हिन्दुत्ववादी राजनीति से जूझता केरला

वेल्लापल्ली नटेसन की राज्य में एझवा और नायर समुदायों के बीच गठबंधन बनाने की कोशिशें रंग दिखाती, इसके पहले ही बेरंग हो गई।

फोटो: सोशल मीडिया
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गणतंत्र दिवस पर केंद्र सरकार ने 89 साल के वेल्लापल्ली नटेसन को ‘समाज सेवा’ के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया। केरला विधानसभा के भावी चुनाव को देखते हुए इसके समय पर सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस नेताओं और सिविल सोसाइटी समूहों ने इस आधार पर वेल्लापल्ली को पुरस्कार पर सवाल उठाए हैं कि एक तो वह खुद इन्हें सियासी औजार करार देते हुए खारिज कर चुके हैं। दूसरा, वेल्लापल्ली के खिलाफ सौ से ज्यादा आपराधिक मामले हैं, जिनमें से कई में कोऑपरेटिव बैंकों में भ्रष्टाचार और श्रीनारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) के फंड के दुरुपयोग के आरोप हैं।

जहां बीजेपी ने इसपर खुलकर जश्न मनाया, वहीं मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने मंत्रियों वी. शिवनकुट्टी, साजी चेरियन और चिंता जेरोम जैसे पार्टी नेताओं के साथ वेल्लापल्ली को सार्वजनिक तौर पर बधाई दी। भाजपाई सोशल मीडिया पर ‘एझवा गौरव’ की बातें की गईं और पुरस्कार को इसके सबूत के तौर पर पेश किया गया कि बीजेपी ने आखिर केरला में भरोसेमंद सामाजिक आधार हासिल कर लिया।

वेल्लापल्ली ने भी मौका ताड़ा और मुसलमानों और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) पर निशाना साधते बयानों की झड़ी लगा दी। उन्होंने लीग पर ‘परोक्ष तरीके से राज्य चलाने’ का आरोप लगाया और यह दावा करते हुए कि ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, चेतावनी दी कि केरला ‘दूसरा पश्चिम बंगाल’ बनता जा रहा है।


सिविल सोसाइटी समूहों ने इन टिप्पणियों की सांप्रदायिक और खतरनाक बताकर निंदा की, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की तरफ से कोई आवाज नहीं आई। यहां तक कि जब वेल्लापल्ली ने मुसलमानों पर हमले तेज किए, तब भी पिनाराई और अन्य माकपा नेता चुप रहे। बीजेपी ने वेल्लापल्ली के बोलने के अधिकार का बचाव किया, और इस विवाद को हिन्दू आवाजों पर हमले का रंग दे दिया। अजीब नजारा हैः हिन्दू समुदाय के एक भड़काऊ नेता का न सिर्फ हिन्दू दक्षिणपंथी समर्थन कर रहे हैं, बल्कि मार्क्सवादी वामपंथियों से भी उसे मौन समर्थन मिल रहा है।

इसे समझने के लिए वेल्लापल्ली के निजी सफर को देखना चाहिए। मध्य केरला में एक अमीर एझवा परिवार में जन्मे वेल्लापल्ली ने अपनी दौलत खास तौर पर शराब के कारोबार से बनाई और राज्य के प्रभावशाली शराब कारोबारियों में शुमार हो गए। एसएनडीपी में उनकी तरक्की में आर्थिक ताकत और संगठनात्मक नियंत्रण, दोनों शामिल थे और इसी से वह दशकों योगम पर हावी रहे।

स्कॉलर और सोशल एक्टिविस्ट सनी कपिक्कड़ कहते हैं, ‘यह पृष्ठभूमि एक विडंबना दिखाती है। श्रीनारायण गुरु ने साफ तौर पर एझवा लोगों को शराब बनाने और इसकी बिक्री में शामिल होने के खिलाफ चेताया था। इसे सामाजिक बुराई माना था जो समुदाय को आर्थिक निर्भरता और नैतिक गिरावट में फंसाती है। फिर भी आज, गुरु की विरासत का संरक्षक एक ऐसा आदमी है जिसकी दौलत और ताकत उसी इंडस्ट्री में है जिसका गुरु ने विरोध किया था।’


जब वेल्लापल्ली नटेसन ने ओबीसी एझवा और ऊंची जाति के नायर के बीच एक बड़े गठबंधन की घोषणा की, तो उन्होंने अपने शब्दों को बहुत सोच-समझकर चुना। लंबे समय तक एसएनडीपी के महासचिव रहे वेल्लापल्ली ने इसे सभ्यतागत जरूरत बताया। गौरतलब है कि एसएनडीपी राज्य के सबसे शक्तिशाली सामाजिक-धार्मिक संगठनों में से एक है और 19वीं सदी के नेता श्रीनारायण गुरु की सुधारवादी विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करता है। वेल्लापल्ली ने तर्क दिया कि केरला के हिन्दुओं को अंदरूनी मतभेदों को खत्म करके आबादी में बदलाव और अल्पसंख्यक समुदाय की बढ़ती ताकत का सामना करने को एकजुट हो जाना चाहिए।

इन आंकड़ों ने उनके दावे को काफी हद तक भरोसेमंद बना दिया। एझवा, जिन्हें केरला में सबसे बड़ा हिन्दू समुदाय माना जाता है, उनकी आबादी करीब 22-25 फीसद है और अगड़ी जाति नायर की 12-15 फीसद है। दोनों मिलकर राज्य की आबादी में एक तिहाई से ज्यादा हैं, जो एक ऐसी राजनीति में संभावित रूप से निर्णायक गुट बन जाता है जहां चुनाव अक्सर बहुत कम अंतर से तय होते हैं।

फौरन इसका राजनीतिक असर हुआ - विधानसभा चुनाव नजदीक देख पार्टियों ने अपनी रणनीति को उसी अनुरूप ढालना शुरू कर दिया। एसएनडीपी-नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) गठबंधन केरला के राजनीतिक नक्शे को बदल सकती है।


वेल्लापल्ली की अस्पष्ट राजनीतिक स्थिति उन्हें समझना थोड़ा मुश्किल बनाती है। हाल के सालों में, उन्होंने खुद को एक ऐसे इंसान के तौर पर पेश किया है जो हर जगह है, फिर भी कहीं नहीं है। उनकी परिवार द्वारा चलाई जाने वाली राजनीतिक पार्टी, भारत धर्म जन सेना (बीडीजेएस), जिसका नेतृत्व उनकी पत्नी प्रीति नटेसन और बेटे तुषार वेल्लापल्ली करते है, केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा है। फिर भी, वेल्लापल्ली ने केरला के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को खुले तौर पर अपना करीबी विश्वासपात्र और साथी बताया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस पर, खासकर पिछले चार सालों से राज्य में विपक्ष के नेता वी.डी. सतीसन पर हमले तेज कर दिए हैं।

वेल्लपल्ली के एकता के ऐलान की तुरंत एनएसएस महासचिव जी. सुकुमारन नायर ने हौसलाअफजाई की। दोनों नेता कांग्रेस विरोध पर एकजुट हैं और पार्टी द्वारा धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर जोर देने से दोनों को एक-सी बेचैनी होती है।

फिर भी, यह गठबंधन ऐलान होते ही लगभग टूट गया। कुछ ही दिनों में, एनएसएस बोर्ड ने सार्वजनिक रूप से इस प्रस्ताव से खुद को अलग कर लिया, जिससे न सिर्फ वेल्लापल्ली के प्रोजेक्ट की सामाजिक कमजोरी सामने आई, बल्कि एनएसएस के अंदर राजनीतिक लामबंदी के प्रति संस्थागत विरोध भी जाहिर हो गया जिसे बीजेपी-संघ के एजेंडे का विस्तार माना जा सकता है।

वेल्लापल्ली ने एनएसएस नेताओं पर जमकर हमला बोला और उन पर ‘हिन्दू हितों के साथ विश्वासघात करने’ का आरोप लगाया। एनएसएस ने इसपर खुद को न्यूट्रल कर लिया। भाजपा और माकपा, दोनों वेल्लापल्ली की चालों से चुनावी फायदा उठाने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन वे दर्शक बनकर रह गए।


वेल्लापल्ली जैसे नेता राजनीतिक पार्टियों के लिए इतने जरूरी क्यों हैं, इसका जवाब केरला की जनसांख्यिकी में है। ज्यादा आबादी वाले एझवा समुदाय के लोग ऐतिहासिक रूप से कम्युनिस्ट आंदोलन की रीढ़ रहे हैं। उन्होंने दशकों तक ट्रेड यूनियन, किसान आंदोलनों और सहकारी संस्थाओं पर दबदबा रखा। नायर समुदाय का ऐतिहासिक रूप से केरला की जाति व्यवस्था में खास स्थान रहा है, और जमीन के मालिकाना हक, शिक्षा और नौकरशाही में उनका प्रतिनिधित्व आबादी के अनुपात से कहीं ज्यादा रहा। कांग्रेस और, अब तो भाजपा में भी समुदाय की मजबूत मौजूदगी रही है।

शिक्षाविद जे. प्रभाष कहते हैं, ‘ये दोनों समुदाय मिलकर राजनीतिक प्रभाव वाला एक बहुत बड़ा गुट बनाते हैं। एझवा या नायर वोटिंग पैटर्न में थोड़ा सा भी बदलाव दर्जनों सीटों पर नतीजों को बदल सकता है।’

यह हिन्दू एकजुटता के लिए वेल्लापल्ली की पहली कोशिश नहीं थी। इस बार जो अलग था, वह था तेजी से इसका बिखरना। राजनीतिक विश्लेषक एम.एन. करासेरी कहते हैं, ‘यह बिखराव बहुत कुछ बताता है। अगर सुकुमारन नायर, जो बहुलवाद के समर्थक नहीं हैं, भी वेल्लापल्ली की योजना का समर्थन नहीं करेंगे, तो यह दिखाता है कि केरला में खुले तौर पर धार्मिक एकजुटता राजनीतिक रूप से कितनी खतरनाक है।’

वेल्लापल्ली का राजनीतिक सफर विरोधाभासों से भरा है। पहले, वह मुस्लिम लीग के करीब थे। बेहतर आरक्षण के लिए साथ-साथ आंदोलन किए और अल्पसंख्यक अधिकारों की बात की। सबरीमाला विवाद के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने की इजाजत दी, तो वह राज्य सरकार के साथ मजबूती से खड़े रहे, फेसले का स्वागत किया, और यहां तक कि सरकार समर्थित केरला पुनर्जागरण आंदोलन के पदाधिकारी भी बन गए।


बाद में, उन्होंने ऐलान किया कि इस फैसले से ‘हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है’ और महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करने वाले एक्टिविस्टों पर ‘हि्न्दू विरोधी साजिश’ में शामिल होने का आरोप लगाया। उन्होंने खुले तौर पर फैसले के खिलाफ बीजेपी के नेतृत्व में हुए आंदोलन का समर्थन किया, जिससे वामपंथी सहयोगियों और दक्षिणपंथी समर्थकों, दोनों को विरोधाभासी संकेत मिले।

करासेरी का तर्क है- ‘वेल्लापल्ली की राजनीति किसी स्थिर वैचारिक प्रतिबद्धता पर आधारित नहीं। यह मौके के हिसाब से कभी बीजेपी से हाथ मिलाती है, तो कभी माकपा को गले लगाती है, जबकि कांग्रेस पर लगातार हमलावर रहती है। पिनाराई के लिए उसका समर्थन लेन-देन वाला है तो भाजपा के साथ नजदीकी रणनीतिक।।’

केरल की राजनीतिक संस्कृति इस तरह की असंगति के प्रति ज्यादा ही शंकालु है। करासेरी चेताते हैं, ‘आप एक मार्क्सवादी मुख्यमंत्री के साथ गठबंधन करके हिन्दू सभ्यतावादी मोर्चे का नेतृत्व नहीं कर सकते।’ शिक्षाविद और सामाजिक विचारक टी.एस. श्याम कुमार कहते हैं, ‘असली खतरा इसमें नहीं है कि वेल्लापल्ली चुनाव जीतते हैं या नहीं, बल्कि इसमें है कि उनकी राजनीति केरला की नैतिक भाषा के साथ क्या कर रही है। श्री नारायण गुरु की विरासत को अपनाकर, वह उसे अंदर से खोखला कर रहे हैं।’

श्री नारायण गुरु एक ऐसे समाज के लिए थे जो जाति, धार्मिक डर और वंशानुगत प्रभुत्व से परे हो। बहिष्कार करते समय उनके नाम का इस्तेमाल करना, केरला की आधुनिक चेतना की नैतिक नींव के साथ धोखा है।

(लेखक के.ए. शाजी हैं)