जामिया: पुलिसिया जुल्म और बर्बरता में भी छात्रों ने संभाल कर रखी है बहुरंगी संस्कृति और आंदोलन की विरासत

यह विडंबना ही है कि जामिया की क्रांतिकारियों की लंबी परंपरा के आज के वाहकों के साथ अमानवीयता और पुलिसिया बदसलूकी हो रही है और यहां तक कि उनकी नागरिकता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद बच्चों ने अपने विरोध में गांधी की विरासत को जिंदा रखा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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तारिक हसन

संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कैंपस के अंदर और बाहर चल रहे इस विरोध प्रदर्शन को किसी कैंपस के भीतर के सामान्य विरोध की तरह नहीं देखा जा सकता। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह के साथ मोदी सरकार के नाजुक रिश्ते के संदर्भ में इसे एक अहम घटना के तौर पर देखा जाना चाहिए। जामिया के इतिहास पर एक सरसरी नजर डालने से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अनूठेअध्याय के पन्ने खुद-ब-खुद खुलने लगते हैं। ये हमें मजबूर करते हैं कि कुछ पल ठहरकर सोचें कि जामिया आंदोलन के चरित्र को सुरक्षित रखने की यह लड़ाई 21वीं सदी के भारत में क्यों प्रासंगिक है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का जन्म अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी परिसर में स्थित जामा मस्जिद में 27 अक्टूबर,1920 को हुआ। 10 अक्टूबर, 1920 से नवंबर, 1920 के पहले सप्ताह के बीच अलीगढ़ शहर में हुई उथल-पुथल भरी घटनाओं को भारतीय राष्ट्रीयता के निर्माण के सर्वाधिक अहम चरणों में से एक माना जा सकता है। भारतीय स्वतंत्रता के इस अध्याय को कमोबेश भुला दिया गया है, लेकिन आज मुड़कर इसके पन्नों को पलटना अहम है ताकि इतिहास के उस अंश को समझते हुए भारत में राष्ट्रीयता की जड़ों की खोज-खबर ली जाए। एएमयू की जामा मस्जिद में अत्यधिक उत्तेजित भीड़ के बीच गांधीजी के संबोधन के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया के गठन की औपचारिक घोषणा के मौके पर मौलाना महमूदुल हसन को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया गया। शेख-उल हिंद के नाम से जाने जाने वाले मौलाना बड़ी मुश्किल से खड़े हो पाए, लेकिन इस मौके पर उन्होंने कुरआन की एक आयत पढ़ी।

अक्टूबर,1920 का पहला हफ्ता भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिहाज से बड़ा ठंडा था। नया-नया शुरू हुआ खिलाफत आंदोलन सिरे नहीं चढ़ पा रहा था। चैन की सांस ले रही ब्रितानी सरकार ने कुछ ही हफ्ते पहले मौलाना मोहम्मद अली समेत स्वतंत्रता आंदोलन के तमाम बड़े नेताओं को जेल से रिहा करने का फैसला लिया था। उधर महात्मा गांधी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्थापक मदन मोहन मालवीय को संस्थान बंद करके सत्याग्रह में शामिल होने के लिए मनाने में विफल हो चुके थे। इसी बीच 2 अक्टूबर को मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज (जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना) के प्रमुख पूर्व छात्रों और आजादी की लड़ाई के चंद बड़े नेताओं की बैठक मुरादाबाद में हुई।

मौलाना मोहम्मद अली की अगुवाई में इस बैठक में एक प्रस्ताव पास किया गया जिसमें मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज (माओ कॉलेज) और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के ट्रस्टियों से अपील की गई कि वे केंद्र सरकार से पैसे लेना बंद कर दें और खुद को सरकार से असंबद्ध घोषित कर दें। मौलाना मोहम्मद अली ने ऐलान किया, “हमें पूर्ण स्वराज चाहिए, बेशक इसके लिए छात्रों का करियर कुर्बान करना पड़े।”

इसके बाद 11 अक्टूबर को गांधीजी और डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, मौलाना अब्दुल बारी फिंरंगीमहली, मौलाना सुलेमान नदवी, मौलाना हुसैन अहमद नदवी, तसद्दुक हुसैन खान शेरवानी, मोहम्मद इस्माइल खान खलीकुज्मां जैसे आजादी के आंदोलन से जुड़े तमाम मुसलमान मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज को बॉयकाट में शामिल करने के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से अलीगढ़ आए। अगले दिन गांधीजी को माओ कॉलेज छात्र संघ को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन चंद घंटों के दौरान ही गांधीजी को जिस तरह का समर्थन मिला, वह अद्भुत था।

माओ कॉलेज में गांधीजी की उपस्थिति ने न केवल वहां के छात्रों में, बल्कि पूरे देश को आंदोलित कर दिया। तब गांधीजी और उनके निकट सहयोगियों ने कुछ दिन अलीगढ़ में ही रुकने का फैसला किया और वे लोग दो हफ्ते से भी ज्यादा समय के लिए अब्दुल माजिद ख्वाजा के घर रुके। नतीजा यह रहा कि माओ कॉलेज का एक-एक छात्र गांधीजी के आह्वान में शामिल हो गया और अक्तूबर के अंत तक माओ कॉलेज के छात्रावास पूरी तरह खाली हो गए। कैंपस के चारों ओर पुलिस ने डेरा डाल रखा था। देखते-देखते पूरे अलीगढ़ और फिर पूरे देश में आजादी का आंदोलन हिलोरें मारने लगा था।

गांधीजी की अगुवाई में अब्दुल माजिद ख्वाजा की पत्नी बेगम खुर्शीद ख्वाजा समेत बड़ी तादाद में मुस्लिम औरतों ने सार्वजनिक तौर पर तमाम विदेशी सामान की होली जलाई और पूर्ण स्वराज शुरू करने का बीड़ा उठाया। अलीगढ़ में मुस्लिम औरतों ने आजादी कोष के लिए अपने सारे जेवरात गांधीजी को सौंप दिए। इस लिहाज से अलीगढ़ ने पूरे देश को रास्ता दिखाया और फिर पूरे देश में औरतें अपने गहने आजादी की लड़ाई के लिए देने लगीं।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने अलीगढ़ में एक साधारण से तंबू से काम करना शुरू किया और हकीम अजमल खान इसके पहले चांसलर और मोहम्मद अली जौहर पहले वाइस चासंलर हुए। अगले पांच साल तक यह संस्थान एक के बाद एक तमाम मुस्किलों से जूझता हुआ किसी तरह चलता रहा। मौलाना मोहम्मद अली असहयोग आंदोलन में इतनी सक्रियता से जुटे थे कि गांधीजी ने उन्हें जामिया के काम से अलग होने का सुझाव दिया और इसके बाद मौलाना ने जामिया की जिम्मेदारी अब्दुल माजिद ख्वाजा को सौंप दी। अगले पांच सालों तक माजिद जामिया का कामकाज संभालते रहे। जब अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया तो उनकी पत्नी बेगम खुर्शीद ख्वाजा ने जामिया की जिम्मेदारी उठाई। बाद में जब संस्थान दिल्ली गया तो डॉ. जाकिर हुसैन, हकीम अजमल खान और डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी इससे जुड़े और कई बार ऐसे मौके आए जब यह संस्थान बंद होने की कगार पर पहुंच गया, लेकिन उन मुश्किल दिनों में इन हस्तियों ने इसे किसी तरह जिंदा रखा।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पीछे रहे प्रमुख विचारक मौलाना महमूदुल हसन काबुल में बनी भारत की पहली निर्वासित सरकार के संरक्षक थे और स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण अध्याय ‘रेशमी रुमाल तहरीक’ के प्रमुख नेता थे। अगर किसी को रेशमी रुमाल तहरीक का वास्तविक हीरो कह सकते हैं तो वह मौलाना महमूदुल हसन ही थे। वह तब देवबंद विचारधारा के प्रमुख थे और अंग्रेज सरकार ने उन्हें उनके विश्वस्त मौलाना हुसैन अहमद मदनी के साथ मई 1916 में सऊदी अरब से गिरफ्तार कर लिया। रुमाल में एक संदेश के साथ पंजाब पुलिस ने एक आंदोलनकारी को पकड़ लिया और रेशमी रुमाल आंदोलन विफल हो गया। यह संदेश मौलाना महमूदुल हसन ने सऊदी अरब से काबुल में निर्वासित भारत सरकार के लिए भेजा था। यह सरकार जर्मनी, तुर्की और अफगानिस्तान की सरकारों की मदद से भारत में सैन्य विद्रोह करने को कोशिश कर रही थी।

एएमयू के जाने-माने पूर्व छात्र राजा महेंद्र प्रताप इस सरकार में राष्ट्रपति, भोपाल के मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री और मौलाना ओबेदुल्लाह सिंधी इसके गृह मंत्री थे। मौलाना हसन और मौलाना मदनी को उनके तमाम साथियों के साथ माल्टा भेज दिया गया, जहां वे युद्धबंदी की तरह दो साल तक रहे। 1918 में जब उन्हें रिहा किया गया, मौलाना महमूदुल हसन का स्वास्थ्य काफी खराब था और जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना पर इसे दुआएं देने के कुछ ही समय बाद उनका इंतकाल हो गया।

इन हालात में 8 जून,1920 को बंबई (अब मुंबई) में क्या हुआ, उस पर गौर करना जरूरी हो जाता है। इस दिन मौलाना महमूदुल हसन के साथ तमाम मुस्लिम माल्टा से भारत पहुंच रहे थे और उनका स्वागत करने के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में हजारों लोग बंबई के बंदरगाह पर जमा हुए थे। गांधीजी अहमदाबाद से इस कार्यक्रम के लिए आए थे। मौलाना के साथ आए सभी लोग देवबंदी विचारधारा से जुड़े थे उनका क्या रुख रहेगा, इसको लेकर तरह-तरह की आशंकाएं थीं। अंग्रेजी हुकूमत का अंदाजा था कि सालों की कैद से मौलाना और उनके साथियों के अक्ल ठिकाने आ गई होगी और भारत लौटने पर वे कांग्रेस के नेताओं से दूरी बना लेंगे। लेकिन बंबई की धरती पर उतरते ही मौलाना ने अपने इरादे जाहिर कर दिए। जैसे ही वह उतरे, गांधीजी ने उन्हें गले लगा लिया और उस दौरान मौलाना ने क्या कहा, इसका ठीक-ठीक रिकॉर्ड तो नहीं है, लेकिन वहां मौजूद कई लोगों के मुताबिक मौलाना ने गांधीजी को कहा, “आप बेफिक्र रहें, पूर्ण स्वराज के आपके अहिंसक संघर्ष में हिंदू और मुसलमान पूरी तरह आपके साथ हैं।”

यह विडंबना ही है कि जामिया के क्रांतिकारियों की उस परंपरा के आज के वाहकों के साथ अमानवीयता और पुलिसिया बदसलूकी हो रही है और यहां तक कि उनकी नागरिकता पर भी सवाल है। इस आवेशित माहौल में जामिया के लोग सोच-समझकर आगे बढ़ें। इस बात से इनकार नहीं कि संशोधित नागरिकता कानून को जिस ताकत से थोपा जा रहा है और फिर एनआरसी लागू करने से भारतीय समाज का ध्रुवीकरण होगा और यह आशंकाएं वाजिब ही हैं कि अगर इन्हें वक्त पर रोका नहीं गया तो इससे अंततः युवा मुसलमानों में कट्टरता बढ़ेगी। जामिया आंदोलन ने जन्म के समय एक सपना देखा था, जिसमें बहुरंगी संस्कृति वाले नए भारत का निर्माण करना था। आज वह सपना स्याह साये में घिरा है, जामिया उसी के लिए लड़ रहा है।

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