भारत-पाक तनाव: ‘राष्ट्रहित’ की रणनीतिक दृष्टि

‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक सशक्त लेकिन संतुलित प्रतिक्रिया रही। अब समय है कि हम देश को विवेक और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाएं। दुनिया की नजर हम पर है- सिर्फ यह देखने के लिए नहीं कि भारत आगे क्या करता है, बल्कि यह समझने के लिए भी कि वह कैसी ताकत बनना चाहता है।

नई दिल्ली में शनिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिह और तीनों सेना प्रमुखों के साथ बैठक करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो : पीटीआई)
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अशोक स्वैन

पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की मौत ने भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को हवा दे दी और भारत ने 7 मई को देर रात जोरदार जवाबी कार्रवाई की। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत नियंत्रण रेखा के आसपास से लेकर पाकिस्तानी इलाके में काफी अंदर स्थित ‘आतंकवादी ढांचे’ पर हमला किया गया।

पाकिस्तान ने इस हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ करार देते हुए जवाबी कार्रवाई की। यह आलेख लिखे जाने के समय तक भारत ने पाकिस्तानी गोलाबारी में 16 लोगों के मारे जाने और 59 के घायल होने की जानकारी दी थी, जबकि पाकिस्तान का कहना था कि भारतीय हमले में 26 लोग हताहत हुए हैं। दोनों सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं और कथित मुख्यधारा का मीडिया आग उगलते हुए दुष्प्रचार फैला रहा है, टकराव के बड़े संघर्ष में तब्दील होने का जोखिम खतरनाक रूप से कहीं ज्यादा हो गया है। मौजूदा हालात में संयम बरतना समय की मांग है, न कि और कार्रवाई करके मामले को बढ़ाना। 

सैन्य हमले प्रतिशोध की भावना पैदा करते हैं, लेकिन वे अक्सर आतंकवाद के मूल कारणों को संबोधित नहीं करते। 2019 के बालाकोट ऑपरेशन या सर्जिकल स्ट्राइक ने कश्मीर में स्थाई शांति स्थापित करने की जगह दोनों देशों को युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया था। आतंकवादी हमले फिर भी जारी रहे और आम लोगों को निशाना बनाया जाना भी। सीमित सैन्य कार्रवाइयों का मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक महत्व हो सकता है, खास तौर पर घरेलू राजनीतिक संदर्भों में, लेकिन साक्ष्य बताते हैं कि उनका आतंकवादी समूहों की कार्रवाई करने और संगठनात्मक क्षमता पर दीर्घकालिक असर बहुत ही कम होता है। 

पाकिस्तान स्थित आतंकवादी नेटवर्क जटिल और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के हैं। उसके विकेन्द्रीकृत ढांचे और उसे मिल रहे अंतरराष्ट्रीय समर्थन का सीधा सा मतलब है कि उसके ट्रेनिंग कैंप पर हमला करने का सार्थक नतीजा निकलने की संभावना कम है। इसके उलट, इस तरह के हमले प्रतिकूल असर वाले हो सकते हैं क्योंकि इससे ऐसे समूहों की दृश्यता बढ़ेगी, रंगरूटों को भर्ती करने के उनके प्रयासों में मदद मिलेगी और पाकिस्तान के खुद को आंतकवाद पीड़ित बताने के नैरेटिव को बल मिलेगा जिसके लिए पाकिस्तान के सैन्य-असैन्य प्रशासन का एक तबका लगातार प्रयास कर रहा है। भारत के एक ऐसे रणनीतिक जाल में फंसने का जोखिम है जहां प्रत्येक सैन्य प्रतिक्रिया अनजाने में चरमपंथ को बरकरार रखने वाले हालात को ही मजबूत करेगी। 

2025 का भू-राजनीतिक माहौल 2019 की तुलना में कहीं अस्थिर है। पाकिस्तान ने मिसाइलों का परीक्षण किया है और अपने सशस्त्र बलों को हाई अलर्ट पर रखा है। एक गलत फैसला, एक गलत संदेश या दुर्घटनावश दोनों के बीच टकराव का विकराल रूप ले लेना कोई दूर की कौड़ी नहीं, यह खतरा वास्तविक है और बिल्कुल हमारे सामने खड़ा है। इसे और भी जटिल बना रही है पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की कमजोरी, क्योंकि दोनों के ही सामने वैधता का संकट है। ऐसे माहौल में, आंतरिक तौर पर अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए इस संकट का इस्तेमाल करने का लोभ पाकिस्तान को अतार्किक संघर्ष में धकेल सकता है। 


यह ध्यान में रखना होगा कि संघर्ष को खतरनाक तरीके से बढ़ने से रोकने का हमारे पास कोई परस्पर मान्य फ्रेमवर्क नहीं है। पारंपरिक युद्ध और परमाणु टकराव को अलग करने वाली स्पष्ट सीमा का अभाव खतरनाक आशंकाओं को बढ़ा देता है। सीमित झड़प से शुरू होने वाला संघर्ष- चाहे वह कितना ही नपातुला क्यों न हो- एक बड़े और बेलगाम युद्ध में बदल सकता है। दक्षिण एशिया में इसकी कीमत अकल्पनीय रूप से अधिक है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत की नपी-तुली आधिकारिक प्रतिक्रिया का उद्देश्य तनाव को बढ़ने से रोकना जान पड़ता है। अहम है कि यह रुख बरकरार रहे। पाकिस्तान के जवाबी हमले के इरादे को देखते हुए, भारत को बदले की भावना से तनाव बढ़ाने के चक्र से बचना चाहिए। वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखने वाली एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में, भारत को संयम और रणनीतिक धैर्य दिखाना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले ही तनाव में है और यूक्रेन, गाजा और ताइवान जलडमरूमध्य के संकट ने किसी अन्य संघर्ष में वैश्विक मध्यस्थता की गुंजाइश को काफी कम कर दिया है। बहुपक्षीय कूटनीति का पहले से ही कमजोर ढांचा दक्षिण एशिया में ऐसे किसी युद्ध को नहीं झेल सकता। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ समेत तमाम बड़ी ताकतों ने शांति, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की अपील की है।

गंभीर आतंकवादी हमले का शिकार होने के बावजूद भारत के लिए वैश्विक और क्षेत्रीय समर्थन अभी तक ठंडा है। अपेक्षा के अनुसार ही चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया है और पहलगाम हमले की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है। बांग्लादेश और नेपाल सहित अन्य दक्षिण एशियाई पड़ोसियों ने सतर्क तटस्थता का विकल्प चुना है। यहां तक ​​कि पश्चिम के पारंपरिक सहयोगियों ने भी बिना शर्त समर्थन देने से परहेज किया है। यह मंद प्रतिक्रिया न केवल भू-राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश बल्कि भारत की अड़ने वाली विदेश नीति और बहुपक्षवाद को हाशिये पर डालने के कथित बदलाव के साथ बढ़ती असहजता को भी दिखाती है।

भारत का अब कोई भी हमला इस प्रवृत्ति को उलट नहीं पाएगा, यह भारत के रणनीतिक अलगाव को और गहरा कर सकता है। चूंकि भारत एक बड़ी वैश्विक भूमिका निभाना चाहता है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थाई सीट के लिए कोशिश कर रहा है, इसलिए इसके कार्यों में एक वैश्विक शक्ति की परिपक्वता और जिम्मेदारी दिखनी चाहिए, न कि प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद का आवेग।

भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा प्रतिशोधात्मक सैन्य अभियानों में नहीं बल्कि एक ऐसा क्षेत्रीय वातावरण बनाने में निहित है जहां आतंकवाद को वैधानिक, कूटनीतिक और सहयोग के जरिये खत्म किया जाए। यानी खुफिया सहयोग को बढ़ाना, आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले वित्तीय और वैचारिक नेटवर्क का पर्दाफाश करना और पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान पर सार्वजनिक और निजी- दोनों तरह से लगातार दबाव बनाने के लिए सहयोगियों के साथ मिलकर काम करना।


इसका मतलब घरेलू कमजोरियों को दूर करना भी है। उग्रवादी समूह अक्सर स्थानीय शिकायतों, शासन की विफलताओं और बहुसंख्यकवादी नैरेटिव का फायदा उठाकर हिंसा को वाजिब ठहराते हैं। भारत की ताकत केवल उसकी सैन्य शक्ति में निहित नहीं, बल्कि इसमें भी है कि वह अपनी सीमाओं के भीतर न्याय, समावेशिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को कैसे कायम रखता है। यह निष्क्रियता या तुष्टिकरण का आह्वान नहीं। यह रणनीतिक दूरदर्शिता की अपील है। प्रतिशोध की हर कार्रवाई के चक्रीय परिणाम होते हैं और इसकी एक-एक सीढ़ी उपमहाद्वीप को विनाशकारी मोड़ के करीब ले जाती है। भारत की चुनौती उस चक्र को तोड़ने की है।

भारत ने खुद को कम विकसित देशों की आवाज, उभरती शक्तियों के नेता और अधिक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था के पक्षधर के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। लेकिन नेतृत्व का मतलब बड़बोलापन नहीं है; यह जिम्मेदारी लेने के बारे में है। आतंकवाद के खिलाफ एक सैद्धांतिक प्रतिक्रिया, जो अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय कूटनीति पर आधारित है, किसी भी मिसाइल या हवाई हमले से ज्यादा ताकतवर तरीके से बोलेगी।

यह संकट सिर्फ भारत के संकल्प की परीक्षा नहीं, यह उसकी दूरदर्शिता की भी परीक्षा है। क्या वह प्रतिशोध और उग्रता के चक्रव्यूह में फंस जाएगा या ऐसा रास्ता अपनाएगा जो अल्पकालिक शांति के बजाय दीर्घकालिक शांति को प्राथमिकता देता हो?

भारत चौराहे पर खड़ा है। पहलगाम में हुआ हमला एक त्रासदी थी तो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक सशक्त लेकिन संतुलित प्रतिक्रिया। अब समय आ गया है कि हम दृढ़ रहें और देश को विवेक और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाएं। दुनिया की नजर हमारी ओर है- सिर्फ यह देखने के लिए नहीं कि भारत आगे क्या करता है, बल्कि यह समझने के लिए भी कि वह किस तरह की ताकत बनना चाहता है।

(अशोक स्वैन स्वीडन के उप्सला विश्वविद्यालय में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं।)

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