केदारनाथ: पीएम मोदी की जल्दबाजी दे सकती है एक और आपदा को न्योता

पीएम मोदी ने पिछले साल केदारनाथ में विकास कार्यों की नींव रखी थी, जिसके बाद पर्यावरणीय खतरों को दरकिनार कर केदारनाथ में युद्धस्तर पर काम जारी है।

फोटो: वर्षा सिंह
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वर्षा सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष केदारनाथ में 4 विकास कार्यों की नींव रखी थी। केदारनाथ का विकास प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है। अब प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट से राज्य सरकार भी दबाव में आ गई है। केदारनाथ में देश-दुनिया से आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए मार्ग चौड़े किए गए हैं। मंदिर के प्रांगण को भी चौड़ा किया गया है। तीर्थ पुरोहितों के नए मकान बनाए जाएंगे। इसके साथ ही 2013 में प्रलय लाने वाली मंदाकिनी नदी के किनारे दीवार का निर्माण किया जाएगा।

चूंकि प्रधानमंत्री खुद यहां चल रहे पुनर्निर्माण कार्यों की ड्रोन के जरिये निगरानी कर रहे थे, इसलिए जिला प्रशासन और राज्य सरकार ने पूरी कोशिश की कि केदारनाथ का कपाट खुलने से पहले ज्यादा से ज्यादा निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाए। दिन-रात तेजी के साथ और जेसीबी मशीनों के जरिये यहां सड़क चौड़ी की गई। साथ ही दूसरे निर्माण कार्यों में भी तेजी लाई गई।

केदारनाथ: पीएम मोदी की जल्दबाजी दे सकती है एक और आपदा को न्योता
पीएम मोदी ने ड्रोन के जरिए केदारनाथ में कार्यों का जायजा लिया

लेकिन क्या केदारनाथ का पर्यावरण इस तरह के पुनर्निर्माण की इजाजत देता है? वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक वहां चल रहे पुनर्निर्माण कार्य पर न सिर्फ सवाल खड़े कर रहे हैं, बल्कि उनके हिसाब से ये एक और आपदा को न्योता देना हो सकता है।

वाडिया इंस्टीट्यूट के मुताबिक, केदारनाथ जैसी छोटी सी जगह में इतना ज्यादा लोड नहीं दिया जाना चाहिए। जिस जगह ग्लेशियर हैं, पहाड़ी नदियां हैं, वहां किसी भी तरह का निर्माण कार्य उसके क्लाइमेट, भौगोलिक परिस्थिति और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के हिसाब से ही करना चाहिए। केदारनाथ एक स्थिर जोन नहीं है। रुद्रप्रयाग भूकंप के लिहाज से अतिसंवेदनशील जोन 5 में आता है। वहां सिर्फ जरूरी निर्माण ही करने चाहिए। वो भी धीमी रफ़्तार से, न कि तेजी से। वाडिया इंस्टीट्यूट के ग्लेशियर लॉजिस्ट डॉ डीपी डोभाल का कहना है कि केदारनाथ का पर्यावरण इस तरह के निर्माण कार्य की इजाजत नहीं देता है। केदारनाथ में बोल्डर्स तोड़ दिये गये हैं। बोल्डर यहां बारिश में पहाड़ों से आने वाले मलबे को रोकने का कार्य करते हैं। जीएसआई ने भी अपनी रिपोर्ट में बोल्डर हटाए जाने की बात कही थी। इसके साथ ही वे मंदाकिनी के किनारे दीवार बनाए जाने पर भी सवाल उठाते हैं।

केदारनाथ: पीएम मोदी की जल्दबाजी दे सकती है एक और आपदा को न्योता
पिछले दिनों निर्माण कार्यों का जायजा लेते मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह

डॉ डीपी डोभाल आगाह करते हैं कि केदारनाथ में ग्लेशियर के साथ-साथ मधु गंगा और दूध गंगा अधिक बारिश के समय मुश्किल हालात पैदा कर सकती है। इन नदियों का कैचमेंट एरिया भी बहुत बड़ा है। 2013 की आपदा में 16 जून को मधुगंगा और सरस्वती में ही बाढ़ आई थी। 17 जून को गांधी सरोवर टूटा था। इस वर्ष वैसे भी मानसून अच्छा रहने का अनुमान जताया गया है। इसे देखते हुए केदारनाथ संवेदनशील है। उसे समतल नहीं किया जाना चाहिए। डॉ डोभाल ने वर्ष 2004 में गांधी सरोवर के टूटने की आशंका जतायी थी, 2013 की आपदा में जो सच साबित हुई इसलिए भी उनकी बातों पर गौर किया जाना बेहद जरूरी है।

केदारनाथ से कांग्रेस विधायक मनोज रावत भी यहां चल रहे पुनर्निर्माण कार्यों पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि केदारपुरी को स्मार्ट सिटी बनाने की जरूरत नहीं है। वे केदारनाथ मंदिर के प्रांगण में किए गए बदलाव से भी नाराज़ हैं। उनका कहना है कि 12वीं शताब्दी के जिस मंदिर ने 2013 में आई आपदा को झेल लिया, उसके वास्तु में छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए थी। मनोज रावत का कहना है कि मंदिर में किए गए परिवर्तन को लेकर उन्होंने श्रीनगर में पुरातत्व विभाग के मुखिया से बात की। इसके अलावा उन्होंने वरिष्ठ वास्तुविद डॉ वाईएस कटौच से भी बात की। सभी ने मंदिर में किए गए परिवर्तन को गलत ठहराया है।

विधायक मनोज रावत का कहना है कि जो कार्य पुरातत्व विभाग की निगरानी में होना चाहिए था, वह पीडब्ल्यूडी से कराया जा रहा है। केदारनाथ के पुनर्निर्माण में स्थानीय पत्थर लगने चाहिए थे, जो यहां का स्थानीय तत्व है, उसकी जगह सरिया सीमेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो सही नहीं है।

मध्य हिमालयी कला पुस्तक के लेखक और वास्तुविद डॉ वाईएस कटौच केदारनाथ के मंदिर में किए गए परिवर्तन और उसके प्रांगण को चौड़ा करने के लिए किए गए कार्य को सही नहीं ठहराते हैं।

केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित भी वहां चल रहे पुनर्निर्माण से संतुष्ट नहीं हैं। इसके विरोध में उन्होंने 14 मई से हर सोमवार उपवास रखना शुरू किया है। केदारनाथ मंदिर समिति के पंडित लक्ष्मी नारायण जुगरान का कहना है कि केदारनाथ में पहले 14 फुट चौड़ी सड़क थी, जिसे 30 फुट करने के लिए आम लोगों से सहमति ली गई थी। लेकिन इसे 50 फुट तक चौड़ा कर दिया गया है। जिस जगह तीर्थ पुरोहितों की दुकानें बननी थीं, सरकार उस जगह को भी पैदल मार्ग में लाना चाहती है। केदारनाथ के कुछ तीर्थ पुरोहित शीतकाल के दौरान, जब वहां कोई नहीं होता, पुनर्निर्माण के लिए ब्लास्ट किए जाने का भी दावा करते हैं।

राज्य के पर्यटन सचिव और गढ़वाल मंडल के आयुक्त दिलीप जावलकर मानते हैं कि प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट होने की वजह से राज्य सरकार वहां हो रहे पुनर्निर्माण कार्यों को लेकर कुछ दबाव में हैं। पर्यटन सचिव के मुताबिक केदारनाथ के पुनर्निर्माण कार्यों के लिए आईआईटी, रुड़की और नेशनल बिल्डिंग अथॉरिटी से सलाह ली गई है। मंदिर में किए गए परिवर्तन के लिए जीएसआई से सलाह ली गई है। साथ ही एनजीटी से भी केदारनाथ के पुनर्निर्माण कार्य की अनुमति ली गई है। दिलीप जावलकर कहते हैं कि ठीक है कि केदारनाथ सेंसिटिव जोन है, लेकिन उसे उसकी प्राकृतिक अवस्था में भी नहीं छोड़ा जा सकता। देश भर से केदारनाथ में दर्शन के लिए श्रद्धालु आते हैं, उन श्रद्धालुओं के लिए केदारनाथ में सुविधाएं देना जरूरी है। हालांकि, पुनर्निर्माण कार्यों से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर वे कुछ नहीं कहते।

भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी जीएसआई पहले भी अपनी रिपोर्ट में आगाह कर चुकी है कि उत्तराखंड शत प्रतिशत भूकंप के खतरे की जद में है। उत्तराखंड के चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी और पिथौरागढ़ जिले जोन-5 में हैं, जो अति संवेदनशील हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक वहां चल रहे पुनर्निर्माण कार्य को पर्यावरण के लिहाज से खतरा बता रहे हैं। लेकिन शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट होने की वजह से पर्यावरणीय खतरों को दरकिनार किया जा रहा है। साथ ही ये भी माना जा रहा है कि मोदी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए केदारनाथ से ही अपने प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे। केदारनाथ में प्रधानमंत्री का सपना पर्यावरण पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।

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