यूपी में फिल्म सिटी की आंच पर राष्ट्रवाद की खिचड़ी पकाने की मंशा तो नहीं है योगी की !

योगी आदित्यनाथ की घोषणा के पहले भी उत्तर प्रदेश में नोएडा के पास एक फिल्म सिटी स्थापित की गई थी। मुंबई के कई निर्माताओं को जमीन मिली। वहां अभी तक कोई फिल्मी गतिविधि आरंभ नहीं हो सकी है। नोएडा फिल्म सिटी में अब समाचार चैनलों के दफ्तर खुले हुए हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों के निर्माण केंद्र के रूप में अगर उत्तर भारत में किसी भी शहर या इलाके को विकसित किया जाए तो भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? आजादी के पहले और बाद में, कभी इस तरह की गंभीर कोशिश ही नहीं हुई। शोध से पता चलता है कि आजादी के पहले बिहार के गया में किसी जमींदार ने एक स्टूडियो की स्थापना की थी। उत्तर प्रदेश में ऐसी किसी गतिविधि की जानकारी नहीं मिलती। इन दोनों राज्यों समेत सभी हिंदी भाषी राज्यों में सिनेमा के प्रति समाज का रवैया वर्जना का रहा है।

आज भी हिंदी भाषी राज्यों में फिल्मों को प्रतिष्ठा हासिल नहीं है। इधर, छिटपुट प्रतिभाओं ने मुंबई में दस्तक दी है और कुछ ने जगह भी बनाई है। इन सभी को पहचान और कामयाबी हासिल करने के पहले तक परिवार और समाज से लांछन और ताने ही मिले हैं। पूरी तरह से अपनी जिद्द और कोशिशों से वे यह मुकाम हासिल कर पाते हैं। समाज ने उनकी कभी कोई मदद नहीं की। यहां तक कि पहचान के बावजूद उन्हें किसी सम्मान के काबिल नहीं समझा जाता। महाराष्ट्र, बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की तरह फिल्मी प्रतिभाओं की कदर नहीं की जाती।

वास्तव में हिंदी प्रदेशों में सिनेमा का संस्कार नहीं है। ऊपर उल्लिखित राज्यों में फिल्म सोसाइटी बनाकर फिल्मों को देखने, समझने और सराहने की लंबी मुहिम चली है। उसकी वजह से वहां सिनेमा की संस्कृति विकसित हुई। स्थानीय फिल्मकार और कलाकार उभरे। उन्होंने इन राज्यों में वहां की भाषाओं में फिल्में बनाई। इस लिहाज से पूरे उत्तर भारत में किंचित छिटपुट प्रयासों को छोड़ दें तो पूरा सूखा रहा है। आजादी के पहले और बाद में ऐसा कोई अभियान नहीं देखा गया। नतीजतन इन प्रदेशों की प्रतिभाएं अपनी कलात्मक ख्वाहिशों को लेकर कोलकाता, लाहौर और मुंबई जाती रहीं। आजादी के बाद हिंदी फिल्मों के निर्माण का केंद्र मुंबई बन गया तो सभी मुंबई की तरफ खिंचे आने लगे।

देश में किसी फिल्म निर्माण केंद्र का विकास सरकारी योजनाओं से नहीं हुआ है। सभी भाषाओं में फिल्में ऑर्गेनिक तरीके से पली-बढ़ी और विकसित हुई। हिंदी सिनेमा के संदर्भ में इस ऐतिहासिक तथ्य को ध्यान में रखना जरूरी है कि सारे आरंभिक प्रयास मुख्य रूप से लाहौर, कोलकाता और मुंबई के आसपास हुए। ऐतिहासिक कारणों से आजादी के बाद मुंबई गढ़ बन गया और बाकी केंद्र लुप्त हो गए। इस दौर में हिंदी प्रदेशों में कोई खास और उल्लेखनीय सुगबुगाहट या हलचल नहीं दिखी।

ज्यादा विस्तार और विवरणों में नहीं जाते हुए यहां यह उल्लेख जरूरी है कि फिलहाल हिंदी प्रदेशों में फिल्म निर्माण और शूटिंग सुविधाओं को लेकर उत्सुकता दिख रही है। उत्तर प्रदेश ने पहल की है। पिछले 25 सालों से इस दिशा में प्रयास हो रहे हैं। फिल्म बंधु के गठन और आरंभिक प्रयत्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन प्रयत्नों से ही उत्तर प्रदेश में लगातार शूटिंग की रफ्तार बढ़ती रही। उत्तर प्रदेश की सरकार ने कुछ शर्तों के साथ रियायत और आर्थिक अनुदान देना भी शुरू किया। स्थानीय लोकेशन और प्रतिभाओं की भागीदारी के आधार पर विभिन्न स्लैब तय किए गए हैं। मुंबई एवं अन्य राज्यों के निर्माताओं को आकर्षित किया गया है। छोटे-बड़े, हर तरह के निर्माताओं ने इन सुविधाओं का उपयोग किया। हिंदी फिल्मों के परिचित और लोकप्रिय सितारों ने भी उत्तर प्रदेश में जाकर शूटिंग की और सरकारी सहयोग का लाभ उठाया।

पिछले दशक की हिंदी फिल्मों में ऐसी 100 से अधिक फिल्में मिल जाएंगी जिनका लोकेशन उत्तर प्रदेश रहा है। उनसे उत्तर प्रदेश का राजस्व बढ़ा है। यह भी लिखना जरूरी है कि अखिलेश यादव के शासनकाल में आई फिल्मों की शूटिंग की लहर इधर थोड़ी धीमी हो गई है। निर्माता बताते हैं कि उन्हें पहले जैसी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। आर्थिक सहयोग लगभग ठप है। अनेक निर्माता इस सहयोग के लिए लखनऊ के चक्कर लगाते रहते हैं। इसके अलावा वर्तमान सरकार में मौजूद राजनीतिक पार्टी के विरोधी विचारों के फिल्मकारों को कोई मदद नहीं दी गई है। अनुराग कश्यप ने ‘मुक्काबाज’ और ‘सांड की आंख’ की शूटिंग उत्तर प्रदेश में की थी लेकिन उन्हें कोई आर्थिक अनुदान नहीं दिया गया। इसी प्रकार ‘मुल्क’ और ‘आर्टिकल 15’ के निर्माता-निर्देशक अनुभव सिन्हा को भी इस लाभ से वंचित रखा गया है। गौर करें कि योगी आदित्यनाथ की फिल्मी हस्तियों के साथ दो बैठकों में इन दोनों फिल्मकारों को निमंत्रित भी नहीं किया गया। ऐसे अनिमंत्रित फिल्मकारों की तादाद बड़ी है।

योगी आदित्यनाथ 2017 में मुख्यमंत्री बने। तब से उन्हें फिल्म निर्माण के लिए फिल्म सिटी का कोई ख्याल नहीं आया। इधर, सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री के खिलाफ चली नियोजित मुहिम के पश्चात उन्हें सुध आई और उन्होंने हड़बड़ी में घोषणा कर दी। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार इसके पीछे चुनावी पासा भी देख रहे हैं। उत्तर प्रदेश में फिल्म सिटी का निर्माण फिलहाल एक शिगूफा ही जान पड़ता है। इस शिगूफे में उत्तर प्रदेश बनाम मुंबई का कोण मीडिया की रुचि का विषय बन गया है। नैरेटिव चलाया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ की पहल और कोशिश से मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री उत्तर प्रदेश ले जाई जाएगी। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों के बयानों की मनगढ़ंत व्याख्या से इस मुहिम को हवा दी जा रही है।

सच्चाई यह है कि मुंबई का फिल्म जगत कोई औद्योगिक इकाई नहीं है जिसे एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह स्थापित कर दिया जाए। उदाहरण के लिए यह नैनो का बनाने वाली कंपनी का उद्यम नहीं है जो बंगाल से गुजरात चला गया था। फिल्म इंडस्ट्री हमेशा ऑर्गेनिक तरीके से विकसित होती है। अभी तक का यही साक्ष्य है। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय उद्यमियों और प्रतिभाओं का संयुक्त प्रयास हो। मुंबई की फिल्म नर्सरी से पौधे ले जाकर उत्तर प्रदेश में बोएंगे तो वह किसी भी रूप में उत्तर प्रदेश की भाषा, संस्कृति, साहित्य और समाज का संवाहक नहीं हो पाएगा।

मुंबई के निर्माता तो बगैर फिल्म सिटी के निर्माण के उत्तर प्रदेश में दशकों से शूटिंग करते आ रहे हैं। हमेशा 10-20 हिंदी फिल्मों की शूटिंग उत्तर प्रदेश में चलती रहती है। मुख्य रूप से लखनऊ, बनारस और आगरा के आसपास के इलाके के लोकेशन होते हैं। इन फिल्मों में स्थानीय मजदूरों और कलाकारों का उपयोग भी होता है। यह अलग बात है कि उन्हें सस्ते दर पर हायर किया जाता है।

दरअसल, मंशा कुछ और है। सितंबर में फिल्म सिटी की घोषणा के लिए हुई बैठक में योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट संकेत दिया था। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था, ‘वास्तव में हम जिस समाज में, जिस संस्कृति में और जिस देश में निवास करते हैं, उसके बारे में कितना योगदान दे पा रहे हैं...कुछ कारणों से जो अपेक्षा इस इंडस्ट्री से है वह कहीं- न-कहीं हम मिस कर रहे हैं...अगर आपका सहयोग मिला तो हम देश के लिए देश की भावनाओं के अनुरूप एक नया मंच ला सकेंगे।’ इस संबोधन में आए ‘अपेक्षा’, ‘देश की भावना’ और ‘नया मंच’ शब्दों पर गौर करने की जरूरत है। वास्तव में यही योगी आदित्यनाथ की मंशा है- उत्तर प्रदेश में कथित राष्ट्रवाद की भावनाओं के अनुरूप फिल्मों का निर्माण करना। मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री को हिंदू विरोधी, माफिया संचालित और राष्ट्र विरोधी ठहराने का जोरदार प्रचार किया गया है। अफसोस की बात है कि इस नियोजित प्रचार की चपेट में देश के नागरिक और दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा आ चुका है। एक तरीके से यह वर्तमान केंद्रीय और राज्य सरकारों और उनमें मौजूद सत्तारूढ़ पार्टी के प्रति जारी अंधभक्ति का ही विस्तार है।

योगी आदित्यनाथ की वर्तमान घोषणाओं के पहले भी उत्तर प्रदेश में नोएडा के पास एक फिल्म सिटी स्थापित की गई थी। मुंबई के अनेक निर्माताओं को जमीन आवंटित की गई थी। वहां अभी तक कोई फिल्मी गतिविधि आरंभ नहीं हो सकी है। सभी जानते हैं कि नोएडा फिल्म सिटी में समाचार चैनलों के दफ्तर खुले हुए हैं। आवंटित जमीनों को मूल मालिकों ने मुनाफे के साथ बेच दिया या किराए पर दे दिया। यह एक प्रकार का लैंडस्कैम है। यही आशंका फिर से व्यक्त की जा रही है कि नई फिल्म सिटी के निर्माण के नाम पर आवंटित की जाने वाली जमीनों का भी यही हाल होगा क्योंकि फिलहाल फिल्म निर्माण की यह संभावना नहीं दिख रही है कि उत्तर प्रदेश में निर्माण केंद्र आनन-फानन में विकसित हो जाएगा। वहां फिल्मों का निर्माण आरंभ हो जाएगा। हां, इस बीच में मुंबई के अनेक निर्माता निश्चित ही उत्तर प्रदेश सरकार के उत्साह का लाभ उठा लेंगे।

अंत में यह दोहराना जरूरी है कि किसी भी हिंदी भाषी राज्य में फिल्म निर्माण की गतिविधि का बढ़ना स्वागत योग्य है लेकिन हमें यह ध्यान में रखना होगा कि वह राज्य की संस्कृति, साहित्य और चेतना का प्रतिनिधित्व करे। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में हिंदी के साथ अवधी, ब्रज और भोजपुरी फिल्मों के विकास पर भी ध्यान देने की जरूरत होगी। उत्तर प्रदेश में हिंदी का विपुल साहित्य रचा गया है। सिनेमा में उसका सदुपयोग हो सकता है। स्थानीय प्रतिभाओं को मदद देने के साथ इस अभियान में उन्हें शामिल करने की भी जरूरत है। मुंबई से आयातित स्थापित निर्माता इस दिशा में निर्णायक मदद नहीं कर सकते।

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