आकार पटेल का लेख: सीबीआई-कोर्ट-जेल, सबकुछ गड़बड़ है, तो जी-20 में पीएम मोदी का प्रस्ताव तो अर्थहीन ही हुआ न !

समस्या बाहरी नहीं है, और हमारा ध्यान भी इस पर नहीं होना चाहिए कि दूसरे देश क्या करेंगे। ऐसे में जी-20 में तो हमारा प्रस्ताव हर मायने में अर्थहीन ही साबित होगा। हमें अपने गिरेबान में झांकना होगा। हमें अपने ही कानूनों का पालन करना होगा, तभी दूसरे देश भी हमारा सम्मान करेंगे।

By आकार पटेल

भारत ने भगोड़े आर्थिक अपराधियों से निपटने के लिए जी-20 देशों के सामने मजबूत सहयोग के तरीके अपनाने के लिए 9 सूत्रीय प्रस्ताव रखा।

भारत के इस प्रस्ताव में कहा गया है कि, “अपराधों से होने वाली कमाई के खाते सीज़ करने के लिए प्रभावी कानूनी प्रक्रिया, अपराधियों की देश वापसी और भगोड़े अपराधियों के प्रत्यर्पण आदि की प्रक्रिया में प्रभावी तेज़ी लाई जाए।”

मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि किसी और देश का कोई आर्थिक अपराधी भारत में आकर छिपा हो, ऐसे में माना जा सकता है कि भारत दरअसल उन अपराधियों के संदर्भ में यह बात कह रहा है जो यहां से भागकर विदेश में छिप गए हैं। जी-20 देशों में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन शामिल हैं।

मैं फिर से दोहराता हूं कि शादय ही रूस, सऊदी अरब, तुर्की, जापान, कोरिया, मेक्सिको, इंडोनेशिया जैसे देशों में भारत से भागकर कोई अपराधी छिपा हो। ऐसे अपराधियों की पसंदीदा जगह यूनाइटेड किंगडम या इंग्लैंड है। ऐसे में हम भारतीयों को जो सवाल पूछना चाहिए, वह यह कि आखिर इंग्लैंड में छिपे या पनाह लिए हुए अपराधियों को भारत लाने में दिक्कत क्या है?

पिछले साल नवंबर में, लंदन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने एक सटोरिए संजीव कुमार चावला और एक भारतीय दंपत्ति जतिंदर और आशा रानी अंगुराला के प्रत्यार्पण की इजाजत देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट की जज रेबेका क्रेन ने कहा कि वह इस बात से तो सहमत हैं कि संजीव चावला के खिलाफ प्रथम दृष्टया भारत-दक्षिण अफ्रीका के बीच दक्षिण अफ्रीका कप्तान हैंसी क्रोनिए की कप्तानी में सन् 2000 में हुई सीरीज के दौरान मैच फिक्सिंग के आरोप हैं। लेकिन, फिर भी वह संजीव चावला के प्रत्यार्पण की इजाजत नहीं देंगी क्योंकि उन्हें भारत की दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल में चावला के मानवाधिकार अधिकारों के सम्मान का भरोसा नहीं है।

जज ने अपने फैसले में कहा, “इस बात के पक्के आधार हैं कि संजीवा चावला को अगर तिहाड़ जेल भेजा गया तो उसकी प्रताड़ना की जाएगी और जेल में क्षमता से अधिक कैदियों की मौजूदगी के चलते और चिकित्सा सुविधाएं न होने के कारण उसके साथ अमानवीय व्यवहार हो सकता है।”

एक और केस में जज एमा अर्बुनॉट ने फैसला दिया कि जतिंदर और आशा रानी के मामले में सीबीआई ने गैर-जरूरी देरी की है इसलिए उनके प्रत्यार्पण की इजाजत देना उनके साथ नाइंसाफी होगी।

ऐसे में हमें इस विषय में सोचना होगा कि आखिर भारत अपने अपराधियों का प्रत्यार्पण कराने में नाकाम क्यों रहता है?

ऊपर बताए गए दो में से एक मामले में जांच ही ढुलमुल हुई। भारत ने सीबीआई जैसी एजेंसियों की तरफ से जो सबूत पेश किए वे नाकाफी साबित हुए। यूं भी मौजूदा सरकार के दौर में सीबीआई जैसी एजेंसी अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। इसके दो बड़े अधिकारी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। ऐसे में जब भारत में ही इस एजेंसी की जांच पर भरोसा टूट रहा है तो कानून का सम्मान करने वाला कोई भी देश सीबीआई जैसी एजेंसी की जांच को गंभीरत से क्यों लेगा?

दूसरी वजह है कि हमारी न्यायपालिका की काबिलियत और लोगों में इसके प्रति सम्मान। पत्रकार अभिजीत मित्रा ने अपनी जमानत की अर्जी में अपील की कि जेल में उन्हें अपनी जान का खतरा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई ने कहा कि, “अगर तुम्हारी जान खतरे में है तो जेल के अलावा और कौन सी सुरक्षित जगह हो सकती है तुम्हारे लिए।” अब इस बात को कौन कैसे समझेगा, यह मैं पाठकों पर ही छोड़ देता हूं।

तीसरी बात है हमारी जेलों की हालत। हमारी याददाश्त के सबसे भयावह अपराध निर्भया केस का एक आरोपी राम सिंह मार्च 2013 में तिहाड़ जेल की एक छोटी सी कोठरी में लटका पाया गया। तिहाड़ जेल के कानून अधिकारी और प्रवक्ता का कहना था कि यह तय नहीं है कि उसने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई। यहां ध्यान रखना होगा कि राम सिंह 2009 में एक दुर्घटना में बुरी तरह जख्मी हुआ था और उसके दाहिए हाथ में लोहे की रॉड डालना पड़ी थी। इसके बाद वह मुश्किल से ही इस हाथ मोड़ पाता था और कलाई को घुमा सकता था।

अगर आत्महत्या की कहानी मानें तो शायद ऐसा हुआ होगा कि राम सिंह ने जेल की एक चादर को फाड़कर उसे कमरे की 8 फुट ऊंची छत से बांधा, फिर प्लास्टिक की एक छोटी बालटी पर खड़ा होकर उसने फांसी लगा ली, और इस दौरान उसी कोठरी में सो रहे तीन दूसरे कैदियों को इसकी भनक तक नहीं लगी।

1995 की बात है, जब भारत ने इकबाल मिर्ची के प्रत्यार्पण के लिए सीबीआई अधिकारियों को भेजा। मैं उस समय मुंबई में सेशन कोर्ट की रिपोर्टिंग करता था। मिर्ची के वकील श्याम केसवानी ने मुझे इस मामले से जुड़े कुछ दस्तावेज़ दिए थे। यह वह दस्तावेज़ थे जो भारत ने ब्रिटेन में कोर्ट में पेश किए थे। यह कोई 200 पन्नों का आरोप पत्र था। इनमें से पहले 199 पन्नों में आरोपी का जिक्र तक नहीं था। आखिर पन्ने पर लिखा था, “इस केस में इकबाल मेमन उर्फ मिर्ची भी वांछित है।” जाहिर है जज ऐसे आरोप पत्र को रद्दी की टोकरी में फेंक देगा।

अब प्रधानमंत्री मोदी जी-20 सम्मेलन में कहते हैं कि एक-दूसरे देशों में हो रहे संगठित अपराधों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों को अपनाया जाए और आपस में सहयोग मजबूत किया जाए। लेकिन दुर्भाग्यवश ये सारे देश कानून मानने वाले देश हैं, और उनके यहां न्यायपालिका स्वतंत्र है। जब भी सुनवाई होगी, तो इन देशों की न्यायपालिका आरोपियों की इस दलील को जरूर सुनेगी कि भारत में जांच एजेंसियां, न्यायपालिका और जेलों में सबकुछ ठीक नहीं है। और, इस बात को तो हम भी नहीं झुठला सकते।

समस्या बाहरी नहीं है, और हमारा ध्यान भी इस पर नहीं होना चाहिए कि दूसरे देश क्या करेंगे। ऐसे में जी-20 में तो हमारा प्रस्ताव हर मायने में अर्थहीन ही साबित होगा। हमें अपने गिरेबान में झांकना होगा। हमें अपने ही कानूनों का पालन करना होगा, तभी दूसरे देश भी हमारा सम्मान करेंगे। फिलहाल तो दूसरे देशों की अदालतें हमारे बारे में जो कुछ कहती हैं, उस पर शर्म ही आती है।

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