खरी-खरी: धर्म एवं पहचान की नशीली राजनीति से उपजे ‘न्यू इंडिया’ के नए चुनावी मापदंड

यह धर्म एवं पहचान की एक ऐसी नशीली राजनीति है जिसका नशा अभी देश के सिर चढ़कर बोल रहा है। दरअसल नरेंद्र मोदी एक नशा हैं जिसकी काट अभी कहीं दिखाई नहीं देती है। यह नशा कब तक छाया रहेगा, यह कहना एवं समझना अत्यंत कठिन है।

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ज़फ़र आग़ा

सबसे पहले पाठकों से क्षमा। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों से यह स्पष्ट है कि इन चुनावों के बारे में मेरी सारी अटकलें गलत ही नहीं बल्कि धराशायी सिद्ध हुईं। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के चुनाव में हर अनुमान गलत सिद्ध हुआ। बीजेपी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में फिर सत्ता में लौटी और उत्तर प्रदेश में तो मोदी-योगी जोड़ी को फिर भारी बहुमत प्राप्त हुआ। हां, समाजवादी पार्टी की सीटों में जरूर इजाफा हुआ लेकिन उत्तर प्रदेश में बाकी सभी विपक्षी दल चित हो गए। हद तो यह हुई कि दलितों ने मायावती की बहुजन समाज पार्टी से भी मुंह मोड़ लिया। परंतु यह हुआ क्या?

मैं कोई बच्चा नहीं कि मेरी राजनीतिक समझ ऐसी गलत है कि मैं बिल्कुल ही चुनावी मूड समझने में गलत साबित हुआ। मैं सन 1977 से चुनाव देख रहा हूं और बतौर पत्रकार, चालीस वर्षों से चुनाव रिपोर्ट कर रहा हूं। मुझे नहीं याद पड़ता कि मुझसे चुनाव परिणाम पहले से समझने में जल्दी चूक हुई हो। हद यह है कि सन 2004 में जब देश का लगभग हर पत्रकार यह कह रहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी देश में फिर सरकार बना रही है, तो लगभग छह माह पूर्व से मैं यह लिख रहा था कि 2004 में बीजेपी हार रही है। और यही हुआ भी। लेकिन सच्चाई यह है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के उदय के साथ लगभग हर चुनाव के नतीजों को समझने में मुझसे चूक हुई।

आखिर ऐसा क्यों? इस गलती का कोई राजनीतिक आधार होना चाहिए। यदि कोई ऐसी बात है तो फिर वह राजनीतिक आधार क्या है? देखिए, बात यह है कि चुनाव आकलन के कुछ मापदंड होते हैं। सबसे पहले तो यह देखा जाता है कि जो पार्टी चुनाव के समय सत्ता में है, उसका पिछला पांच वर्षों का शासनकाल कैसा रहा? महंगाई तो नहीं थी? रोजगार लोगों को प्राप्त थे कि नहीं? खेती-बाड़ी का कामकाज ठीक-ठाक चल रहा था कि नहीं? प्रदेश का मुख्यमंत्री लोकप्रिय था कि नहीं? यही मापदंड हैं जिनके आधार पर साधारणतया चुनावी नतीजों का आकलन होता है। अर्थात चुनावी भाषा में सत्तासीन पार्टी के खिलाफ सत्ता विरोधी तत्व कितना है।

इस आधार पर बीजेपी को हर राज्य का चुनाव हारना चाहिए था। देश में महंगाई आसमान छू रही थी। बेरोजगारी का चारों ओर सैलाब था। नौजवान सड़कों पर थे। किसान आंदोलन चरम सीमा पर था। जानवर खेतों में घुसकर खड़ी खेती नाश कर रहे थे। ऊपरी तौर पर यह भी नहीं दिखता था कि योगी सरकार बहुत लोकप्रिय है, अर्थात सामान्य स्थिति में बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी तत्व काफी थे। केवल इतना ही नहीं, चुनावी अभियान के दौरान सड़कों पर सरकार के प्रति आक्रोश दिखाई पड़ता था। इन्हीं मापदंडों के आधार पर मुझे विश्वास था कि योगी सरकार हार रही है।


परंतु जब मतगणना हुई, तो योगी सरकार ही नहीं, बीजेपी उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भी सत्ता विरोधी तत्वों को तोड़कर सत्ता में आ गई। मैं आश्चर्यचकित था कि यह क्या हुआ। मैंने बहुत विचार किया और अंततः मेरी समझ में आ गया कि मुझसे क्या चूक हुई। बात यह है कि मोदी जी के अनुसार अब हम ‘न्यू इंडिया’ में हैं। यह मोदी जी का भारत है। स्पष्ट है कि इस ‘न्यू इंडिया’ की राजनीति को समझने के मापदंड भी नए हैं। नरेंद्र मोदी की इस न्यू इंडिया में सत्ता विरोध से परे एक ‘एक्स फैक्टर’ हिन्दुत्व विचारधारा है और उसका मानवीय स्वरूप स्वयं नरेंद्र मोदी हैं।

लेकिन हिन्दुत्व है क्या? इसकी बहुत सारी परिभाषाएं हैं। परंतु इसका सबसे सरल रूप मुस्लिम घृणा, अर्थात मुस्लिम विरोध है। बीजेपी की यही विचारधारा है जो वह जनता में विभिन्न रूपों में सफलतापूर्वक मार्केट कर रही है। यदि आप पांच राज्यों के चुनावी प्रचार का विश्लेषण करें, तो उसके दो स्वरूप थे। चुनावी तारीखों की घोषणा से पूर्व मोदी जी एक्सप्रेस वे और हवाई अड्डों का शिलान्यास कर जनता में प्रगति के सपने बेच रहे थे। बीच-बीच में काशी कॉरिडोर में वह औरंगजेब, अर्थात मुस्लिम विरोध का तड़का लगा रहे थे।

लेकिन जैसे ही चुनावी तारीखें आईं और विपक्ष, विशेष तौर पर समाजवादी पार्टी की रैलियों में भीड़ उमड़ने लगी, तो बीजेपी के प्रचार में विकास कम एवं हिन्दुत्व, अर्थात मुस्लिम विरोध पूरी तौर पर चढ़ता गया। यह काम भाषणों के साथ-साथ विभिन्न माध्यमों से हो रहा था। जैसे, खुले सरकारी स्थलों में हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम में जुमे की नमाज पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर, संत सम्मेलन के माध्यम से यह घोषणा हो गई कि जल्द ही भारत हिन्दू राष्ट्र होगा एवं मुसलमान उसमें द्वितीय दर्जे का नागरिक होगा। अर्थात ‘हिन्दू शत्रु’ मुसलमान गुलाम बना दिया जाएगा।

गजब तो तब हुआ जब एक नकाब पहने मुस्लिम युवा छात्रा को हिन्दू नौजवानों ने कॉलेज के बाहर खदेड़ा। यह एक प्रतीक था जिसके माध्यम से यह बताया जा रहा था कि हिन्दू राष्ट्र में मुस्लिम पुरुष तो पुरुष, मुस्लिम महिला भी सुरक्षित नहीं होगी। उधर, योगी जी ने 80 बनाम 20 का नारा देकर चुनाव को खुले तौर पर हिन्दू-मुस्लिम दंगल का रूप दे दिया। फिर ‘बुलडोजर बाबा’ का स्वरूप लेकर योगी जी ने यह भी समझा दिया कि उनके शासनकाल में हिन्दू विरोधी, अर्थात मुसलमान बुलडोजर से कुचल दिए जाएंगे। इस प्रकार का प्रचार मनोवैज्ञानिक यंत्र है जिसका प्रभाव दिल और दिमाग पर होता है। इसका प्रभाव इतना गहरा होता है कि अधिकांश जनता के मन-मस्तिष्क पर मुस्लिम घृणा का जादू सिर पर चढ़कर बोलता है और इस घृणा का नशा अफीम की तरह आम को कुछ और सोचने-समझने योग्य नहीं छोड़ता। वह तो बस केवल यही सोचता है कि मोदी जी और योगी जी के नेतृत्व में उसके ‘मुस्लिम शत्रु’ का वध हो जाएगा। देश में ‘रामराज्य’ होगा और फिर उसकी हर समस्या का समाधान हो जाएगा।


इस राजनीति का मानवी रूप पहले मोदी जी और दूसरे योगी जी बनकर उभरे हैं। मोदी जी तो सन 2002 में गुजराती मुस्लिम नरसंहार के बाद से ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ ही नहीं बल्कि मुसलमान को ‘ठीक’ करने वाले सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे हैं। वह केवल अपने भक्तों के बीच ही नहीं बल्कि साधारण हिन्दू गरीब जनता के बीच लगभग एक भगवान का स्वरूप ले चुके हैं। उनकी साख ऐसी चरम सीमा पर है कि वह जो बोलें, जनता उसको सत्य वचन ही मानती है। यही तो हैं जो देश को हिन्दू राष्ट्र बना रहे हैं। उन्हीं के कारण राम मंदिर का निर्माण संभव हुआ है। उन्होंने ही काशी से औरंगजेब का साया छांट दिया। भले ही उनके राज में दो रोटी की दिक्कत हो लेकिन वह देश को ‘अमृत काल’ में ले जा रहे हैं। फिर योगी जी मोदी के ‘सिपहलासार’ बनकर उभरे हैं। वह अब बुलडोजर बाबा हैं, अर्थात यदि कोई मोदी जी के हिन्दुत्व मिशन में आड़े आता है, तो योगी जी उसको कुचलकर मोदी का रास्ता साफ कर देते हैं।

यह ‘न्यू इंडिया’ की नई हिन्दुत्व राजनीति का एक नया रूप है। इस राजनीति में मनोवैज्ञानिक सिगनलों (संकेतों) के माध्यम से जनता के बीच एक नशा उत्पन्न होता है जिसका सुरूर इतना मादक होता है कि मतदाता वो टडालते समय यह भूल जाता है कि पेट्रोल सौ रुपये प्रति लीटर से भी महंगा है। नौजवान को यह याद नहीं रहता कि वह दो साल से नौकरी की तलाश में जूते चटखा रहा है। कारोबारी का यह अहसास मर चुका होता है कि नोटबंदी और लॉकडाउन ने उसका धंधा ठप कर दिया है। परिवार में कोविड से मरने वाले माता-पिता की मृत्यु के संबंध में उसको यह नहीं याद पड़ता कि सरकारी कोताही से ऑक्सीजन नहीं मिली और उसके सगे-संबंधी बेवजह मर गए।

यदि उत्तर प्रदेश और अन्य चार राज्यों में इन ‘नए हिन्दुत्व’ मापदंड पर वोटिंग नहीं होती, तो क्या यह संभव था कि भारी सत्ता विरोध के बावजूद योगी जी एवं अन्य तीन राज्यों में बीजेपी विजयी होती। हरगिज नहीं। देश मोदीत्व मय है और यह नशा बढ़ता ही जा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था भाड़ में जाए। देश की सारी संपत्ति कौड़ियों में पूंजीपतियों के हाथ बिक जाए। करोड़ों लोग बेरोजगारी भुगतते रहें। नोटबंदी में बैंक से अपना पैसा निकालने में भले ही जान चली जाए। लॉकडाउन में करोड़ों धंधे ठप हो जाएं। नरेंद्र मोदी ‘मुस्लिम शत्रु’ को ठीक करने की क्षमता रखते हैं। एक बार यह कार्य पूरा हो गया, तो फिर तो ‘रामराज्य’ होगा और हर हिन्दू के दुख-दर्द का निवारण हो जाएगा।


यह धर्म एवं पहचान की एक ऐसी नशीली राजनीति है जिसका नशा अभी देश के सिर चढ़कर बोल रहा है। दरअसल नरेंद्र मोदी एक नशा हैं जिसकी काट अभी कहीं दिखाई नहीं देती है। यह नशा कब तक छाया रहेगा, यह कहना एवं समझना अत्यंत कठिन है। विपक्ष के लिए इस नशे की काट निकाल पाना वैसे ही असंभव दिख रहा है जैसे मेरे लिए चुनाव को समझ पाना असंभव हो गया था। समस्या यह है किकेवल चुनाव ही नहीं, नरेंद्र मोदी ने देशकी पूरी राजनीति के मापदंड बदल दिए हैं। विपक्ष वैसे ही पुराने मापदंड से राजनीति कर रहा है, जैसे हमारे जैसे पत्रकार पुराने मापदंडों से चुनाव देख और पढ़ रहा है। यह नशा कैसे टूटे और कब टूटे, अभी कुछ कह पाना कठिन है।

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