मृणाल पांडे का लेख: मासूम घिसट रहे, सड़कों पर बच्चे जन रहीं महिलाएं, आंखे मूंद 20 लाख करोड़ का दंभ भर रही सरकार!

वित्त मंत्री ने कहा कि 8 करोड़ प्रवासी कामगारों को बिना राशन कार्ड राशन मिलेगा। इससे साबित होता है कि गरीब कामगारों में 8 करोड़ के पास राशन कार्ड नहीं है। शासन के केंद्रीकृत होने, योजनाओं का प्रचार करते रहने से सरकारी मशीनरी की लाल फीताशाही बढ़ चुकी है।

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

भारत में महामारी से निबटना स्वास्थ्य कल्याण, आर्थिक क्षेत्र, सामाजिक उथल-पुथल और प्रवासी मजदूरों के लिए घर वापसी की व्यवस्था जैसे कई मोर्चों पर जारी है। इसलिए जब प्रधानमंत्री ने 12 मई को टीवी पर आकर बताया कि वह 20 लाख करोड़ की भारी राशि इस पुण्य कार्य के लिए आवंटित कर रहे हैं, तो उम्मीद बंधने लगी। उसके बाद वित्त मंत्री ने लगातार पांच बार प्रेस वार्ता करके उसकी बाबत अनेक दावे और क्रमवार तरह से खुलासे किए। पर उनसे कुल मिलाकर जो शक्लउभरी, वह यह कि सरकार तात्कालिक राहत की बजाय मध्य और दीर्घ कालीन नक्शे बना रही है। सड़कों पर उतरे बेबस-बदहाल गरीबों के लिए कोई ठोस बड़ी वित्तीय या संसाधनों की राहत तुरंत उनसे निकलती नहीं दिखती। प्रधानमंत्री ने बार-बार याद दिलाया कि सारी दुनिया इस महामारी से जूझ रही है और हमको यदि मन में उनपर पूरा है विश्वास तो हम होंगे कामयाब और आत्मनिर्भर एक दिन।

इस समय कोविड से सबसे अधिक पीड़ित देशों की तालिका में भारत 11वें पायदान पर है। अच्छी बात यह है कि हमारे यहां मरने वालों की तादाद अमेरिका, यूरोप से कम है और अधिकतर (30,152) रोगी ठीक हो चुके हैं। लेकिन यह चिंता की बात है कि भारी आबादी वाली सघन बस्तियों से घिरे हमारे महानगरों में उन बस्तियों से बढ़ते संक्रमण और गंभीर रोगियों की तादाद लगातार बढ़ रही है। हमारे लोगों का ध्यान तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण द्वारा किए जाने वाले राहत कोषीय आवंटन के ब्योरों पर केंद्रित था। इस मुहिम के अंग-उपांगों पर पांच चरणों में हुई प्रेस वार्ताओं में मजदूर, कृषि क्षेत्र, छोटे, लघु और मंझोले उपक्रमों से लेकर ऊर्जा, कोयला, खदान, प्रति रक्षा और स्पेस तक के क्षेत्रों में जरूरी ढांचागत सुधार लाने पर कई योजनाएं और बातें रखी गईं। बातें अपनी जगह सही थीं, पर उनकी उचित जगह बजट भाषण में बनती है। इस समय हालात इतने नाजुक हैं कि उनसे तुरंत राहत दिलवाए जाने की उम्मीद टूट गई। गांव में इसी तरह के आह्वान को पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज कराना कहते हैं। दशा सचमुच मर्मवेधी है। यहां तक कि सरकार का प्रबल समर्थक मीडिया भी रोज मर्मवेधी दृश्य दिखा और रिपोर्ताज लिख रहा है, किस तरह लगातार तालाबंदी के शिकार ग्रामीण घर वापसी के लिए सड़कों पर लाखों की तादाद में भूखे हताश उतर रहे हैं। बच्चे घिसट रहे हैं, गर्भवती महिलाएं सड़क पर बच्चे जन रही हैं, खाना-पानी की समस्या अलग है। और सरकारी राहत वही पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज। किसी तरह गरीब प्रवासी अपने राज्य की सीमा पर पहुंचे भी तो वहां भी अव्यवस्था का आलम। सरकारी अमला कहीं डंडा चलाई से भूखों को निपटाता दिखता है तो कहीं भेड़-बकरियों की तरह ट्रकों-बसों में जाते लोग दिख रहे हैं। सबकी आंखों में यही सवाल है, हमारा क्या होगा?


ऐसे वक्त में बेहतर होता कि प्रेसवार्ता के दौरान वित्त मंत्री के तेवर इतने तीखे और विपक्ष को लेकर आक्रामक नहीं होते। यह सरकार का असुरक्षा बोध तो नहीं? मीडिया तो यही पूछ रहा था कि इन घोषित योजनाओं में तुरंत और ठोस राहत लायक क्या संभावनाएं हैं? मसलन, शरणार्थी शिविरों का रख-रखाव, भूखों के लिए खाना, दवा और गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों के उपचार के मानवीय इंतजाम? सारी चर्चा का अधिकतर भाग हम यह करेंगे, हम यह समिति बिठा रहे हैं के गिर्दही रही। जब राहत दिलाने की रणनीति की बजाय सरकार के पिछले 6 सालों की उपलब्धियां ही गिनाती नजर आए तो राहुल गांधी की प्रवासियों के बीच जाकर बैठने की खिल्ली उड़ाकर उसे नाटक करार देना अजीब विडंबना ही कहा जाएगा। लगभग सब बड़े आर्थिक जानकारों की राय है कि योजना का नाम किसी पर हो, उससे गरीबों की जेब में तुरंत पूरा नगद पैसा आ जाए। क्या इस आपत्ति के समय पहली जरूरत कगार पर खड़े असंगठित क्षेत्र के करोड़ों गरीब लोगों की जेब और उसकी मार्फत लस्त पड़े बाजारों में पूंजी पहुंचाने की नहीं होनी चाहिए?

यहां लगातार अपने ही हाथ में फैसलों का हक समेटने वाली केंद्र सरकार को ई-बैंकिंग द्वारा महिला खातों में ही रुपये भेजने को कटिबद्ध होना और पुरानी अनुभवी डेटा जमा करने वाली संस्थाओं के ताजा डेटा को (सिर्फ इसलिए किवह उसकी कई योजनाओं की विफलता का आईना था) सार्वजनिक तौर से गलत अविश्वसनीय ठहराना भारी पड़ सकता है। अगर सरकार खुद नया डेटा गलत बता चुकी हो और 2011 के बाद से ग्रामीण गरीबों या शहरी गरीब प्रवासियों की तादाद के विश्वस्त आंकड़े उसके पास हों ही नहीं, तब कौन-से बैंक खातों में किस तरह मनरेगा या गरीब कल्याण योजनाओं का पैसा भेजा जाएगा? खुद वित्त मंत्री ने कहा कि आठ करोड़ प्रवासी कामगारों को बिना राशन कार्ड राशन मिलेगा। अच्छा है, पर ब्योरा यह भी साबित करता है कि देश के सबसे गरीब कामगारों में आठ करोड़ के पास राशन कार्ड नहीं है। शासन के केंद्रीकृत होने और इतनी योजनाओं का प्रचार करते रहने से सरकारी मशीनरी की लाल फीताशाही काफी बढ़ चुकी है।


नित नए फरमानों, बीमारी और प्रावसियों की भारी आमद से सांसत में फंसी राज्य सरकारों का हाल ऐसा है कि इस समय उनके पास से राज्य के भीतर, बसों और श्रमिक एक्सप्रेसों से लौट रहे अपने शहरी गरीबों या प्रवासी ग्रामीणों की बाबत साफ सटीक जानकारी मिल पाना कठिन है। इसलिए सरकार द्वारा मनरेगा की राशि बढ़ाना प्रवासियों के शहरों से घर लौटने की दशा में उनके लिए ग्रामीण रोजगार बढ़ाने की दिशा में सही कदम है, लेकिन टेढ़ी खीर यह है कि बढ़े वेतन मान की राशि किन आधारों पर किन गरीबों को समय रहते कैसे दी जा सकेगी? यही हाल स्वास्थ्य क्षेत्र का है। गंभीर आर्थिक संकट से जूझती राज्य सरकारों को जोन तय करने का हक तो मिल गया है लेकिन उनको जोन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तय किए पैमानों के आधार पर ही तय करने हैं। ब्लॉक स्तर पर भी उनको खस्ताहाल स्वास्थ्य ढांचा ठीक करना है। उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे जनबहुल इलाकों में यह भारी मेहनत का काम होगा जो समय लेगा। गरीब इलाकों में बीमारियों की बहुतायत सब जानते हैं। दो महीने बाद मानसून आया तो मलेरिया, चिकुन गुनिया की भी आवक हो जाएगी। इस सब से सिलसिलेवार संस्थागत ढंग से निबटने के नाम पर आत्मनिर्भर भारत योजना में सरकारी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी पर साफ ब्योरे देखने में नहीं आए हैं।

अर्थपटल पर भी जैसी घोषणाएं तंत्रकी दुरुस्ती के नाम पर सामने आईं, उनमें से कुछ पर विपक्ष ही नहीं, खुद बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने मनरेगा जैसी कई योजनाओं को पुरानी शराब को नई बोतल में डालने जैसा कदम बताया और कहा कि इनमें सरकार द्वारा अपनी पीठ थपथपाने जैसा कुछ नहीं। उनकी राय में अधिकतर राहतकारी योजनाएं पूर्व सरकार की रची हुई प्रणालियों पर टिकी हैं, जिनकी 2014 के चुनाव में बीजेपी नेतृत्व ने मुखर आलोचना की थी। चलिए, कांग्रेस विपक्षी दल है इसलिए इन आक्षेपों को राजनीति से प्रेरित कहना आसान है। लेकिन खुद आरएसएस के मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ ने भी इस पैकेज को दुखद और सार्वजनिक की बजाय निजी क्षेत्र के हक में झुका ठहराते हुए कहा कि प्रतिरक्षा, कोयला और 6 अन्य क्षेत्रों का निजीकरण राष्ट्रीय हितों के खिलाफ जाएगा। संगठन ने उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश द्वारा इकतरफा तरीके से श्रम कानूनों में फेरबदल की भी कड़ी निंदा की है। महारोग से निपटने को जन-जन के स्वास्थ्य की जानकारी अपने पास रखने के नाम पर जारी सरकारी आरोग्य सेतु एप की भी आलोचना हो रही है। इसे कानूनन जरूरी तो कर दिया गया, पर यह ओपन सोर्स एप नहीं है। यानी संभव है, इसमें चोरी पर आमादा शातिर हैकर किसी का निजी डेटा पाने के लिए बग प्लांट कर दें। कम-से-कम दो मामलों में कोड में सेंध लगने की खबरें भी सामने आई हैं। कुछ कानून विदों की राय में जनता की आज्ञा के बिना उनका निजी डेटा संकलन करने वाला यह एप गैरकानूनी भी बनता है। भगवान न करे कि आशंकाएं सही निकलें और एक कठिन समय में लोगों के लिए नए झमेले पैदा कर दें। यह बात सरकार ने भी स्वीकार की है कि हमको इस नए वायरस के साथ रहने का अभ्यास करना होगा। स्वीकार करना होगा कि हमारी हालिया तरक्की का मूल स्रोत नारकीय परिस्थितियों में रहता आया विशाल अनदेखा और अवहेलित असंगठित क्षेत्र है। लिहाजा छाती ठोक कर गोदी मीडिया और मुसाहिबों से सरकार के पावभर जीरे में ब्रह्मभोज के वादे पर विरुदावली गवाने या विपक्ष से दो-दो हाथ करने की बजाय बेहतर होगा कि सरकार विनम्रता से पुरानी चूकें स्वीकार करे और हर राज्य में चुस्ती और मानवीयता से जनता-जनार्दन की पीड़ा जल्द-से-जल्द घटाने का बंदोबस्त करे।

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