‘इंडियाज डिवाइडर इन चीफ’ लेख के एक साल में हुआ साबित, मोदी ने देश को बुरी तरह बांट डाला

आप देशभक्त हैं या देशविरोधी, पाकिस्तान-परस्त हैं या भारत-परस्त, हिंदू-विरोधी हैं या मुस्लिम-विरोधी, नक्सलवादी हैं या खान मार्केट या टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य, यह इस बात पर निर्भर करने लगा है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों के प्रति आपकी धारणा क्या है।

फोटोः सोशल मीडिया
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अरुण शर्मा

एक साल से ज्यादा समय बीत चुका है। ठीक-ठीक कहें तो 20 मई, 2019 के अंक में टाइम पत्रिका ने एक वैचारिक लेख प्रकाशित किया था- इंडियाज डिवाइडर इन चीफ। इसे लिखा था ब्रिटेन में जन्मे अमेरिकी उपन्यासकार आतिश तासिर ने जो भारत-पाकिस्तान मूल के हैं। भारतीय राजनीति में विशेष तौर पर नरेंद्र मोदी के आने के बाद से दक्षिणपंथी विचारधारा के लोकप्रिय होने का यह एक बौद्धिक विश्लेषण था। मैंने दो बार लेख को पढ़ा और इसकी ज्यादातर बातों से सहमत हूं।

तासिर शब्दों के धनी हैं और उन्होंने अपनी बातें इतनी स्पष्टता के साथ रखीं कि टाइम पत्रिका में उनके मुख्य आलेख के प्रकाशित होने के चंद महीने के भीतर (नवंबर, 2019 में) ही नरेंद्र मोदी सरकार ने बदले की कारवाई के तहत उनका ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) का दर्जा छीन लिया। गृह मंत्रालय ने दावा किया कि ओसीआई के लिए आवेदन करते समय तासिर ने यह बात छिपाई थी कि उनके पिता पाकिस्तान मूल के थे।

सरकार ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि यह बात जाहिर न करने के पीछे क्या उनकी कोई दुर्भावना थी, जबकि दोष ठहराने के संदर्भ में यह देखना जरूरी होता है। सरकार पर इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि तासिर ने वर्ष, 2007 में ‘स्ट्रेंजर ऑफ हिस्ट्री’ नाम से जो जीवनी नुमा उपन्यास लिखा था, उसमें उन्होंने खुलकर कहा था कि उनके पिता पाकिस्तानी थे।

टाइम में तासिर के लेख को छपे एक साल से ज्यादा समय हो चुका है और उनके लेख का यह मूल भाव कि मोदी ने देश को बांट दिया, आज पूरी तरह सच साबित हो चुका है। भारत का आज जिस हद तक ध्रुवीकरण हो चुका है और इसका सामाजिक ताना-बाना जिस तरह प्रभावित हो चुका है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। तथाकथित हिंदू-मुस्लिम के आधार पर धर्म मुख्य विभाजक रेखा बन गया है और इसके अलावा भी छोटी-छोटी पहचान के आधार पर भी विभाजन ने जड़ें जमा ली हैं।

इस कलह की जड़ में हैं नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियां। आप देशभक्त हैं या देशविरोधी, पाकिस्तान-परस्त हैं या भारत-परस्त, हिंदू-विरोधी हैं या मुस्लिम-विरोधी, नक्सलवादी हैं या खान मार्केट या टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य...वगैरह- वगैरह, यह सब इस बात पर निर्भर करने लगा है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों के प्रति आपकी धारणा क्या है।

पारंपरिक रूप से भारतीय फिल्म उद्योग सांप्रदायिक सौहार्द्र का प्रतीक रहा है, लेकिन आज वह भी बंट गया है। आज बॉलीवुड में दो तरह के लोग हैं- एक जो मौका मिलते ही मोदी की चाटुकारिता में जुट जाते हैं और दूसरे वे जिन्हें राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाता है। साल 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से यह सब शुरू हुआ।

नवंबर, 2015 में रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में आमिर खान ने कहा कि भारत में मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के कारण वह खासे चिंतित हैं और उनकी पत्नी किरण को अपने बच्चों के भविष्य को लेकर डर लगता है और उसके मन में ऐसे भी विचार आने लगे हैं कि क्या हमें किसी और देश में चला जाना चाहिए।

इसके तुरंत बाद उनके साथी कलाकार आमिर पर पिल पड़े। अभिनेता और बीजेपी सांसद परेश रावल ने ट्वीट कियाः “असहिष्णुता! पीके में हिंदू आस्था की बखिया उधेड़ी गई, लेकिन आमिर को हिंदू यानी बहुसंख्यकों के गुस्से का तो सामना नहीं ही करना पड़ता है, बल्कि फिल्म सुपरहिट होती है और करोड़ों की कमाई करती है।” फिल्म निर्माता अशोक पंडित कहते हैं: “अब आमिर खान को भी लगने लगा कि हमारा देश असहिष्णु हो गया है। तो फिर हमें एकबारगी यह साबित कर ही देना चाहिए कि हम वाकई असिहष्णु हो गए हैं।”

उसके बाद जब एक इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह ने मोदी सरकार के दौरान आजादी पर हो रहे हमले की आलोचना की तो अनुपम खेर तत्काल सरकार के पक्ष में खड़े हो गए और उन्होंने कहाः “आपको इस देश में सेना को गाली देने की आजादी है; और कितनी आजादी चाहिए?”

यहां तक कि मोदी सरकार में अब विश्वविद्यालयों को भी वामपंथी और दक्षिणपंथी करार दिया जा रहा है, उन्हें भी हिंदू -मुस्लिम के खांचे में डाल दिया जा रहा है। जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया को ‘उनका’ साबित कर दिया गया है। संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान इन विश्वविद्यालयों के छात्रों पर पुलिस ने जो अभूतपूर्व बर्बरता की, उसे इसी नजिरये से देखा जाना चाहिए। आजाद भारत में कभी भी छात्रों के साथ इतनी क्रूरता नहीं की गई।

दुनिया के सौ श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में शुमार और हमारा गर्व जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी पर वामपंथी, हिंदू-विरोधी और देशविरोधी एजेंडा चलाने का आरोप चस्पा कर दिया गया। मैंने किसी को यह कहते सुना कि जेएनयू में हिस्ट्री और कल्चर के सिलेबस को तैयार ही ऐसे किया गया है कि हिंदू-विरोध को बढ़ावा दिया जा सके और हमारी संस्कृति की विश्वसनीयता को खत्म किया जा सके।

हमें पता है कि इन आरोपों में कोई दम नहीं, लेकिन आम लोग ऐसी बातों पर भरोसा कर लेते हैं। दुराव फैलाने वाले ऐसे नफरती बहाव में बच्चे भी बह जा रहे हैं। कुछ ही माह पहले कर्नाटक में आरएसएस के एक अधिकारी के निजी स्कूल में एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद को गिराए जाने का मंचन किया गया और इस मौके पर केंद्रीय मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा और पुड्डुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर किरण बेदी भी मौजूद थीं।

विभाजनकारी विचारों के फैलने का असर यह हुआ है कि दोस्तों के बीच, सहकर्मियों के बीच और यहां तक कि परिवार के लोगों तक के संबंधों में दरार आ गए हैं। मेरी पहचान के कुछ मुस्लिमों ने इस बात पर अफसोस जताया कि उनके सहकर्मी और कभी दोस्त रहे लोग अब सार्वजनिक चर्चा या फिर वाट्सएप्प ग्रुप में मुस्लिम-विरोधी बातें कहने लगे हैं।

मेरा छोटा वाला बेटा इस बात पर नाराजगी जताता है कि अब ड्राइंग रूप में होने वाली बातचीत में राजनीति और धर्म हावी रहने लगे हैं और अब कोई भी पहले की तरह फुटबॉल या संगीत पर बात नहीं करता। मोदी-केंद्रित बातचीत का असर यह है कि कहीं-न-कहीं से बातचीत अनुच्छेद 370, तीन तलाक और संशोधित नागरिकता कानून पर चली आती है और इसके कारण कई बार हमारे भी रिश्ते टूटने के कगार पर पहुंच चुके हैं।

यहां तक कि शायरी जो मुल्क की सरहदों, धर्मों और विचारधाराओं से परे होती थीं, अब उन्हें भी हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखा जा रहा है। हाल ही में जब पाकिस्तान के महान शायर फैज अहमद फैज की लोकप्रिय शायरी ‘हम देखेंगे’ को संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन में छात्रों ने पढ़ना-सुनाना शुरू किया तो इसे हिंदू-विरोधी करार दे दिया गया।

यह वाकई विडंबना ही है कि आईआईटी कानपुर- जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के छात्र जब जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों के समर्थन में इस शायरी का पाठ करते हैं तो संस्थान इस बात की पड़ताल करने के लिए समिति बना देता है कि क्या यह हिंदू-विरोधी है और क्या इसका पाठ करना सही है!

जैसे इतना ही काफी नहीं था। कोरोना वायरस के मामलों में इजाफे के लिए तब्लीगी जमात को दोषी ठहरा दिया गया। तमाम फर्जी वीडियो के जरिये मुस्लिमों को जानते-बूझते वायरस फैलाते दिखाया गया। ऐसी खबर आई कि गुजरात के एक अस्पताल में हिंदू और मुस्लिम कोरोना रोगियों के लिए अलग-अलग वार्ड बना दिए गए। कुछ मतांध टीवी चैनलों को तो शर्म आनी चाहिए कि उन्होंने ‘कोरोना जेहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जैसे मुसलमानों ने ही कोरोना वायरस फैलाया।

आतिश तासिर के मुताबिक, और मैं भी इससे सहमत हूं, मोदी ने भारत में धार्मिक राष्ट्रवाद का जहर घोल दिया है। वह कहते हैं: मुसलमानों को एक के बाद एक हिंसक घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी घटनाओं की एक पूरी श्रृंखला है जब सरकार के परोक्ष समर्थन से हिंदुओं की भीड़ ने गाय माता के नाम पर मुसलमानों को सरेआम पीट-पीटकर मार डाला। तासिर कहते हैं कि दंगों और मॉब लिंचिंग के बाद चुप्पी साधकर मोदी ने साबित किया है कि वह ऐसे ही लोगों के दोस्त हैं।

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