ईरान ने युद्ध कला का सबक सिखाया: बम गिराए बिना भी अमेरिका को मात दे चुका है ईरान!

राष्ट्रपति ट्रंप इज्जत बचाकर भागने की फिराक में जबकि हावी ईरान ने मांगों की फेहरिस्त थमा दी। 

फोटो: Getty Images
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अशोक स्वैन

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युद्ध केवल वे नहीं जीतते जो बम गिराते और लोगों को मारते हैं। युद्ध वे भी जीतते हैं जो दुश्मन को उसके मकसद में कामयाब होने से रोकते हुए अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल करते हैं। इस नजरिये से ईरान कब का अमेरिका से युद्ध जीत चुका है, भले उसने अमेरिका को पारंपरिक मायने में न हराया हो।

ईरान पर बमबारी की गई, उसके नेताओं को मार डाला गया, उसके बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया गया और उसकी सैन्य क्षमता को कमजोर कर दिया गया। फिर भी, अपनी गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए वह बचा हुआ है। इससे भी ज्यादा अहम यह है कि उसने डॉनल्ड ट्रंप को मजबूर कर दिया है कि वह अपने अहम को बचाते हुए अपने ही द्वारा शुरू किए गए युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता खोजें। ईरान ने साबित कर दिया कि तैयारी और जज्बा मारक क्षमता पर भारी पड़ सकते हैं।

ट्रंप ने मानकर युद्ध छेड़ा कि उनकी अचानक ताबड़तोड़ हमले से दुश्मन को सकते में डालने वाली रणनीति से ईरान पस्त हो जाएगा। अमेरिका और इसराइल ने मान लिया था कि ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या करने और उसकी परमाणु और सैन्य सुविधाओं पर हमला करने से वहां की ‘सत्ता’ ढह जाएगी। लेकिन, उनका अंदाजा एकदम गलत निकला। ईरानी शासन अडिग रहा, मारे गए सर्वोच्च नेता की जगह दूसरे ने ले ली। रिवॉल्यूशनरी गार्ड टुकड़ों में नहीं बंटा। जनता ने भी सत्ता को उखाड़ फेंकने को विद्रोह नहीं किया, बल्कि लोग भारी संख्या में सड़कों पर उतरे और अपने नेतृत्व के प्रति समर्थन जताया। युद्ध से पहले जो सत्ता कमजोर मानी जा रही थी, वह विदेशी आक्रमण के खिलाफ एकजुटता दिखाकर और मजबूत हो गई।

अमेरिका ने पश्चिम एशिया में यह गलती बार-बार दोहराई है- किसी सरकार के प्रति नापसंदगी को यह मान लेना कि लोग विदेशी आक्रमण के लिए पलक-पांवड़े बिछाए बैठे हैं। हो सकता है कि ईरानी उनपर शासन करने वाले धर्मगुरु-वर्ग से नाराज हों; हो सकता है कि वे अपनी आर्थिक मुसीबतों का अंत चाहते हों; लेकिन जब कोई बाहरी ताकत हमला करती है तो राष्ट्रीय ध्वज के प्रति निष्ठा, उनके आपसी मतभेदों पर भारी पड़ जाती है।


अमेरिका और इसराइल ने शायद सोचा होगा कि उनका अभियान इस शासन की कमजोरी को उजागर कर देगा, लेकिन उन्होंने लोगों के हाथ में देशभक्ति की ढाल थमा दी। आंतरिक विरोध और बड़े प्रदर्शनों से जूझ रहे शासन को ईरानी संप्रभुता के रक्षक के रूप में देखा जाने लगा। ईरान में सत्ता विरोध को कलंकित करना अब आसान हो गया है, और कट्टरपंथियों को यह कहने का मौका मिला कि वे तो पहले ही आगाह कर रहे थे कि पश्चिमी ताकतें ईरान के खिलाफ साजिश कर रही हैं। 

मोल-भाव की ताकत का संतुलन अब बिल्कुल बदल गया है। युद्ध से पहले वॉशिंगटन ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम और उसकी नीतियों को लेकर बहुत ज्यादा मांगें कर रहा था। अब ट्रंप ही वह व्यक्ति हैं जो अपने देश के वोटरों के सामने इस युद्ध को एक सफलता के तौर पर पेश करने का तरीका खोजने की मशक्कत कर रहे हैं। वहीं, ईरान अब प्रतिबंधों में राहत, सुरक्षा गारंटी, जब्त संपत्तियों की वापसी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने प्रभाव को मान्यता देने की मांग कर रहा है। यह हारे हुए देश का रुख नहीं; यह ईरान के इस यकीन को दिखाता है कि अब जीत उसकी है।


जीत की घोषणा करने की ट्रंप की बेताबी यह हकीकत नहीं छिपा सकती कि युद्ध उनके पक्ष में नहीं जा रहा और इससे उन्हें भारी राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। युद्ध ने ऊर्जा महंगी कर दी है, बाजार अस्थिर हैं, सहयोगी नाराज और खाड़ी देशों के साझेदार खौफजदा। अमेरिका में भी राजनीतिक माहौल ट्रंप के खिलाफ हो गया है। मध्यावधि चुनाव नजदीक होने के बावजूद उनकी लोकप्रियता रेटिंग गिर रही है। वह धमकी दे सकते हैं, डींगें मार सकते हैं लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदलती कि ईरान ने घुटने नहीं टेके और उसे बिना लंबे जमीनी आक्रमण के समर्पण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो न तो अमेरिका चाहता है और न इसका जोखिम उठा सकता है। 

इसी कारण तोलमोल में तेहरान भारी है। ईरान को ट्रंप के टाइमटेबल का पता है। वह अमेरिका की घरेलू राजनीति को वॉशिंगटन के मुकाबले बेहतर समझता है। वह देख सकता है कि व्हाइट हाउस को सीजफायर की जरूरत ईरान से कहीं ज्यादा है। युद्ध की आर्थिक लागत ईरान के लिए बहुत अधिक है, लेकिन उसमें इसे सहने की हिम्मत है, क्योंकि वह दशकों से प्रतिबंधों और अलग-थलग रहने के हालात को झेल रहा है। 

होर्मुज जलडमरूमध्य अब निर्णायक युद्ध मैदान है। अमेरिका अब भी जहाजों को तबाह कर सकता है, बमबारी कर सकता है लेकिन ईरान ने दिखा दिया है कि वह इस संकरे जलमार्ग को वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपने हिसाब से चलाने के जबरदस्त हथियार में बदल सकता है। इस अहम वैश्विक व्यापार मार्ग से गुजरने में रुकावट डालकर या उसे नियंत्रित करके, जहाजों की आवाजाही को धमकाकर और तेल टैंकरों पर अतिरिक्त बोझ डालकर, तेहरान ने दुनिया को याद दिला दिया है कि भूगोल ही असली ताकत है। बेशक खुले समुद्र पर अमेरिका का राज हो, लेकिन धरती के सबसे संवेदनशील ऊर्जा गलियारे पर नियंत्रण ईरान का है।


होर्मुज जलडमरूमध्य को हथियार बनाकर, ईरान ने खेल के नियम ही बदल दिए हैं। खाड़ी के वे राजतंत्र जो खुले व्यापार, स्थिर बाजार और बाहरी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर थे, अचानक खतरनाक स्थिति में फंस गए हैं। उनकी आपसी फूट अब और साफ दिखने लगी है, और अमेरिकी सुरक्षा पर उनका लंबे समय से चला आ रहा भरोसा हिल गया है। निवेशकों ने देख लिया है कि मिसाइलों, ड्रोनों और समुद्री बाधाओं के कारण इस क्षेत्र के वित्तीय केन्द्र कितनी तेजी से अस्थिर हो सकते हैं। एशिया के तेल आयातक देश बेचैनी से हालात पर नजर रखे हुए हैं। दूसरी ओर, यूरोप पश्चिम एशिया में एक और लंबे संघर्ष में उलझने को तैयार नहीं। ईरान ने यह दिखाकर बढ़त हासिल कर ली है कि उसकी रणनीतिक ताकत की अनदेखी का नतीजा क्या हो सकता है। 

यही वजह है कि ईरान के इस युद्ध में बचे रहने की गूंज पश्चिम एशिया से बाहर भी है। ग्लोबल साउथ के ज्यादातर हिस्सों में, इस युद्ध को परमाणु अप्रसार या आतंकवाद-विरोधी नजरिये से नहीं देखा जाएगा; बल्कि इसे एक ऐसे मामले के तौर पर देखा जाएगा जिसमें एक महाशक्ति, सैन्य बल के बूते किसी संप्रभु देश का भविष्य तय करने की कोशिश कर रही थी। बेशक, ईरान लोकतंत्र न हो, लेकिन किसी महाशक्ति के सामने उसका अड़ना सराहा जाएगा। 1970 के दशक के वियतनाम की तरह ही, ईरान भी ऐसा आईना बन गया है जिसमें कमजोर देश, किसी कहीं ज्यादा ताकतवर महाशक्ति का मुकाबला करने की संभावना देखते हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह युद्ध ईरान को परमाणु क्षमता के और करीब ले जा सकता है। यदि ईरानी नेता इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि भविष्य के हमलों को रोकने का एकमात्र उपाय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता ही है, तो इस युद्ध का परिणाम इसके घोषित उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत होगा। अमेरिका का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह सैन्य श्रेष्ठता को रणनीतिक बढ़त समझने की भूल करता रहता है। वह लड़ाइयां जीत सकता है, लेकिन युद्ध हार सकता है। वह अपने विरोधियों को दंडित कर सकता है, लेकिन उन्हें राजनीतिक रूप से और अधिक मजबूत बना सकता है। वह अपनी जीत की घोषणा कर सकता है, फिर भी उसे एक कमजोर स्थिति से बातचीत करने के लिए विवश होना पड़ सकता है।


सत्ता के क्रूर गणित में, इस युद्ध में ईरान ज्यादा मजबूत होकर उभरा है, और अमेरिका उतना मजबूत नहीं रहा जितना ट्रंप मानते होंगे। इस युद्ध की शुरुआत इस भ्रम के साथ हुई थी कि ईरान टूट जाएगा। हो सकता है कि इसका अंत इस सच्चाई को स्वीकार करने के साथ हो कि ईरान से बातचीत ही करनी होगी।

(अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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