मोदी सरकार में पत्रकारिता और पत्रकार दोनों खतरे में, दमन के मामले में पाकिस्तान के बराबर पहुंचा भारत- रिपोर्ट

हम इतिहास के उस दौर में खड़े हैं जहां मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के सन्दर्भ में हम पाकिस्तान को आदर्श मानकर उसकी नक़ल कर रहे हैं और स्वघोषित विश्वगुरु का डंका पीट रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी।

फोटोः रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर
फोटोः रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर
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महेन्द्र पांडे

तथाकथित न्यू इंडिया के सरकारी नगाड़े की थापों के बीच अमृत काल में प्रवेश करते ही एक नई रिपोर्ट देश में निष्पक्ष मीडिया और जुझारू पत्रकारों पर बढ़ते खतरों की ओर इशारा करती है। इस रिपोर्ट को नई दिल्ली स्थित मानवाधिकार संस्था– राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप ने प्रस्तुत किया है और रिपोर्ट का नाम है- इंडिया प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट 2021। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में 6 पत्रकार मारे गए, 108 पत्रकारों पर हमले किये गए और 13 मीडिया संस्थानों या समाचार पत्रों को निशाना बनाया गया। निष्पक्ष पत्रकारों के लिए प्रशासन या पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्यवाही के सन्दर्भ में सबसे खतरनाक जम्मू और कश्मीर क्षेत्र है, जबकि भीड़ द्वारा उत्पीडन के सन्दर्भ में उत्तर-पूर्वी राज्य त्रिपुरा सबसे खतरनाक है।

इस रिपोर्ट से ठीक दो दिन पहले काउंसिल ऑफ पाकिस्तान न्यूज़पेपर्स एडिटर्स की तरफ से पाकिस्तान मीडिया फ्रीडम रिपोर्ट 2021 प्रकाशित की गई थी। इसके अनुसार पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकारी पहरे लागातार बढ़ाते जा रहे हैं और अब वहां स्वतंत्र मीडिया को अस्तित्व बचाना कठिन होता जा रहा है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज के अध्यक्ष शेहबाज़ शरीफ ने इस रिपोर्ट के लिए कहा है कि यह इमरान सरकार के विरुद्ध एक और चार्जशीट है और यह सरकार कितनी फासिस्ट है उसका उदाहरण भी है।

पाकिस्तान में पत्रकारों पर जानलेवा हमले और मुकदमे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पाकिस्तान में पिछले वर्ष 5 पत्रकारों की ह्त्या कर दी गयी, 9 पत्रकारों की स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में कोरोना से मृत्यु हो गई और सरकारी उत्पीड़न से तंग आकर 2 पत्रकारों ने आत्महत्या कर ली। रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों पर लगातार हमले किये जा रहे हैं, पर आज तक एक भी मामले में हमलावरों को कोई सजा नहीं दी गई है। पाकिस्तान में प्रेस की सेंसरशिप चरम पर है और सोशल मीडिया पर 19000 से अधिक लोगों का अकाउंट बंद करा दिया गया है, जिसमें अधिकतर पत्रकार हैं।

राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप के निदेशक सुहास चकमा के अनुसार आंकड़ों से जाहिर है कि कश्मीर से लेकर त्रिपुरा तक पूरा देश ही निष्पक्ष पत्रकारों के लिए खतरनाक हो गया है और यह जाहिर करता है कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी को किस तरह से कैद कर दिया गया है। पिछले वर्ष सरकार द्वारा थोपा गया नया आईटी रूल्स 2021 इसका जीता जागता उदाहरण है। देश में विशेष तौर पर कश्मीर में निष्पक्ष सूचना के प्रसार को पूरी तरह रोक दिया गया है और निष्पक्ष पत्रकारों का अधिकतर समय पुलिस द्वारा की जाने वाली पूछताछ या प्रशासन द्वारा लगाई जाने वाली पाबंदियों से जूझने में ही निकल जाता है। अनेक राज्य निष्पक्ष पत्रकारों को लगातार देशद्रोह और आतंकियों पर लगाए जाने वाले कानूनों से धमकाते हैं।


रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों पर हमलों या पाबंदियों के मामले में बड़े राज्यों में सबसे ऊपर प्रधानमंत्री मोदी का पसंदीदा राज्य उत्तर प्रदेश है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में पिछले वर्ष 108 पत्रकारों पर हमले किये गए– जम्मू और कश्मीर में 25, उत्तर प्रदेश में 2, मध्य प्रदेश में 16, त्रिपुरा में 15, दिल्ली में 8, बिहार में 6, असम में 5, हरियाणा में 4, महाराष्ट्र में 4, गोवा और मणिपुर में 3-3, कर्नाटक, तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल में 2-2 और आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और केरल में 1-1 हमले किये गए।

वहीं, पिछले वर्ष कुल 44 पत्रकारों पर ऍफ़आईआर दर्ज की गयी और 17 पत्रकारों को जेल भेजा गया। पत्रकारों को कैद करने के मामले में सबसे आगे जम्मू और कश्मीर है जहां 5 पत्रकारों को सलाखों के पीछे भेजा गया, इसके बाद दिल्ली में 3, महाराष्ट्र, मणिपुर और त्रिपुरा में 2-2 पत्रकारों को और असम, छत्तीसगढ़ और हरियाणा में 1-1 पत्रकार को जेल भेजा गया।

कुल 24 पत्रकारों को अपने कार्य के दौरान शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, जिसमें से 17 पत्रकारों को पुलिस ने रिपोर्टिंग के दौरान प्रताड़ित किया। कुछ मीडिया घरानों और समाचार पत्रों को सरकार की नीतियों के विरुद्ध समाचार प्रकाशित करने के बाद एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट और इनकम टैक्स विभाग की आकस्मिक जांच का सामना भी करना पड़ा। कुल 8 महिला पत्रकारों को लैंगिक उत्पीड़न, एफआईआर, जेल या पुलिस द्वारा पूछताछ का सामना करना पड़ा। राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप की यह रिपोर्ट रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा पेश प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की अगली कड़ी है, जिसके अनुसार दुनिया के 160 देशों में हम 142वें स्थान पर हैं और पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में शामिल हैं।

17 जनवरी को केंद्र सरकार के इशारे पर चलने वाले कश्मीर प्रशासन ने कश्मीर प्रेस क्लब पर ताला जड़ दिया, प्रेस क्लब का पंजीकरण रद्द कर दिया, इसका अस्तित्व खत्म कर दिया और जिस जमीन पर यह स्थित था, उसे सरकार ने वापस ले लिया। 17 जनवरी को प्रेस क्लब की तालाबंदी से दो दिन पहले सरकार समर्थित पत्रकारों का एक छोटा समूह पुलिस के आलाधिकारियों के साथ प्रेस क्लब पर हमला करता है, प्रेस क्लब के अधिकारियों के साथ बदसलूकी करता है और पत्रकारों को प्रेस क्लब के भीतर जाने से रोकता है।


एक स्वतंत्र पत्रकार सज्जाद गुल ने हाल में ही अपने अनेक लेखों द्वारा पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा किये जा रहे “फेक एनकाउंटर” को उजागर किया था। जाहिर है, सब कुछ ठीक है का नारा लगाने वाले प्रशासन और केंद्र सरकार को यह समाचार पसंद नहीं आया होगा और अब सज्जाद गुल पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट, जिसके तहत आतंकवादियों पर कार्यवाही की जाती है, के तहत मुक़दमा दायर किया गया है और कहा गया है कि वे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। सज्जाद गुल के अलावा एक अन्य पत्रकार भी इसी महीने कश्मीर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है। छत्तीसगढ़ में भी सरकार की आलोचना करने के कारण इसी महीने एक पत्रकार को गिरफ्तार किया गया है।

अमेरिका के इन्टरनेशनल ट्रेड कमीशन ने हाल में ही अमेरिका की कंपनियों द्वारा भारत में कारोबार करने में आने वाली अड़चनों से संबंधित रिपोर्ट में मीडिया सेंसरशिप, विशेष तौर पर डिजिटल सेंसरशिप को सबसे बड़ी अड़चन बताया है। इसके अनुसार भारत में मीडिया के लगभग हरेक क्षेत्र में सेंसरशिप का दायरा बढ़ता जा रहा है और इसके लिए ऐसे कानूनों का सहारा लिया जा रहा है जो दुनिया में कहीं नहीं हैं। इन क्षेत्रों में फिल्म, टीवी, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफार्म पर विडियो स्ट्रीमिंग भी शामिल हैं। इस रिपोर्ट में लगातार इन्टरनेट बंद रखने और डिजिटल मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश की अधिकतम सीमा का उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया है और इसके साथ ही कहा गया है कि इन कदमों से भारत में काम करने वाली अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंच रहा है।

मीडिया सेंसरशिप के मामले में हमारा तथाकथित न्यू इंडिया चीन, रूस, इंडोनेशिया, वियतनाम और तुर्की के साथ खड़ा है। सबसे अधिक और सबसे कठोर सेंसरशिप चीन में की जाती है। हमारे देश में भी मीडिया से जुड़े लगभग हरेक साधन पर सेंसरशिप है– इसमें टीवी कार्यक्रम, पब्लिशिंग, फिल्म्स और सभी ऑन-लाइन सर्विसेज शामिल हैं। अमेरिकी कम्पनियां सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग सर्विसेज में सबसे आगे हैं। रिपोर्ट के अनुसार सेंसरशिप दो तरीके से की जाती है– एक तो कानून की धौंस दिखाकर और दूसरी उत्पीड़न और ताकत की धौंस दिखाकर।

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए अब अनेक कानूनों का सहारा लिया जाता है, जिसमें इंडियन पीनल कोड, आईटी एक्ट, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, महामारी एक्ट और जम्मू और कश्मीर रीआर्गेनाईजेशन एक्ट प्रमुख हैं। सिनेमा पर नियंत्रण के लिए सिनेमेटोग्राफी एक्ट है। भारत सरकार इन्टरनेट को अभिव्यक्ति की आजादी ख़त्म करने के लिए एक घातक हथियार की तरह इस्तेमाल करती है।


फेसबुक द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 के दौरान देश में अलग-अलग जगहों पर इसे करीब 90 बंदी का सामना करना पड़ा। यदि सभी जगह के बंदी के समय को जोड़ें तो बंदी का कुल समय 17 महीने के बराबर था। सरकार अपनी ताकत और क़ानून की धौंस दिखाकरर इन्टरनेट, वेबसाइट, वेबपेज और यहां तक कि चुनिन्दा यूजर के अकाउंट को भी बंद करा देती है।

सरकार का दबाव साल-दर-साल बढ़ता ही जा रहा है। वर्ष 2018 में देश में वेबसाइट, वेबपेज और चुनिन्दा यूजर के अकाउंट को बंद करने के कुल 2799 मामले थे, जिनकी संख्या वर्ष 2020 में बढ़कर 9849 तक पहुंच गयी। वर्ष 2021 में लागू किये गए नए आईटी रूल्स को सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ प्रचारित किया, पर सेंसरशिप का और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का यह एक स्पष्ट उदाहरण है।

हम इतिहास के उस दौर में खड़े हैं जहां मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के सन्दर्भ में हम पाकिस्तान को आदर्श मानकर उसकी नक़ल कर रहे हैं और स्वघोषित विश्वगुरु का डंका पीट रहे हैं। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने भी अपने प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में इन दोनों पड़ोसियों को पड़ोसी ही रखा है– 160 देशों के इंडेक्स में भारत 142वें स्थान पर और पाकिस्तान 145वें स्थान पर है।

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