खरी-खरीः ‘जंग टलती रहे, तो बेहतर है...!’

बालाकोट आतंकी कैंप की तबाही के बाद भारत और पाकिस्तान एक और युद्ध की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। यह स्थिति क्या करवट लेती है, अभी कह पाना कठिन है। लेकिन यह तय है कि भारत-पाक सीमा पर स्थिति गंभीर है और दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

अंततः जो होना था वही हुआ। पाकिस्तान ने पिछले तीन दशकों से भारत में आतंकवाद का जो तांडव मचा रखा था उसका जवाब उसको मिल गया। पुलवामा आतंकी हमला केवल एक दुखद घटना ही नहीं, अपितु भारत के धैर्य की एक परीक्षा भी थी। अंततः नरेंद्र मोदी को मौका मिला और भारतीय वायुसेना ने सीमा पार बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंप पर घातक धावा बोलकर आतंकी अड्डा ध्वस्त कर दिया।

लेकिन ऐसी स्थिति में जो होता है वह भी शुरू हो चुका है। इस लेख के लिखे जाते समय कश्मीर में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की वायुसेना का एक विमान गिरा दिया था। उधर, पाकिस्तान यह दावा कर रहा था कि उसने हमारा विमान गिराकर भारतीय पायलट को बंदी बना लिया है।

लब्बोलुआब यह कि बालाकोट आतंकी कैंप की तबाही के पश्चात भारत और पाकिस्तान एक और युद्ध की ओर बढ़ते दिखाई पड़ रहे थे। कुछ दिनों में यह स्थिति क्या करवट बदलती है, यह अभी कह पाना कठिन है। परंतु अब यह तय है कि भारत और पाक सीमा पर स्थिति गंभीर है और दोनों देशों के बीच एक और युद्ध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

अगर युद्ध होता है तो क्या होगा! मैं एक सेना विशेषज्ञ नहीं हूं इसलिए मैं कुछ नहीं बता सकता। हां, केवल इतना कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु बमों से लैस देश हैं। इस परिस्थिति में युद्ध भीषण भी हो सकता है और बड़ी तबाही भी ला सकता है। लेकिन क्या युद्ध होना चाहिए?

हमारे देश में इस समय जो भावनाएं हैं वह ये हैं कि आखिर भारत कब तक पाकिस्तानी आतंक का शिकार बना रह सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में चुनाव प्रचार के समय यह स्पष्ट कर दिया था कि अगर उनके शासन में पाकिस्तान, भारत के साथ कोई छेड़छाड़ करता है तो वह उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे। उस समय उन्होंने एक कविता ‘कसम मिट्टी की खाता हूं, भारत को न मिटने दूंगा’, पढ़कर इस संबंध में अपने विचार प्रकट कर दिए थे। बालाकोट हवाई ऑपरेशन के कुछ घंटों बाद एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने फिर वही कविता पढ़कर ये स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने पाकिस्तान से बदला ले लिया।

परंतु यह बदले की राजनीति कभी-कभी खतरनाक हो जाती है। इस राजनीति को एक व्यक्ति शुरू तो कर सकता है, लेकिन इस राजनीति को शुरू करने वाले के हाथ में यह नहीं होता कि वह जब चाहे इस खेल को खत्म कर दे। क्योंकि जिस प्रतिद्वंद्वी से बदला लिया जाता है उसके समर्थक फिर चाहते हैं कि वह बदले का बदला लें और फिर यह खेल बदले के दायरे से निकल कर कब एक संपूर्ण युद्ध का रूप ले लेता है यह कहना कठिन होता है।

मैं जिस समय यह लेख लिख रहा था, उसी बीच मेरे पास पाकिस्तान के एक पत्रकार का फोन आया। मैंने उनसे पूछा कि पाकिस्तान में स्थिति कैसी है। उनका जवाब था कि कल जब भारतीय हवाई गतिविधियों का समाचार पाकिस्तान में आम हुआ तो यकायक पाकिस्तान में इमरान खान के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। उनके अनुसार पाकिस्तानी जनता इमरान से यह सवाल कर रही थी कि जिस वक्त भारतीय विमान पाकिस्तानी सरहद में थे, तब उनको गिराया क्यों नहीं गया। पत्रकार ने मुझे फोन पर यह भी बताया कि अब पाकिस्तान में एक ‘हिस्टीरिया’ फैल चुका है और इमरान सरकार बदला लेने के दबाव में है।

निःसंदेह जब दो देशों के बीच बदले की भावना चरम सीमा पर पहुंच जाए, तो यह अति गंभीर मोड़ ले सकती है। भारत और पाकिस्तान बालाकोट प्रकरण के चौबीस घंटों के पश्चात उसी गंभीर दशा में खड़े नजर आ रहे हैं। अब मूल प्रश्न यही है कि क्या अब पाकिस्तान के साथ एक निर्णायक युद्ध होना चाहिए? युद्ध, युद्ध होता है, उससे कभी कोई निर्णायक बात नहीं बनती है। इस संबंध में साहिर लुधियानवी ने 1965 में भारत-पाक जंग के समय युद्ध के बारे में एक कविता लिखी थी जिसकी कुछ पंक्तियां मुझे इस समय याद आ रही हैं। वह पंक्तियां कुछ यूं हैं :

टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें

कोख धरती की बांझ होती है

फतह (जीत) का जश्न हो या हार का सोग

जिस्त (जिंदगी) मय्यतों (मौत) पर रोती है

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों

जंग टलती रहे तो बेहतर है

आप और हम सभी के आंगन में

शमा जलती रहे तो बेहतर है।

इस समय देश में जो वातावरण है उसमें इस प्रकार की बातें और ‘आंगन में शमा’ जलते रहने की कामना एक दीवानगी कही जा सकती है। परंतु इस कटु सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि इस इक्कीसवीं सदी में युद्ध न तो निर्णायक हो सकता है और न ही उसका कोई अर्थ बचा है। यदि युद्ध का कोई अर्थ होता, तो तीन दशकों तक तालिबान से युद्ध लड़ने के पश्चात अमेरिका जैसी सुपर पावर इस समय तालिबान के साथ वार्तालाप नहीं कर रही होती।

लेकिन अभी भी युद्ध का एक अर्थ बचा है। वह यह है कि युद्ध से उत्पन्न होने वाली जन भावनाओं की लहर पर सवार होकर नेता अपनी कुर्सी बचा सकता है। अर्थात् युद्ध देशों और देशवासियों के हित में तो नहीं बचे। हां युद्ध से किसी नेता का हित सिद्ध हो सकता है। क्या भारतवर्ष में इस समय ऐसी परिस्थिति है कि युद्ध में किसी नेता का हित सिद्ध हो सके!

भारत इस समय अगले लोकसभा चुनाव के दहाने पर खड़ा है। अगले माह लोकसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा भी हो जाएगी। सच तो यह है कि बालाकोट हवाई गतिविधियों से पहले देश की सारी राजनीतिक पार्टियां चुनावी मूड में आ चुकी थीं। ऐसी स्थिति में पहले पुलवामा और फिर बालाकोट हुआ और अब देश में भारत-पाक युद्ध की संभावना पर चर्चा शुरू हो रही है। इस बात से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पुलवामा आतंकी हमले से पहले बीजेपी चुनावी परिस्थितियों के अनुसार बहुत अच्छी स्थिति में नहीं थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि काफी बिगड़ चुकी थी। नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी और किसान हताशा जैसी गंभीर समस्याओं ने बीजेपी के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव को बहुत कठिन बना दिया था। ऐसी परिस्थितियों में पाकिस्तान का आतंकी हमला बीजेपी के लिए जनता की समस्याओं से जनता का ध्यान बंटाने का एक अवसर सिद्ध हो सकता है।

लेकिन यह तभी संभव है जब जनता के मन में पाकिस्तान के विरुद्ध घृणा की भावना एक लंबे समय तक बनी रहे, ताकि उसका ध्यान नोटबंदी, जीएसटी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से हट कर पाकिस्तान से बदले की भावना की ओर भटक जाए। ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी के लिए पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण स्थिति का बना रहना सार्थक हो सकता है।

परंतु बीजेपी का आधार अपने तरह का राष्ट्रवाद है, जिसका संबंध चुनावी हित है। लेकिन राष्ट्रवाद और देशभक्ति का निचोड़ देशहित होता है। और इस 21वीं शताब्दी में यह तय है कि युद्ध देशहित में नहीं होता है। इसलिए मुझे आशा है कि पाकिस्तान के साथ इस तनावपूर्ण स्थिति में जो भी फैसला किया जाएगा वह वोटहित में नहीं देशहित में ही होगा।

यही कारण है कि 27 फरवरी को जब कांग्रेस के नेतृत्व में 21 विपक्षी पार्टियों की बैठक दिल्ली में हुई तो उसमें सरकार को देश की एकता और अखंडता बरकरार रखने की खुली छूट दे दी गई। अब प्रधानमंत्री पर देश हित में भारत की अखंडता और एकता को बरकरार रखने का पूर्ण दायित्व है।

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