खरी-खरीः बीजेपी के अजेय अभियान पर कर्नाटक ने कसी लगाम, मोदी मैजिक भी पड़ा फीका

कर्नाटक ने विपक्ष का मनोबल बढ़ाया है। बीजेपी विरोधी मतदाताओं और राजनीतिक दलों दोनों में अब तक जो निराशा थी, उसमें नया जोश दिख रहा है कि मोदी को हराया जा सकता है। साथ ही स्वाभाविक है कि बदलता राजनीतिक परिदृश्य विपक्ष को एकजुट करने में कारगर होगा।

कर्नाटक ने बीजेपी के अजेय अभियान पर लगाम कसी
कर्नाटक ने बीजेपी के अजेय अभियान पर लगाम कसी
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ज़फ़र आग़ा

कर्नाटक बीजेपी के हाथ से निकल गया। बीजेपी के लिए यह दुखदाई तो है, लेकिन इससे भी ज्यादा तकलीफदेह है कर्नाटक चुनावी नतीजों से निकलते राजनीतिक संकेत, क्योंकि बीजेपी 2017 का विधानसभा चुनाव भी हारी थी। लेकिन तब अमित शाह की अगुवाई में और ईडी की मदद से चले ऑपरेशन लोटस के जरिए बीजेपी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। ऐसे में बीजेपी की सत्ता से विदाई इतनी अहम नहीं है जितनी कि कर्नाटक चुनाव परिणामों के राजनीतिक निहितार्थ।

राष्ट्रीय स्तर पर, कर्नाटक के चुनावी नतीजों के तीन बहुत महत्वपूर्ण पहलू हैं जो राजनीतिक परिदृश्य पर उभर कर सामने आए हैं। पहला, अब बीजेपी का हिंदुत्व का चुनावी फॉर्मूला अपनी अपील खोता जा रहा है। अब तक मुस्लिम विरोध और मुस्लिम विरोधी राजनीति ही बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए काफी मानी जाती थी। लेकिन इस बार कर्नाटक में इसका उल्टा हुआ है।

बीते एक साल के दौरान बीजेपी ने संघ के साथ मिलकर क्षेत्रीय स्तर पर मुस्लिम विरोधी तीन हथकंडों का इस्तेमाल किया है। ये थे मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने का मामला। इसका इस हद तक विरोध किया गया कि कर्नाटक सरकार ने सरकारी कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके साथ ही बीजेपी ने टीपू सुल्तान को हिंदुओं का दुश्मन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा बजरंग दल जैसे संगठन 'लव जिहाद' का नारा लगाते रहे।

लेकिन जब चुनाव प्रचार शुरू हुआ तो चुनाव के दौरान न तो कर्नाटक के बीजेपी नेतृत्व और न ही आलाकमान ने इन तीन मुद्दों का कहीं कोई जिक्र किया। हां, आखिरी चरण में  प्रधानमंत्री समेत पूरी बीजेपी ने 'बजरंग बली' का नारा खूब लगाया। लेकिन बजरंग बली ने भी बीजेपी के लिए संजीवनी बूटी लाने से इनकार कर दिया। आखिरकार, कर्नाटक में हिंदुत्व नाकाम हो गया और ऐसा लगता है कि हिंदुत्व कम से कम दक्षिण भारत में काम नहीं करने वाला है।


कर्नाटक चुनाव का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि इस चुनाव में मोदी मैजिक फेल हो गया, यानी साफ कहें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू नहीं चला। प्रधानमंत्री ने कर्नाटक में करीब 42 रैलियां और रोड शो किए, लेकिन अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद भी मोदी कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता में लाने में नाकाम रहे। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि कर्नाटक से पहले वह हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने में नाकाम रहे थे। इसके पहलू के राजनीतिक निहितार्थ यह हैं कि अकेले मोदी अब बीजेपी का चुनाव नहीं जीत पा रहे हैं। निसंदेह, बीजेपी के लिए भी यह बुरी खबर है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारक यह भी रहा कि अब मतदाता धर्म के आधार पर कम और जाति के आधार पर अधिक मतदान कर रहा है। फिर भी बीजेपी के सबसे अहम वोट बैंक लिंगायत ने इस बार उसका पूरा साथ नहीं दिया, जबकि खुले तौर पर जाति की राजनीति करने वाली देवगवाड़ा की जेडीएस अपने क्षेत्र में ठीकठाक कामयाब रही। बीजेपी के लिए ये तीन बातें बेहद परेशान करने वाली हैं।

लेकिन फिर भी इस हार का यह अर्थ नहीं है कि बीजेपी ने सब कुछ खो दिया है। यूपी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे बताते हैं कि वहां हिंदुत्व जोरों पर है, कम से कम भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में तो यह चल ही रहा है। हिंदुत्व हिंदी बेल्ट और पश्चिमी प्रांतों में एक प्रमुख कारक है और रहेगा। साथ ही, मोदी अभी भी भारत में सबसे लोकप्रिया नेता हैं और भले ही उनकी वोट की अपील फीकी पड़ गई हो, फिर भी वे अकेले ही देश के अन्य सभी नेताओं पर कम से कम अभी तक तो हावी हैं। कर्नाटक के बाहर जाति कितनी प्रभावी होती है, यह अभी तय होना है। लेकिन यह अब दूसरे राज्यों में भी तेजी से बढ़ रहा है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों का सियासी निचोड़ यह है कि बीजेपी अब वो बीजेपी नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। बीजेपी के वोटबैंक में सेंध लग चुकी है जो अब बीजेपी के लिए खतरनाक साबित होने वाली है। इसके विपरीत कर्नाटक ने विपक्ष का मनोबल बढ़ाया है। बीजेपी विरोधी मतदाताओं और राजनीतिक दलों दोनों में अब तक जो निराशा थी, उसमें नया जोश दिख रहा है कि मोदी को हराया जा सकता है। साथ ही स्वाभाविक है कि बदलता राजनीतिक परिदृश्य विपक्ष को एकजुट करने में कारगर होगा।


कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे अहम साबित हुए। कांग्रेस जिसके बारे में कहा जाने लगा था कि पार्टी में अब दम नहीं रहा, वह उठ उठ खड़ी हुई है। कर्नाटक में अकेले दम पर स्पष्ट बहुमत से भी अधिक सीटें हासिल करने से पार्टी का मनोबल बढ़ा है।

राहुल गांधी अब राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरे हैं। उनकी भारत जोड़ो यात्रा की मेहनत कर्नाटक में खुलकर दिखाई दी है। प्रियंका गांधी भी अब एक राष्ट्रीय नेता बनकर उभरी हैं। हाल ही में हिमाचल चुनाव की कमान संभालकर उन्होंने कांग्रेस को जीत दिलाई और उनकी रैलियों का असर कर्नाटक में भी पड़ा। बीजेपी का 'कांग्रेस मुक्त भारत' का सपना टूट गया है। और अब इसी साल होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस के बेहतर स्थिति में रहने की संभावना बढ़ गई है। अगर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जीत हासिल करती है तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एकजुट विपक्ष के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण पार्टी के रूप में उभर सकती है।

जाहिर सी बात है कि पूरे देश की राजनीति किसी एक प्रांत के चुनाव नतीजों पर पूरी तरह से तय नहीं हो सकती। लेकिन कर्नाटक ने संकेत दिया है कि बीजेपी का तूफान अब थम रहा है, जबकि कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।

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