिकियों को निर्देश दिया के वे निजी तौर पर ट्रंप को जिताने में मदद करें और बीजेपी का नाम न लें, लेकिन य साफ हो गया कि ये समूह बीजेपी समर्थक हैं।

इतना नहीं मोदी ने तो खुद अमेरिका में हुए ‘हाऊडी मोडी’ कार्यक्रम में पिछले साल सितंबर में ट्रंप को जिताने की अपील की थी। सीधे नहीं तो फिर ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ नारे का क्या मतलब था।

हुआ क्या? ट्रंप की विदाई हो गई। बीजेपी ने भी पलटी मारना शुरु कर दिया। इसके लिए बीजेपी ने अपने इन-हाउस इंटलैक्चुअल राम माधव को 'द इंडियन एक्सप्रेस' में लेख लिखने को कहा और उन्होंने अपना लेख 'अमेरिका-भारत संबंध एक द्विपक्षीय और मजबूत पायदान पर खड़े हैं' शीर्षक से लिखा। राम माधव ने इस लेख में लिखा: "भारत में कुछ लोग मानते हैं कि बिडेन-हैरिस की जीत अमेरिका-भारत संबंधों के लिए बुरी खबर होगी।"

असल में इस बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया। दरअसल राम माधव बीजेपी को ही भारत समझ बैठे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत-अमेरिका रिश्ते काफी गहरे हैं और कई मामलों में दोनों देशों के बीच सभ्यता का जुड़ाव है। लेकिन आज वह दौर नहीं है। आज भारत सरकार ने बहुसंख्यावाद को बढ़ावा दिया है। भारत सरकार अपने ही नागरिकों को परेशान कर रही है, और इस हद तक आगे बढ़ चुकी है कि पूरा विश्व इसे देखने लगा है।


प्रमिला जयपाल और कमला हैरिस किसी भी मुद्दे को यूं ही नहीं उठाती हैं। और वे इन्हें उठाना सिर्फ इसलिए बंद नहीं कर देंगी कि पहले पक्षपता करने वाली बीजेपी अब द्विपक्षीय समर्थन की बात कर रही है। अमेरिका में जो कुछ हुआ है उससे उन नेताओं के हाथ मजबूत हुए हैं जो भारत का हित चाहते हैं, और भारत को सभी भारतीयों का देश मानते हैं। ऐसे में अगर भारतीयों के साथ ही दुर्व्यवहार हुआ तो वे तो एतराज करेंगे ही।

अमेरिका में इस बार डेमोक्रेट्स ने एक उदारवादी नजरिए और रुख के साथ चुनाव लड़ा। मानवाधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन से जुड़कर एक बड़ा संदेश दिया। और मानवाधिकारों की वकालत करके ही डेमोक्रेटिक पार्टी (जिसमें प्रमिला जयपाल भी हैं) और मजबूत हुई।

बहुत से भारतीयों को नहीं पता होगा कि इस साल अप्रैल में संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भारत को विशेष चिंता वाले देशों की सूची में डाला था। कमीशन की रिपोर्ट कहती है, “भारत ने 2019 में एक बहुत बड़ा बदलाव किया क्योंकि मोदी सरकार ने पूरे भारत में ऐसी नीतियां बनाई जा रही है जिससे धार्मिक स्वतंत्रता और खासतौर से मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता का संस्थागत तरीके से उल्लंघन हो रहा है।”

इसमें कहा गया कि भारत की नागरिकता संशोधन कानून, जो कि सूचीबद्ध गैर मुस्लिमों की तो रक्षा करता है, लेकिन मुस्लिमों को देशव्यापी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न (एनआरसी) के जरिए हिरासत में लेने, उन्हें देश से बाहर निकालने और उन्हें बिना नागरिकता वाला बनाने की कोशिश कर रहा है। इसमें यह भी कहा गया कि, “धार्मिक अल्पसंख्यों को परेशान करने और उके खिलाफ हिंसा का प्रचार अभियान चल रहा है।”


रिपोर्ट में अमित शाह और योगी आदित्यनाथ का नाम लिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस रिपोर्ट में अमेरिकी सरकार से इस मामले में कदम उठाने को कहा गया और ‘भारत सरकार की एजेंसियों और अधिकारियों पर लक्षित पाबंदियां लगाने की बात की गई जो इन उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार हैं।’ इतना ही नहीं ऐसे लोगों के अमेरिका प्रवेश पर पाबंदी लगाने की सिफारिश भी की गई।

लेकिन भारत इससे बच गया क्योंकि तब तक अमेरिका में ट्रंप का शासन था और इस बारे में कोई भी फैसला सिर्फ वही ले सकते थे। भारत ने इस पर एक बयान जारी किया था, “हम संयुक्त राष्ट्र के इस कमीशन की टिप्पणियों को खारिज करते हैं। यह एक पक्षपातपूर्ण और बुरी मंशा से की गई टिप्पणियां हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन इस बार बात काफी आगे बढ़ गई है।”

यह एक तरीके से हकीकत से भागना था। अगर आप मानते हैं कि अमेरिका आपका दोस्त है तो आपको उन्हें आश्वस्त करना होगा कि उनकी पड़ताल सही नहीं है। उनके साथ संवाद से भागना कोई हल नहीं है। ट्रंप के दौर में तो यह काम कर गया, लेकिन शायद अब यह काम नहीं कर पाएगा।

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