सबकुछ रातों-रात नहीं बदला! भारत-फ्रांस मित्रता को अगले स्तर पर ले जाने में मोदी नहीं बल्कि इन सरकारों की थी अहम भूमिका

फ्रांस और अमेरिका के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा को सरसरी तौर पर देखने से लगता है कि सब चकाचक चल रहा है। लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं।

पेरिस में वार्षिक बैस्टिल दिवस सैन्य परेड के दौरान 2009 में तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति सरकोजी और भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह
पेरिस में वार्षिक बैस्टिल दिवस सैन्य परेड के दौरान 2009 में तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति सरकोजी और भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह
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आशीस रे

फ्रांस और अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों में आसमान जमीन का फर्क आया है। यह वही फ्रांस है जो एक समय पाकिस्तान में परमाणु संयंत्र लगाने को तैयार बैठा था और यही अमेरिका है जिसने 1971 में भारत के खिलाफ अपने सातवें नौसैनिक बेड़े को रवाना कर दिया था। लेकिन तब से भारत और इसकी कूटनीति ने एक लंबी दूरी तय की और आज ये दो देश भारत के बेहद करीब हैं, फ्रांस तो खास तौर पर। यह रातों-रात नहीं हुआ।

इन देशों से भारत के रिश्तों को आज के दौर में पहुंचाने में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों की अहम भूमिका रही। हालांकि वाजपेयी के समय परमाणु परीक्षण की वजह से भारत के रिश्ते, खास तौर पर इन दो देशों से, दोबारा पहले विश्व युद्ध के दौर में पहुंच गए थे। इसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन का गुस्सा ठंडा होने में वक्त लगा। लेकिन जहां तक फ्रांस की बात है, वाजपेयी के प्रधान सचिव बृजेश मिश्रा की कूटनीतिक सूझ-बूझ और विदेश सचिव के. रघुनाथ और पेरिस में भारतीय राजदूत कंवल सिब्बल की कोशिशों से 1998 में ही भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को अंतिम रूप दिया जा सका। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी जब एलिसी पैलेस में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के साथ रिश्तों की सिल्वर जुबली पर जश्न मना रहे थे, उन्हें भारत के इन पूर्व प्रधानमंत्रियों के प्रति शुक्रगुजार होना चाहिए था।

आज फ्रांस के भारत से ऐसे रिश्ते हैं कि कोई भी देश इस स्थिति में पहुंचना चाहे, यहां तक कि ब्रिटेन, अमेरिका और संभवत: रूस भी। भारत आज संयुक्त राष्ट्र में टेढ़े से टेढ़े मामलों में फ्रांस पर भरोसा कर सकता है। खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान के मामले में भारत और फ्रांस के रिश्ते अलग ही स्तर के हैं और चीन से पेश चुनौतियों के मद्देनजर हिन्द सहासागर में पेट्रोलिंग के मामले में दोनों देशों में सहयोग भी किसी से कम नहीं। आर्थिक दृष्टि से फ्रांस को इस गठजोड़ से काफी फायदा हुआ है। एयरबस का भारतीय आसमान पर प्रभुत्व बढ़ रहा है। इंडिगो और एयर इंडिया से एयरबस को मोटा ठेका मिला है।

सोशल मीडिया पर बीजेपी जो प्रचार कर रही है, उसके मुताबिक मोदी से पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री को बैस्टिल डे परेड में आमंत्रित नहीं किया गया। लेकिन ऐसा नहीं। डॉ. मनमोहन सिंह को 2009 में यह सम्मान दिया गया था और भारतीय सशस्त्र बलों की टुकड़ियों ने भी मार्च किया था। बहरहाल, वापस मोदी की फ्रांस यात्रा की बात। इतने मजबूत परस्पर रिश्तों में भी कुछ बातें खटकने वाली रहीं जिनपर गौर करना जरूरी है।


फ्रांसीसी बुद्धिजीवी, नेता, मानवाधिकार संगठन और ला मोंड जैसे अग्रणी अखबार ने मैक्रॉन द्वारा एक ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित करने की आलोचना की जो भारत में लोकतंत्र और स्वतंत्रता को खत्म कर रहा है। अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी और पूर्व राजनयिक फ्रेंकोइस जिमेरे ने अपने लेख में मैक्रॉन से आग्रह किया कि वह भारत में सिविल सोसाइटी के दमन को रोकने, मीडिया की स्वतंत्रता और धार्मिक आजादी की रक्षा में भूमिका निभाएं।

फ्रांस की असेंबली में सांसदों के दूसरे सबसे बड़े समूह के वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलेनचोन ने ट्वीट किया: ‘उनका (मोदी का) स्वागत नहीं है क्योंकि यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का उत्सव है जिसे वह नापसंद करते हैं।’ अधिकार समूह एलडीएच ने ट्वीट किया: वह ‘इस निमंत्रण की निंदा करते हैं। यह विनाशकारी संकेत देता है।’ ला मोंड के एक लेख का शीर्षक था: ‘नरेन्द्र मोदी ने दशकों तक राज्य प्रायोजित हिंसा को बढ़ावा दिया।' अखबार ने सवाल किया, ‘क्या हम नजरअंदाज कर सकते हैं कि मोदी के नेतृत्व में भारत गंभीर संकट से गुजर रहा है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संगठनों और पत्रकारों पर हमले बढ़ रहे हैं?’

फ्रांस के सरकारी टीवी समाचार चैनल ‘फ्रांस 24 टीवी’ ने कहा: ‘बास्टिल दिवस पर मैक्रॉन द्वारा मोदी की मेजबानी के दौरान हथियारों की परेड हुई, लोकतांत्रिक मूल्यों की नहीं।’भारत और फ्रांस के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता रणनीतिक हो सकता है लेकिन यह लेन-देन संबंधी भी है और यह फ्रांस के पक्ष में खासा झुका हुआ है। तमाम यूरोपीय देशों में भ्रष्टाचार विरोधी कड़े कानून हैं। लेकिन फ्रांसीसी सरकारों पर अक्सर राष्ट्रीय हित में इनकी ओर से आंखें मूंदने का आरोप लगता रहा है।

एक फ्रांसीसी अभियोजक ने भारत को राफेल की आपूर्ति का ठेका लेने में राज्य के स्वामित्व वाली डसॉल्ट की कथित अनियमितताओं की जांच की स्थानीय एनजीओ एसो शेरपा की शिकायत स्वीकार की। कंपनी पर चार आरोप थे: 1. सौदा पाने के लिए बिचौलिए को पैसे दिए, 2. भारतीय रक्षा मंत्रालय की वार्ता टीम की गुप्त गणनाओं का पता लगाने के लिए गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल, 3. कीमत में मुनाफाखोरी 4. अनुभवहीन अनिल अंबानी की कंपनी को भारतीय ऑफसेट भागीदार के रूप में चुना।


सबसे पहले, मोदी ने डॉ. सिंह की सरकार के 126 विमानों के समझौते को रद्द किया और केवल 36 लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया। दूसरे, राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के अनुसार, मोदी ने ऑफसेट पार्टनर के रूप में अंबानी पर जोर दिया, अन्यथा सौदा खतरे में पड़ जाता। अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय रक्षा सौदों (राजीव गांधी द्वारा शुरू) में भ्रष्टाचार की रोकथाम के मानक हिस्से को हटाने की फ्रांसीसी मांग को स्वीकार करके, उन्होंने डसॉल्ट द्वारा बिचौलिए के उपयोग की स्थिति में भी कार्रवाई से छूट दे दी। हालांकि फ्रांसीसी सरकार ने राष्ट्रीय हित के बहाने एक बार फिर अभियोजक के नोटिस का जवाब देने से इनकार कर दिया है।

जब मोदी ने मैक्रॉन से भेंट की तो राफेल के 26 नौसैनिक संस्करणों के साथ-साथ नौसेना के लिए तीन और स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों के अरबों डॉलर के ऑर्डर की घोषणा हुई। लेकिन संशोधित संयुक्त वक्तव्य में इन्हें शामिल नहीं किया गया।

अमेरिका ने भी मोदी को वह सब दिया जिसकी उन्हें ख्वाहिश थी- अमेरिका में राजकीय यात्रा, हल्के लड़ाकू विमान तेजस के लिए इंजन, हमलावर ड्रोन। खैर, अमेरिका में भी मोदी के खिलाफ न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में प्रदर्शन हुआ और याद दिलाया गया कि यह वही मोदी हैं जिनके अमेरिका में प्रवेश पर एक दशक तक रोक थी। रॉयटर्स ने दावा किया: ‘बाइडेन प्रशासन पर मोदी की यात्रा के दौरान मानवाधिकार के मुद्दों को उठाने का दबाव था।’ मोदी के वाशिंगटन छोड़ने के कुछ ही दिनों के भीतर अमेरिकी विदेश विभाग की नागरिक सुरक्षा, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की अवर सचिव उजरा जेया, सिविल सोसाइटी लीडर्स की दिल्ली बैठक में थीं और उन्होंने ट्वीट किया कि उनका प्रशासन भारत की स्थिति, खास तौर पर मणिपुर के हालात पर चिंतित है।

लंदन में राजनयिक हलकों में पूछा जा रहा है कि ब्रिटेन ने अमेरिका और फ्रांस जैसी उदारता क्यों नहीं दिखाई? जवाब है: लंदन के एक मजिस्ट्रेट ने न केवल 2002 के गुजरात दंगों के लिए ब्रिटिश जांच के अनुसार ‘सीधे जिम्मेदार’ होने के लिए 2003 में यूनाइटेड किंगडम के दौरे पर मोदी को गिरफ्तार करने का विचार किया था बल्कि अभी तक उन्हें राजकीय यात्रा पर आमंत्रित करना भी महत्वपूर्ण नहीं समझा। इसलिए, सवाल तो यह है कि क्या अमेरिका और फ्रांस ने भारत के खजाने से पैसे निकालने का कोई जादुई तरीका खोज लिया है? उस ‘परित्यक्त’ को पुचकारें, लाड़-प्यार दें, उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के लिए ढेर सारी फोटो खिंचवाने का मौका दें और अरबों डॉलर के रक्षा सौदे हासिल कर लें?

अमेरिका की बात करें तो चीन और रूस के कारक उसे भारत को लुभाने के लिए मजबूर करते हैं। 1990 के दशक में आरएसएस प्रचारक के रूप में अपनी पहली यात्रा में ही मोदी अमेरिका से खासे प्रभावित हुए थे और इस कारण उन्हें इसके लिए ‘समझाने’ की जरूरत नहीं पड़ी।

उन्नत लड़ाकू विमान या इसके इंजन, पनडुब्बियां और ड्रोन शांति बनाए रखने वाले निवारक हथियार होते हैं, न कि युद्ध करने के। अमेरिकियों और फ्रांसीसियों ने शायद इसे नजरअंदाज कर दिया है कि मोदी ने चीन से जोर-आजमाइश में अव्वल दर्जे की कायरता दिखाई है। तीन साल बाद भी उन्होंने अब तक यह स्वीकार नहीं किया है कि चीनी सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा के भारतीय हिस्से में जमे हुए हैं। तो, क्या जैसा अमेरिका समझ रहा है, मोदी वास्तव में शी जिनपिंग के सामने डटकर खड़े हो पाएंगे? अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं है जो ऐसा संकेत देता हो।

जब देश आजाद हुआ था तो भारत के पास अमेरिका को देने के लिए कुछ नहीं था। फिर भी, अमेरिकी राष्ट्रपति उनके स्वागत के लिए हवाईअड्डे पर प्रतीक्षा करते थे। जब 2008 में आर्थिक मंदी आई तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन तक ने 10 डाउनिंग स्ट्रीट में रात्रिभोज में डॉ. सिंह को ध्यान से सुना। मोदी को ऐसा सम्मान कभी नहीं मिला।

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