बात महिला आरक्षण की है ही नहीं, माजरा कुछ और है...

2029 के आम चुनावों से पहले महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का शोर उठना और इस बाबत सरकारी प्रयास क्या सचमुच महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के बारे में है? या फिर कहानी कुछ और है?

संसद की नई और पुरानी इमारतें (फोटो - Getty Images)
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राधा कुमार

सत्ताधारी बीजेपी 2027 की जनगणना का इंतजार किए बिना ही सीटों के ‘परिसीमन’ पर जोर दे रही है। इससे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ को लागू करना संभव हो पाएगा, जिसके तहत 2029 के आम चुनावों से पहले महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण जरूरी किया गया है। लेकिन क्या ये प्रयास सचमुच महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के बारे में है? या फिर कहानी कुछ और है?

24 मार्च को मीडिया ने बताया कि गृहमंत्री अमित शाह ने एनडीए सहयोगियों और ‘चुनिंदा’ विपक्षी पार्टियों (कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों को छोड़कर) के साथ बंद दरवाजों के पीछे हुई बातचीत में, विधायी सीटों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा ताकि इनमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकें। इस दांव से मौजूदा सांसदों और विधायकों को - जिनमें 85 फीसदी पुरुष हैं - अपनी सीटें बरकरार रखने का मौका मिल जाएगा और महिलाओं को भी बढ़ी हुई लोकसभा में 816 में से 273 सीटें मिल जाएंगी।

दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए, हर राज्य की सीटों का हिस्सा मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखा जाएगा। छह दक्षिणी राज्यों (और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी) के पास लोकसभा की 24 फीसदी सीटें हैं। इसके लिए सरकार दो बिल लाएगी- एक राज्य की सीटों को 25-30 साल के लिए फ्रीज करने के लिए, और दूसरा परिसीमन आयोग की नियुक्ति के लिए। यह आयोग 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाएगा, न कि 2027 की जनगणना को, क्योंकि नई जनगणना के अंतिम आंकड़े इतनी देर से जारी होंगे कि 2029 से पहले परिसीमन संभव नहीं हो सकेगा।

24 मार्च की शाम तक, समाचार माध्यमों ने स्पष्ट कर दिया कि ये चार अलग-अलग प्रस्ताव थे:

  1. महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण को 2027 की जनगणना से अलग करना

  2. लोकसभा (और राज्य विधानसभाओं) का विस्तार

  3. महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित करना (विस्तारित लोकसभा में)

  4. 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन करना, साथ ही राज्यवार अनुपात को बनाए रखना।

दूसरे शब्दों में, विधायिका के 50 प्रतिशत विस्तार का जो प्रस्ताव है, उसका महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं। ऐसा लगता है कि इसका असली मकसद 2027 की जनगणना से पहले और 2029 के आम चुनावों से ठीक पहले विधायिका के विस्तार या परिसीमन को आगे बढ़ाना है, और साथ ही इसे ऐसा दिखाना है कि यह महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़ा मामला है।

महिलाओं के लिए आरक्षण का बिल सबसे पहले कांग्रेस ने ही 1990 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव के कार्यकाल में पेश किया था। विधायिका का विस्तार एक पेचीदा मसला है। दक्षिणी राज्यों की अपनी जायज चिंताएं हैं, और चुने हुए प्रतिनिधियों से मोहभंग होने के कारण जनता भी इसे शक की नजर से देखती है। महिलाओं के लिए आरक्षण के मुद्दे को विधायिका के विस्तार के साथ जोड़ देने से, विस्तार करने और मौजूदा पुरुष सांसदों को बचाने के दोहरे मकसद पर पर्दा पड़ जाता है।


राज्यों की सीटों के हिस्से को मौजूदा स्तर पर फ्रीज रोक देने का प्रस्ताव दक्षिणी राज्यों का समर्थन हासिल करने के लिए लाया गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की अगुवाई में इन राज्यों ने लोकसभा के जनसंख्या-आधारित विस्तार का विरोध किया है, क्योंकि इससे कुल सीटों में उनका हिस्सा घटकर पांचवें हिस्से से भी कम रह जाएगा। अब 2011 की जनगणना ही क्यों? 2027 की जनगणना का इंतजार करने से महिला आरक्षण 2034 के आम चुनावों तक टल जाएगा, क्योंकि नई जनगणना के नतीजे शायद 2030 तक उपलब्ध हो पाएंगे। 

क्या नरेन्द्र मोदी सरकार 2027 की जनगणना से बचना चाहती है, क्योंकि इसमें जाति-आधारित गिनती शामिल होने की उम्मीद है, और भाजपा चिंतित है कि जाति के आंकड़े प्रतिनिधित्व की मांगों पर न जाने कैसा असर डालें? हालांकि भाजपा समर्थकों में ओबीसी की अच्छी-खासी संख्या है, लेकिन इन जातियों के इस्तेमाल और उन्हें दी गई अहमियत की वजह से सवर्ण जातियों में असंतोष है। अनुसूचित जातियां भी भाजपा से मुंह मोड़ रही हैं। 

खबरों के मुताबिक, शाह इन दो बिलों को मौजूदा संसदीय सत्र में ही पास करवाना चाहते थे। लेकिन विपक्ष के दबाव में इन्हें संभवतः मानसून सत्र तक टाल दिया। विपक्षी पार्टियों ने राज्य चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि वे प्रस्तावों का अध्ययन कर सकें। 

महिलाओं के लिए सीटें आवंटित करने के तरीके पर भी सवाल है। सीटों की संख्या तय करने का अधिकार केवल परिसीमन आयोग को है। आरक्षण को विस्तार से जोड़ने की कोशिश न केवल अनावश्यक है, बल्कि यह धोखेबाजी भी है। शाह के लिए अहम सवाल: महिला आरक्षण अतिरिक्त सीटें के जरिये ही क्यों? क्या इसलिए कि बिल के पक्ष में वोट देने वाले पुरुष सांसदों को भरोसा दिलाया गया था कि उनकी सीटें महिलाओं को आवंटित नहीं की जाएंगी? पुरुष सांसदों को इतना पक्का यकीन कैसे था कि वे दोबारा चुन लिए जाएंगे?

खैर, अब समय आ गया है कि विपक्षी पार्टियां पूरी गंभीरता से महिला उम्मीदवारों की पहचान करना और उन्हें आगे बढ़ाना शुरू करें। भाजपा ने कुछ साल पहले यह शुरू कर दिया था, हालांकि उनकी कोई भी महिला विधायक महिला अधिकारों पर मुखर नहीं रही है; इसके बजाय, वे प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन की बात को ही जोर-शोर से दोहराने तक सीमित रही हैं। विपक्षी पार्टियों में, तृणमूल कांग्रेस सबसे अलग नजर आती है, क्योंकि इसमें महिलाओं का अनुपात सबसे ज्यादा है; ये महिलाएं अपना होमवर्क करके आती हैं और मुद्दों पर डटकर बात करती हैं। जैसा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर हुई बहस से जाहिर हुआ, विपक्ष के पास भी अपनी बात अच्छे से रखने वाली महिलाएं मौजूद हैं। 

 (राधा कुमार इतिहासकार और नीति विश्लेषक हैं)

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