विष्णु नागर का व्यंग्यः यूं ही नहीं जबर्दस्ती माफ करने पर आमादा हैं सरकार, डर है जेन-जी कहीं झोला न पकड़ा दे!

इसे कहते हैं मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ना। मारने वालों को बचाते हुए मार खाने वालों को, पिटने वालों को, जिनकी आंखें पैलेट गन के छर्रे घुसने से बर्बाद हो गई हैं, उनके मन में अपराध भावना भरना, क्षमा मांगने की बजाय, हमलावर हो जाना।

यूं ही नहीं जबर्दस्ती माफ करने पर आमादा हैं सरकार, डर है जेन-जी कहीं झोला न पकड़ा दे!
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जेन जी, देखी तुमने इस बूढ़े की चालाकी, इसकी शैतानी, इसका खेला! कितनी चालाकी से वह प्रेम जताते हुए तुम्हें कटघरे में खड़ा कर रहा है। इसे और इसके गृहमंत्री को जब आगे बढ़कर तुमसे, तुम्हारे माता-पिताओं से बल्कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को इनकी पुलिस और इनकी आरएएफ ने जो-जो ज़ुल्म ढहाये थे, उनके लिए पूरे देश से माफी मांगना चाहिए था, तब यह तुम्हें माफ करने की इच्छा प्रकट कर रहा है।

ध्यान दो, माफ नहीं कर रहा है, केवल इसका इरादा जता रहा है। अपने अपराध का बोझ तुम्हारी पीठ पर डाल रहा है और खुद फालतू में महान बनने की कोशिश कर रहा है कि जाओ गुमराह बच्चों, बचपन में सबसे गलतियां हो जाती हैं, मैं तुम्हारे अपराध को इस बार के लिए माफ करने की इच्छा रखता हूं। तुम मेरी इच्छा का सम्मान करोगे तो बेहतर है वरना तो मेरे पास दूसरे साधन भी हैं। दुशाले में लपेटकर धमकी दी जा रही है। समर्पण करने को कहा जा रहा है।

वह कह रहे हैं कि कोई बात नहीं तुमने मुझे भद्दी-भद्दी गालियां दी हैं, यहां तक कि मेरी स्वर्गीय मां को भी गालियां दी हैं (क्या वाकई?), मैं चाहता तो तुम्हें सज़ा दिलवा सकता था, अदालतों के चक्कर पर चक्कर कटवा सकता था, तुम्हारी जवानी को नरक बना सकता था, तुम्हें बाकायदा अपराधी घोषित करवाकर आगे नौकरी या व्यवसाय करने के लिए तुम्हारा रास्ता बंद करवा सकता था, समाज में तुम्हें बदनाम करवा सकता था, प्रताड़ित करवा सकता था। मैं यह सब कर सकता था मगर मेरा दिल बड़ा है, इसलिए मैंने यह नहीं करना चाहता हूं।

बगैर कहे, यह भी कहा जा रहा है कि जिस शख्स ने शरणागत हुए बगैर अपने किसी विरोधी को आज तक कभी माफ नहीं किया, वह जीवन में पहली बार तुम्हें माफ कर रहा है क्योंकि तुम गुमराह बच्चे हो! जिसने बिहार चुनाव के दौरान अपनी मां को कुछ नौजवानों द्वारा गाली दिये जाने पर कांग्रेस के खिलाफ तूफान मचा दिया था, वह तुम्हें माफ कर रहा है। जिसके नेतृत्व में गुजरात में 2002 में नरसंहार हुआ था, जिसके लिए उसने कभी माफी नहीं मांगी, जिसने 1100 से अधिक लोगों की हत्या पर कुल‌ इतना कहा था कि कार के नीचे आकर कुत्ता भी मर जाता है, तो दुख होता है, वह तुम्हें माफ करना चाहता है।


तुम मेरे आगे नाक रगड़ने नहीं आए कि हुजूर हमसे गलती हो गई, उत्तेजना में हम कुछ का कुछ बोल गए, फिर भी मैं तुम्हें माफ करना चाहता हूं। चाहो तो मेरी उदारता का, मेरे बड़प्पन का लाभ उठाओ और फिर से जंतर-मंतर मत आओ! मेरे खिलाफ सिर मत उठाओ! उठाया तो माफ करने की इच्छा को स्थगित कर सकता हूं।

इसे कहते हैं फ्रेंड्स, साइकोलॉजिकल वारफेयर करना, मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ना। मारने वालों को बचाते हुए मार खाने वालों को, पिटने वालों को, जिनकी आंखें पैलेट गन के छर्रे घुसने से बर्बाद हो गई हैं, उनके मन में अपराध भावना भरना क्योंकि उनका अपराध यह था कि इनमें से कुछ ने प्रधानमंत्री के विरुद्ध कुछ अपशब्द कहे थे! अपना अपराध स्वीकार करने की बजाय पीड़ितों को अपराधी साबित करके अपने अपराधों पर पर्दा डालना, क्षमा मांगने की बजाय, हमलावर हो जाना। जिनका भविष्य बर्बाद किया, जिनको प्रताड़ित किया, उन पर खोखली दया दिखाना! इसीलिए तुलसीदास कह गए हैं कि खल की प्रीति थिर नहीं होती।

जेन जी ने कभी नहीं कहा कि बाबा, हम लड़के-लड़कियों ने जंतर-मंतर पर तुम्हें खूब गालियां दी हैं, खूब भला-बुरा कहा है, हमसे गलती हो गई है, उत्तेजना में हम कुछ का कुछ बोल गए हैं, हमारे प्यारे-प्यारे बाबा हमें इसके लिए माफ कर दो मगर ये जबर्दस्ती माफ करने पर आमादा हो रहे हैं।

सच तो ये है कि इन्हें जेन जी से डर लग रहा है, इनकी रूह अभी भी कांप रही है कि कहीं यह फिर से उठकर खड़ी न हो जाए, हमलावर न हो जाए, मुझ फकीर को कहीं झोला न पकड़ा दे कि बहुत हुआ बाबा अब जाओ। नहीं पधारोगे तो हम तुम्हें पठा देंगे, इसलिए ये पिछले नौ दिनों में पांचवीं बार देर रात विडियो चेंप रहे हैं। जेन जी से संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं, उसे गले लगाने की बात कह रहे हैं।

मगर जेन जी इनका नोटिस तक नहीं ले रही है। इनकी बातों की तरफ कान नहीं दे रही है। हेलो तक नहीं कह रही है, जबकि ये हाय कहने के लिए उतावले हुए जा रहे हैं। परेशान हैं बेचारे। कुल तीन ही घंटे तो सोते हैं, बीच-बीच में दिन में झपकी लेते रहते हैं, नींद और झपकी दोनों हवा है। बिस्तर से उठ-उठकर विडियो अपलोड कर रहे हैं।


पहली बार इनसे भूल हो गई थी, कुछ ज्यादा ही घबराए हुए थे तो बिना मेकअप के जेन जी को खुश करने के लिए विडियो लेकर आ गए थे। उस दिन इनके चेहरे की झुर्रियां इनसे ज्यादा बोल रही थीं। अब दूल्हे की तरह खूब बन-ठन कर आते हैं। गहरा मेकअप करवाते हैं, बुढ़ापे पर जितना पर्दा डलवा सकते हैं, डलवाते हैं। कैमरे का एंगल ऐसा रखवाते हैं कि इनकी झुर्रियां एक भी नजर न आएं और चेहरा गुलाबी-गुलाबी नजर आए। जेन जी यह कलाकारी खूब समझती है।वह बच्ची नहीं है। जेन जी इनकी इन अदाओं का, इनके शब्दों का नोटिस तक नहीं ले रही है।

बूढ़े हैं तो प्रकट है कि अपने को बहुत चतुर सुजान भी मानते हैं, इन्हें लगता है कि प्यार से जेन जी की पीठ दो-चार बार सहला देंगे तो इनका उल्लू सध जाएगा, इनकी गद्दी बच जाएगी। बुढ़ऊ समझ गये हैं कि जंतर-मंतर पर आंदोलन खत्म होने से भी खत्म नहीं हुआ है, फिर भड़क सकता है वरना ये एक मिनट भी इन पर खर्च करने वाले नहीं थे।

इनकी आत्ममुग्धता गई नहीं है। सब जगह इन्हें मैं ही मैं दिखता है। कोई और होता तो जेन जी के असली मुद्दों पर बात करता, ये हमेशा की तरह गाली देने पर छाती पीट रहे हैं। इन्हें शायद पता नहीं जेन जी इस कार्यक्रम से प्रभावित नहीं होती। इंस्टाग्राम पर चेहरा बार-बार दिखाने से किसी बूढ़े को जेन जी नहीं मानती! 

और कल कहीं यह पढ़ा कि अब जेन अल्फा भी सड़क पर उतर आई है। लगता है मोदी जी और शाह साहब के 'अच्छे दिन'आ गए हैं, जिनका बरसों से इंतज़ार था!

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