वामपंथी नहीं, दक्षिणपंथी होते हैं बेहद हिंसक, पूरी दुनिया में फैला रहे हैं हिंसा
भारत में राजनैतिक हिंसा का आलम यह है कि सत्ता और मीडिया संयुक्त तौर पर जिनके खिलाफ जिहाद में लिप्त हैं, पुलिस और न्यायालय उन्हें ही जिहादी साबित कर रही हैं। सनातनी विडंबना यह है कि एक अदद सा बुलडोजर सनातनी न्याय का प्रतीक बन गया है।

इस दौर में दुनिया भर में चरम दक्षिणपंथी सत्ता का बोलबाला है और दक्षिणपंथी हमेशा से ही अपने आप को सबसे बड़े विकासोन्मुखी, शांतिप्रेमी, राष्ट्रवादी और देशभक्त बताते रहे हैं। इनकी नजर में समाज के हरेक समस्या की जड़ में वामपंथी विचारधारा है, जिसे जनता को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए। दक्षिणपंथी वामपंथ को हमेशा से हिंसक ठहराते हैं। हमारे देश में भी बीजेपी सरकार हमेशा वामपंथ को इस तरह बताती है मानो यह विचारधारा हिंसा का पर्याय हो। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनके तमाम सलाहकार भी सामाजिक अस्थिरता के लिए खुले आम वामपंथियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। 10 सितंबर 2025 को ट्रम्प के नजदीकी, चार्ली किर्क, की हत्या के बाद तो बिना सबूत के ही ट्रम्प ने इसे वामपंथियों की करामात बताया और वामपंथी संगठनों का अमेरिका से सफाया करने की धमकी दे डाली।
पर, राजनैतिक हिंसा का बारीकी से विश्लेषण करने पर तथ्य ठीक विपरीत नजर आते हैं। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ डेटन के समाजविज्ञानी आर्ट जीपसोन और पॉल बेकर ने लंबे समय तक राजनैतिक हिंसाओं का बारीकी से विश्लेषण किया है और हाल में ही इसी विषय पर एक विस्तृत लेख लिखा है। इसके अनुसार यह धारणा बिल्कुल गलत है कि वामपंथी अधिक हिंसा करते हैं। अमेरिका समेत दूसरे अनेक देशों में सबसे अधिक हिंसा कट्टर दक्षिणपंथी करते हैं और इन हिंसाओं में सबसे अधिक लोग मारे जाते हैं। दक्षिणपंथियों ने राजनैतिक हिंसा को मुख्यधारा तक पहुंचा दिया है। दुनिया भर में राजनैतिक हिंसा की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं, फिर भी सभी प्रकार की हिंसाओं की तुलना में राजनैतिक हिंसा की वारदातें अभी भी अपेक्षाकृत कम हैं।
इनकी संख्या कम होने के बाद भी मीडिया और राजनैतिक गलियारों में इनकी खूब चर्चा की जाती है और आरोप-प्रत्यारोप का उग्र दौर लंबा चलता है, जिसे मीडिया लगातार प्रमुखता से दिखाता है। इसलिए सामान्य हिंसा की अपेक्षा राजनैतिक हिंसा लंबे समय तक लोगों को याद रहती है। पहले हिंसा में उग्रवादी संगठन, अराजक तत्व या फिर चरमपंथी संलिप्त रहते थे, पर अब यह प्रवृत्ति मेनस्ट्रीम राजनैतिक दलों में प्रवेश कर चुकी है। इसके बाद से राजनैतिक हिंसा समाज का एक “न्यू नॉर्मल” बन गया है और अपने राजनैतिक अस्तित्व को बचाने और राजनैतिक रसूख को बढ़ाने के लिए राजनैतिक दलों द्वारा की जाने वाली हिंसा को समाज की स्वीकारोक्ति मिल गई है।
हमारे देश में जहां कहीं भी चुनाव होते है, राजनैतिक हिंसा का बोलबाला रहता है। लोग मारे जाते हैं और राजनैतिक दल आरोप-प्रत्यारोप में लिप्त रहते हैं। मीडिया ऐसी हिंसा में लगातार बीजेपी का नरेटिव प्रचारित करता है, और मीडिया ट्रायल में लिप्त रहता है। एक हत्या का सिलसिला मीडिया में तब तक चलता है, जब तक ऐसी दूसरी हत्या नहीं हो जाती। इतने हंगामे के बाद भी ऐसी हिंसा या हत्या के बारे में किसी को कोई सजा होती हो, यह जनता को कभी पता नहीं चलता। अब तो जनता राजनैतिक हिंसा को चुनावों का एक अभिन्न अंग समझने लगी है।
अधिकतर देशों में राजनैतिक हिंसा के लिए कोई अलग कानून नहीं है और ना ही अलग से कोई परिभाषा है। ऐसी हत्याओं से समाज में भय का वातावरण व्याप्त हो जाता है, कुछ राजनैतिक दलों का रसूख बढ़ जाता है तो दूसरे दलों की लोकप्रियता में कमी होती है, राजनैतिक दलों की नीतियां प्रभावित होती हैं, सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ जाता है और प्रजातन्त्र खतरे में पड़ जाता है। फिर भी राजनैतिक हिंसा की कोई अलग परिभाषा नहीं है, और जहां इसके लिए अलग कानून हैं भी वहां केवल हत्या को हिंसा माना जाता है, हिंसक भाषण/वक्तव्य या धमकी इस दायरे में नहीं आते।
अमेरिका में पिछले चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर चुनाव कराने वाले कर्मचारियों को धमकाया गया था, कुछ की हत्या भी की गई थी, अनेक उम्मीदवारों को सोशल मीडिया पर हत्या की धमकी मिली थी, महिला उम्मीदवारों को बलात्कार की धमकी भी दी गई थी या अन्य हिंसक तरीकों का इस्तेमाल किया गया था। चुनावों के बाद भी, भारत और अमेरिका दोनों देशों में विपक्षी उम्मीदवारों को धमकी देना, चरित्र हनन और उनके बारे में झूठा प्रचार बहुत सामान्य हो गया है।
इस लेख के अनुसार अमेरिका समेत दुनिया के बड़े देशों में वर्ष 2001 से 2025 के बीच जितनी भी राजनैतिक हिंसा की वारदातें हुईं उनमें से 75 से 80 प्रतिशत वारदातें दक्षिणपंथी विचारधारा वाले राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों द्वारा की गईं। वामपंथी विचारधारा वाले राजनैतिक दलों और समर्थकों द्वारा महज 10 से 15 प्रतिशत हिंसा की गई, और ऐसी हिंसा में मरने वालों की संख्या सभी राजनैतिक हिंसा में मरने वालों की संख्या का 5 प्रतिशत से भी कम था। वामपंथियों द्वारा हिंसा की अधिकतर घटनाओं का कारण राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण जैसे दूसरे सामाजिक मुद्दे थे। दूसरी तरफ दक्षिणपंथियों द्वारा भड़काई जाने वाली अधिकतर हिंसा उनके राजनैतिक महत्वाकांक्षा का हिस्सा थीं।
हमारे देश में तो बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से राजनैतिक हिंसा समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है। यहां तो प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, तमाम दूसरे मंत्री, असम और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, तमाम कथित सनातनी संरक्षक और मेनस्ट्रीम मीडिया– सभी अपने वक्तव्यों से हिंसा को हवा देते हैं। यही वक्तव्य सोशल मीडिया पर प्रचारित होते हैं और उनके समर्थक और संघ से जुड़े तमाम संगठन इन वक्तव्यों को सड़क पर हिंसा कर जमीनी अंजाम देते हैं। पुलिस, प्रशासन, कानून– सभी मूकदर्शक बनकर हिंसा में भागीदारी निभाते हैं।
जर्नल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार अतिवाद (radicalism), चरमपंथ (extremism) और रूढ़िवाद (fundamentalism)– ये सभी अलग शब्द हैं पर इनमें एक बुनियादी समानता है– ये सभी कम पढ़े और बेरोजगार युवाओं और समाज के हाशिये पर पड़ी आबादी को सबसे तेजी से आकर्षित करते हैं। इनसे प्रभावित होने वालों में आर्थिक असमानता की शिकार आबादी भी प्रमुख है। इस सिद्धांत को समझना आसान है क्योंकि ऐसी आबादी हमारे देश में बहुत है और राजनैतिक हिंसा के रोज नए आयाम गढ़े जा रहे हैं।
प्रेस इनफॉर्मेशन ब्युरो की 1 जनवरी 2025 की विज्ञप्ति के अनुसार, देश की कुल आबादी में से 65 प्रतिशत की आयु 35 वर्ष से कम है। दूसरी तरफ इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार देश के 9.7 प्रतिशत युवा और 18.7 प्रतिशत युवतियां बेरोजगार हैं। इसके अनुसार देश में सबको रोजगार देने के लिए हरेक वर्ष कम से कम 80 लाख नए युवाओं को रोजगार की जरूरत होगी। विडंबना यह है कि देश में रोजगार का अकाल है और जो रोजगार में हैं भी उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार काम और वेतन नहीं मिलता। इसलिए स्पष्ट है कि राजनैतिक हिंसा के मामले में भारत एक खुला मैदान है, जिसमें एक बड़ी सेना खड़ी है।
राजनैतिक हिंसा का आलम यह है कि सत्ता और मीडिया संयुक्त तौर पर जिनके खिलाफ जिहाद में लिप्त हैं, पुलिस और न्यायालय उन्हें ही जिहादी साबित कर रही हैं। सनातनी विडंबना यह है कि एक अदद सा बुलडोजर सनातनी न्याय का प्रतीक बन गया है।
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