केसीआर का तीसरा मोर्चा एक छलावा, मकसद मोदी को फिर से सत्ता में लाना !

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशें एक छलावा हैं, दरअसल मकसद तो नरेंद्र मोदी को फिर से सत्ता में लाना नजर आता है। वे एक ऐसी कोशिश कर रहे हैं जो पूर्व में हमेशा फ्लॉप साबित होती रही है।

फोटो : सोशल मीडिया
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सुरुर अहमद

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव एक ऐसी कोशिश कर रहे हैं जो पूर्व में हमेशा फ्लॉप साबित होती रही है। पहले भी तीसरा मोर्चा बनाने की चुनाव पूर्व कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकला है।

गैर-बीजेपी, गैर-कांग्रेस दलों के गठबंधन का इतिहास 1989 से शुरु माना जा सकता है, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने केंद्र में जनता दल सरकार बनाई थी। लेकिन, उनकी सरकार बीजेपी और वाम दलों की बैसाखियों के सहारे खड़ी हो पाई, क्योंकि जनता दल अपने दम पर बहुमत हासिल करने में नाकाम रहा था। हकीकत यह है कि उस चुनाव में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई थी, फिर भी उसने सरकार बनाने की कोशिश नहीं की थी क्योंकि बहुमत से वह 80 सीटें दूर थी।

एक साल के बाद ही वीपी सिंह सरकार गिर गई थी क्योंकि बीजेपी ने उससे समर्थन वापस ले लिया था। जनता दल के विभाजन के बाद आए अविश्वास प्रस्ताव में सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद चंद्रशेखर ने सरकार बनाई थी, लेकिन उन्हें भी कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ा था, क्योंकि जनता दल से अलग होकर उनके पास सिर्फ 54 सांसद ही थे।

इसी तरह जून 1996 में देवेगौड़ा सरकार भी उस समय सत्ता में आई थी जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी लोकसभा में विश्वास मत हार गई थी। संयोग से देवेगौड़ा और उनके बाद पीएम बने आई के गुजराल दोनों की ही सरकारों को कांग्रेस और वामदलों का समर्थन लेना पड़ा था।

तीसरे मोर्च या फेडरल फ्रंट की कामयाबी बस इतनी सी ही है। और इनमें से कोई भी सरकार कांग्रेस या बीजेपी के समर्थन के बिना नहीं चल पाई।

यह वह दौर था जब बीजेपी ने उभरना शुरु किया था और वह अपने दम सरकार बनाने की स्थिति में तब तक नहीं पहुंची थी। साथ ही इसी दौर में कांग्रेस की गिरावट भी शुरु हुई थी। ऐसे में कुछ लोग थे जो गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेस मोर्चों की वकालत कर रहे थे।

इसके बावजूद अपने दम पर कोई भी तीसरा मोर्चा सरकार बनाने में नाकाम ही रहा था। लेकिन आज, हालात एकदम उलट हैं। बीजेपी अपने दम पर सत्ता मे है और कांग्रेस ने पुनर्जीवित होने के मजबूत संकेत देते हुए हाल के विधानसभा चुनावों में शानदार वापसी की है। इससे भी बढ़कर बात यह कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों के ही पास अपने प्रधानमंत्री पद के चेहरे हैं।

बात यहीं खत्म नहीं होती। कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ही पास अपने विश्वसनीय सहयोगी दल भी हैं। कांग्रेस के पास डीएमके, आरजेडी, टीडीपी, जेडीएस और एनसीपी जैसे मजबूत क्षेत्रीय दल हैं। इसके अलावा एनसीपी, आरएलएसपी और झारखंड-उत्तर पूर्व के कुछ दल भी उसके साथ ही हैं।

संभवत: यह पहला मौका है जब लोकसभा चुनाव से पहले ही कांग्रेस के पास इतने अधिक क्षेत्रीय दलों का साथ है। फिर भी तेलंगाना के मुख्यमंत्री तीसरे मोर्चे की कवायद में लगे हुए हैं और कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे।

लेकिन केसीआर की दिक्कत यह है कि ओडिशा में बीजेडी और तमिलनाडु में एआईएडीएमके के अलावा कोई भी क्षेत्रीय दल उनके प्रस्ताव से आकर्षित होता नज़र नहीं आ रहा। इसके अलावा हाल के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में केसीआर के बेटे के टी रामाराव संकेत दे चुके हैं कि जरूरत पड़ने पर वे बीजेपी के साथ जाएंगे, न कि कांग्रेस के।

यह कहना भी जल्दबाज़ी ही होगी कि तृणमूल कांग्रेस, बीएसपी और समाजवादी पार्टी उनके साथ आ ही जाएंगी। एसपी-बीएसपी तो राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकारों को समर्थन दे रही हैं। दोनों ही पार्टियों ने कांग्रेस के साथ बातचीत के अपने दरवाज़े खुले रखें हैं, और किसी जल्दबाज़ी में फैसला करती नजर नहीं आतीं।

भले ही विधानसभा चुनाव में टीआरएस और उसकी सहयोगी एआईएमआईएम ने बीजेपी विरोधी बयान दिए हों, लेकिन आम मत यह है कि उनका झुकाव भगवा दल की तरफ ज्यादा है न कि गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेस मोर्चे की तरफ। ऐसा ही कुछ एआईएडीएमके के साथ भी है।

दरअसल हाल के तेलंगाना विधानसभा चुनाव जीतने के बाद केसीआर कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षी हो गए हैं। लेकिन तेलंगाना की राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषक मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में टीआरएस का प्रदर्शन विधानसभा चुनाव नतीजों से अलग होगा और केसीआर खुद को कुछ ज्यादा ही मजबूत मान रहे हैं।

यूं भी हाल में केसीआर की नरेंद्र मोदी से मुलाकात तो भले ही पीएम-सीएम के बीच की रस्मी मुलाकात माना जाए, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुलाकात सीएम-पीएम की मुलाकात से कुछ अलग थी।

(यह लेखक के अपने विचार हैं, और नवजीवन का इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है।)

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