ईरान: ‘क्रांति’ के अपहरण का खतरा !

यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि इस विद्रोह को भी 1979 की क्रांति की तरह उन ताकतों द्वारा हाईजैक कर लिया जाए जो इसकी मूल मांगों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।

फोटो: PTI
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अशोक स्वैन

ईरान एक बार फिर खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है, जो अब उसके लिए नई बात नहीं रही। बढ़ती कीमतों, बकाया वेतन और आर्थिक बदहाली के खिलाफ दिसंबर के अंत से शुरू हुए प्रदर्शन अब 2022 के बाद से देश में हुए सबसे व्यापक और राजनीतिक रूप से मुखर विद्रोह में तब्दील हो चुके हैं। घरों में खाली पड़े फ्रिज और खत्म होती आजीविका को लेकर नाराजगी का जो दौर शुरू हुआ था, आंदोलन बनकर अब खुले तौर पर इस्लामी गणराज्य के अंत की मांगों में तब्दील हो चुका है। प्रांतों, जातीय सीमाओं और सामाजिक वर्गों को पार करते हुए प्रदर्शनों का सिलसिला न सिर्फ तेहरान से बाहर निकल बहुत दूर तक फैल चुका है, बल्कि ईरानी प्रवासी लियोन से लेकर लॉस एंजिल्स तक के शहरों की सड़कों पर उतर आए हैं। नारों में किसी तरह की सतर्कता या भाषा की संकेतिकता बीते दिनों की बात है, अब वे सीधे, आक्रामक, तल्खी भरे और क्रांतिकारी तेवर वाले हैं।

शासन भी इस बार पिछले अनेक वर्षों की तुलना में कहीं ज्यादा कमजोर दिख रहा है। पश्चिमी प्रतिबंध और ज्यादा सख्त हो गए हैं, तेल राजस्व सीमित है, मुद्रास्फीति आम परिवारों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है और मुद्रा का मूल्य काफी गिर चुका है। जून 2025 में सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए इजराइली हवाई हमलों ने वह असुरक्षाबोध और बढ़ा दिया है, जिसे छिपाने के लिए नेतृत्व जूझ रहा है। ईरान की क्षेत्रीय ताकत वाली छवि भी गंभीर दबाव में है। सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन में ईरान के सहयोगी और उनके प्रतिनिधि बुरी तरह कमजोर पड़ चुके हैं या अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ तेहरान के प्रभाव की सीमाएं उजागर हो रही हैं, ईरान में संसाधन भी घटते जा रहे हैं। तमाम ईरानियों के लिए, क्षेत्रीय शक्ति से सम्मान और समृद्धि मिलने का वादा बहुत पहले ही धराशाई हो चुका है।


शासन की प्रतिक्रिया वैसी ही क्रूर रही, जैसा अनुमान था। इंटरनेट बंद करना, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और गोली-बंदूक का इस्तेमाल एक बार फिर सड़कों पर दहशत फैलाकर शांति कायम करने के लिए किया जा रहा है। कुछ मानवाधिकार संगठनों का अनुमान है कि 500 ​​से अधिक प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। सरकारी टेलीविजन पर रटे-रटाए नारे लगाते सत्ता के लाखों वफादारों की तस्वीरें दिख रही हैं और सर्वोच्च नेता प्रदर्शनकारियों को विदेशी एजेंट बताकर खारिज कर रहे हैं। विरोध प्रदर्शन के इस दिखावटी चेहरे के पीछे एक ऐसी व्यवस्था छिपी है जो वास्तव में दबाव में है। सुरक्षा तंत्र अत्यधिक दबाव में हैं, पूर्व के समर्थकों के बीच भी उसकी वैधता घट रही है और भय भी अब पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा।

इसमें कोई शक नहीं कि ईरानियों को एक ऐसी व्यवस्था की दरकार है, जहां उनकी इच्छा का प्रदर्शन हो, जो उनके अधिकारों की रक्षा करे और उन्हें एक बेहतर भविष्य प्रदान करे। धार्मिक वर्चस्व पर आधारित और बलपूर्वक लागू की गई यह तानाशाही सरकार हर तरह से विफल रही है। इसने राजनीतिक जीवन को कुचल कर रख दिया है, महिलाएं और अल्पसंख्यक हाशिये पर धकेले जा चुके हैं, राष्ट्रीय संपत्ति को बर्बाद कर दिया है और देश को विदेशों में अंतहीन संघर्षों से टकराने के लिए छोड़ दिया है। लाखों लोग अब अगर इसे हटाने की मांग कर रहे हैं तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।


हालांकि, इस आक्रोश का कुछ हिस्सा जिस तरह किसी और दिशा में मोड़ा जाता दिखाई दिया है, चिंता की बात है। आजादी और सम्मान के नारों के साथ-साथ एक नई और परेशान करने वाली मांग भी सामने आई है: ‘राजशाही की वापसी’। प्रदर्शनकारियों का एक धड़ा और प्रवासी कार्यकर्ता पहलवी राजवंश की बहाली और अपदस्थ शाह के निर्वासित पुत्र रजा पहलवी को ईरान का शासक बनाने की मांग कर रहे हैं। साक्षात्कारों और सार्वजनिक बयानों में उन्होंने न सिर्फ ईरानियों से विरोध प्रदर्शन तेज करने का आग्रह किया है, बल्कि खुले तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका, और विशेष रूप से राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से, मौजूदा शासन को उखाड़ फेंकने के लिए ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करने का आह्वान भी किया है।

उन सभी लोगों के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए जो ईरान के भविष्य की वास्तव में परवाह करते हैं। इस्लामी गणराज्य की साख भले ही धूमिल हो गई हो, लेकिन शाह के शासनकाल की स्मृतियों में भी कोई वैसी आकर्षक कहानी नहीं हैं जो राजशाही समर्थक आज सुनाते और बेचते फिरते हैं। 1979 से पूर्व का राजतंत्र मौलवियों द्वारा छीनी गई स्वतंत्रता का स्वर्णिम युग तो था नहीं। यह एक सत्तावादी व्यवस्था थी जो क्रूर सुरक्षा तंत्र, राजनीतिक दमन, यातना के बल पर और जनता की भागीदारी को बड़े तरीके से दूर रखकर कायम की गई थी। मौजूदा धर्मतंत्र को जन्म देने वाली 1979 की क्रांति भी तो दशकों के तानाशाही, असमानता और विदेश समर्थित शासन की प्रतिक्रिया थी।


आज राजशाही को समाधान के रूप में प्रस्तुत करना इस बात को भूल जाना है कि लगभग आधी सदी पहले ईरानी लोग विद्रोह के लिए क्यों खड़े हुए थे। यह इस बुनियादी तथ्य को भी नजरअंदाज करता है कि निर्वासन में वैधता विरासत में नहीं मिल सकती। रजा पहलवी उन परिस्थितियों में नहीं रहे हैं जिनमें उनके समर्थक दावा करते हैं कि उन्हें अब शासन करना चाहिए। उन्होंने प्रतिबंधों, दमन या राज्य द्वारा थोपे गए रोजमर्रा वाले अपमानों का सामना नहीं किया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरानियों ने उन्हें कभी भी किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से नहीं चुना, और विदेशों में उनके नाम का जयकारा लगाने वाली भीड़ देश में किसी सामाजिक समझौते का प्रतीक नहीं है।

विदेशी सैन्य हस्तक्षेप की मांग और ज्यादा खतरनाक है। बाहरी हस्तक्षेप की कीमत किस तरह चुकानी पड़ती है, ईरान का आधुनिक इतिहास इसका उदाहरण है। 1953 में सीआईए रचित मोहम्मद मोसादेघ को सत्ता से बेदखल करने वाली तख्तापलट की साजिश से लेकर शीत युद्ध के दशकों के हेरफेर तक, विदेशी हस्तक्षेप ने लोकतांत्रिक संभावनाओं को बार-बार कमजोर और सत्तावादी ताकतों को मजबूत किया है। आज की तारीख में किसी भी विदेशी नेतृत्व वाले हस्तक्षेप का नतीजा निश्चित तौर पर अराजकता, नागरिकों की मुश्किलों और विखंडन के रूप में सामने आएगा, न कि आजादी के रूप में। इससे शासन को उसका सबसे शक्तिशाली हथियार भी मिल जाएगा: कि विद्रोह एक विदेशी साजिश है, जिससे और ज्यादा दमन को जायज ठहराया जा सके।


राजशाही वाली अपीलों के मूल में एक नैतिक विरोधाभास भी निहित है। दैवीय सत्ता का दावा करने वाली धर्मतांत्रिक व्यवस्था का विरोध करना और फिर उसे विदेशी शक्ति द्वारा समर्थित वंशानुगत शासक से प्रतिस्थापित करना मुक्ति नहीं है। यह एक गैर-जवाबदेह व्यवस्था को दूसरी गैर-जवाबदेह व्यवस्था से प्रतिस्थापित करना है। ईरानी विरोध इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वे गरिमा, स्वायत्तता और जीवन पर अपना नियंत्रण चाहते हैं। वे सड़कों पर मृत्यु का जोखिम उठाकर फिर से प्रजा बनने के लिए तैयार नहीं हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि इस विद्रोह को भी 1979 की क्रांति की तरह उन ताकतों द्वारा हाईजैक कर लिया जाए जो इसकी मूल मांगों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। उस समय, तानाशाही के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन को उन धार्मिक नेटवर्कों ने अपने कब्जे में ले लिया था जो अधिक संगठित और इतने निर्दयी थे कि उन्होंने मौके का फायदा उठा लिया। आज जोखिम इस बात का है कि नेतृत्व और समन्वय की कमी के कारण गैर-प्रतिनिधित्व वाली मुखर आवाजें, विशेष रूप से देश के बाहर से आने वाली, भविष्य को पहले से ही परिभाषित कर सकती हैं।


ईरान के प्रदर्शनकारियों के सामने असली चुनौती मौजूदा शासन को गिराना ही नहीं है, बल्कि एक और थोपी हुई व्यवस्था के उदय को रोकना भी है। इसके लिए आंतरिक दमन और बाहरी जोड़तोड़, दोनों का प्रतिरोध जरूरी है। मतलब यह कि किसी भी परिवर्तन का नेतृत्व ईरान के भीतर ईरानियों द्वारा समावेशी और वास्तविक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिये होना चाहिए।यानी, पगड़ी और ताज के बीच के झूठे विकल्प का अस्वीकार।

पश्चिम को भी सावधानी बरतनी होगी। मानवाधिकारों का समर्थन, अत्याचारों का दस्तावेजीकरण और ईरानी नागरिक समाज को मंच देना- यह सब वैध और जरूरी काम हैं, सत्ता परिवर्तन की साजिश रचना, निर्वासित दावेदारों का समर्थन करना या सैन्य कार्रवाई की धमकी देना नहीं। ऐसे कदम उन ताकतों को ही कमजोर कर देंगे जिनका समर्थन करने का दावा ईरान करता है और इससे ईरान की लंबे समय से चली आ रही घेराबंदी वाली मानसिकता और ज्यादा गहरी हो जाएगी।


ईरान एक चौराहे पर खड़ा है, और इतिहास गवाह है कि आगे का रास्ता भी सीधा या आसान नहीं होगा। विरोध करने वालों के साहस को कमतर नहीं आंकना चाहिए, न ही शासन की उन्हें दबाने के लिए क्रूर बल प्रयोग करने की क्षमता को। फिर भी, अनिश्चितता के बीच, एक सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए कि: ईरानियों को धार्मिक दबाव, वंशवादी लालसा या विदेशी बमों के बिना, आजादी के साथ अपना भविष्य चुनने का अधिकार है। एक प्रकार के प्रभुत्व को दूसरे प्रकार के प्रभुत्व से बदलने वाली क्रांति जीत नहीं होगी। यह दूसरा विश्वासघात होगा।

(अशोक स्वैन स्वीडन के उप्सला विश्वविद्यालय में शांति और संघर्ष अनुसंधान के प्रोफेसर हैं।)

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