खरी-खरी: हिंदुत्व की राजनीति का ट्रेलर भर है लखीमपुर खीरी, विरोध करने वालों को 'सुधारने' की नीति

लोकतंत्र का इस्तेमाल बीजेपी चुनाव जीतने के लिए तो करती है, पर सत्ता में आने के बाद वह जनता अथवा विपक्ष किसी को भी विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार देने को तैयार नहीं है। यदि कोई विरोध की चेष्टा करता है तो उसे लखीमपुर खीरी के किसानों की तरह ‘सुधार’ दिया जाएगा।

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ज़फ़र आग़ा

यह तो होना ही था क्योंकि उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में घटित घटना ही हिन्दुत्व राजनीतिका वास्तविक रूप है। लेकिन पहले वहां क्या हुआ, यह याद दिलाना आवश्यक है। घटनाक्रम कुछ यूं था कि लखीमपुर खीरी में किसानों का आंदोलन लगातार जारी था। इसी बीच वहां से निर्वाचित सांसद और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा पिछले सप्ताह लखीमपुर में एक समारोह करने वाले थे। उस समारोह में भाग लेने के लिए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य वहां आ रहे थे। शहर में पहले से ही किसानों का धरना जारी था। समारोह से कुछ रोज पहले केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्रा ने लखीमपुर में एक भाषण देकर किसानों को यह चेतावनी दी कि ‘सुधर जाओ नहीं तो सुधार देंगे।’ अर्थात मौर्य जी के आने से पहले धरना-प्रदर्शन समाप्त करो, नहीं तो मजा चखा दिया जाएगा। किसानों ने यह ऐलान किया कि मौर्य जी को वे काले झंडे दिखाएंगे। और बीते तीन अक्टूबर को कुछ ऐसा ही हुआ और केन्द्रीय मंत्री के सहयोगियों ने किसानों को मजा चखा दिया। आपने वह वीडियो तो देखा ही होगा जिसमें चार बड़ी-बड़ी गाड़ियां स्वयं एक मंत्री जी की एसयूवी के साथ किसानों को रौंद रहीहैं। आरोप यह है कि उस गाड़ी में मंत्री जी के ‘सुपुत्र’ आशीष मिश्रा किसानों को ‘सुधार’ रहे थे। चार बड़ी-बड़ी गाड़ियों से कुचलने से चार किसानों की मौत हो गई। बस किसानों का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने बीजेपी की भीड़ पर चढ़ाई कर दी। उधर, 4 बीजेपी कार्यकर्ता भी मारे गए।

एक लोकतंत्र में लखीमपुर खीरी में जो कुछ किसानों के साथ हुआ, वह कोई मामूली घटना नहीं थी। जाहिर है, विपक्ष इस घटना पर अपना आक्रोश एवं किसानों के साथ सहानुभूति प्रकट करने तुरंत लखीमपुर खीरी चल पड़ा। कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी से लेकर अखिलेश यादव एवं जयंत चौधरी और राहुल गांधी तक सब ही लखीमपुर खीरी के लिए निकले। अधिकांश को लखनऊ में ही रोक दिया गया। प्रियंका गांधी सीतापुर तक रात में ही पहुंच गईं, तो उनको वहीं गिरफ्तार कर लिया गया। उनको कोई एफआईआर तक नहीं दी गई थी। हद है कि उनके वकील को भीउनसे मिलने की इजाजत नहीं दी गई।

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अब आप कहेंगे कि इस पूरी घटना का हिन्दुत्व की राजनीति से क्या लेना-देना है। तो भाई, इस पूरे घटनाक्रम में दो राजनीतिक तथ्य उभरकर सामने आते हैं। पहला, यदि किसान, अर्थात जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग करेगी, तो उसको बीजेपी सरकार वैसे ही‘सुधार’ देगी जैसे कि लखीमपुर खीरी में सुधारा गया। तब ही तो लखीमपुर की घटना के तुरंत बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को समझा दिया कि यदि कोई धरना- प्रदर्शनकरता है, तो उसमें भाग लेने वालों को ‘ठीक’ कर दो। इसका दूसरा अर्थ यह है कि जनता को सरकार का विरोध करने का हक ही नहीं है। यह लोकतंत्र की हत्या नहीं तो फिर और क्या है। बस, यही हिन्दुत्व है।

हिन्दुत्व में लोकतंत्र बीजेपी के लिए सत्ता प्राप्ति तो है परंतु सत्ता में आने के बाद जनता के लिए कोई लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रह जाते हैं। तब ही तो चाहे किसान आंदोलन हो या फिर शाहीन बाग-जैसे विरोध प्रदर्शन- उन सब लोकतांत्रिक प्रदर्शनों में भाग लेने वालों को लखीमपुर के किसानों और उमर खालिद-जैसों को भाजपा सरकारें तुरंत ‘सुधार’ देती हैं। लखीमपुर घटना का दूसरा राजनीतिक सारांश यह है कि जनता तो जनता, विपक्ष को भी सत्ता के विरोध का कोई अधिकार नहीं होगा। यदि विपक्ष फिर भी विरोध करता है, तो उसको प्रियंका गांधी की तरह बगैर एफआईआर के बंदी बनाकर ‘सुधार’ दिया जाएगा।

यही है हिन्दुत्व की राजनीति का सार।


आरोप था कि सन 2002 में गुजरात के गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में मुस्लिम भीड़ ने आग लगा दी थी। उसके तुरंत बाद पूरे गुजरात की मुस्लिम आबादी को एक नरसंहार के जरिये सुधार दिया गया और मोदीजी ने अत्यंत शांत भाव से कह दिया कि ‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया’ होती है। आखिर मोदी ठहरे ना हिन्दुत्व राजनीति के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी। वहीं हिन्दुत्व के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता योगी के राज्य में यही हो रहा है। जनता अथवा विपक्ष किसी ने कोई ‘क्रिया’ की तो उसके विरुद्ध सरकारी ‘प्रतिक्रिया’ के माध्यम से दोनों को सुधार दिया जाएगा। हिन्दुत्व के नायक विनायक दामोदर सावरकर का यही सपना था। हिन्दुत्व केवल मुस्लिम विरोध का ही नाम नहीं है। हिंदुत्व स्वयं हिन्दू जनता को भी लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर देता है, यदि जनता सरकार से कोई प्रश्न करती है।

लब्बोलुआब यह है कि हिन्दुत्व राज में लोकतंत्र का इस्तेमाल बीजेपी चुनाव जीतने के लिए तो करती है परंतु सत्ता में आने के बाद वह जनता अथवा विपक्ष किसी को भी विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार देने को तैयार नहीं है। यदि वे विरोध की चेष्टा करेंगे, तो उनको लखीमपुर खीरी के किसानों की तरह ‘सुधार’ दिया जाएगा। लखीमपुर खीरी तो केवल ट्रेलर है। आगे-आगे देखिए होता है क्या!

आर्यन खान तो एक बहाना है

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लीजिए, अब शाह रुख खान निशाने पर हैं। जी हां, वही शाहरुख जिनको बॉलीवुड के ‘बादशाह’ का खिताब दिया गया और जिन्होंने पिछले दो दशकों में भारतीय सिनेमा प्रेमियों को अपने अभिनय से हंसाया और रुलाया। वह इस समय बॉलीवुड के सबसे प्रख्यात अभिनेता ही नहीं हैं बल्कि उनके चाहने वाले करोड़ों की तादाद में विदेशों में भी हैं। कहते हैं, जैसे कभी राजकपूर सोवियत संघ में प्रसिद्ध थे, वैसे ही शाहरुख खान के प्रशंसक जर्मनी, तुर्की और अन्य देशों में करोड़ों की तादाद में हैं। परंतु शाहरुख भारत एवं विदेशों में अपने अभिनय के लिए प्रसिद्ध हैं तो हुआ करें। वह मोदी प्रेमी नहीं हैं।

शाहरुख खान, सलमान खान की तरह मोदीजी के साथ पतंग उड़ाने को तैयार नहीं। वह आए दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा अपने ट्वीट के माध्यम से नहीं करते हैं। हां, उन्होंने एक सेल्फी मोदीजी के साथ जरूर खिंचवाई है। परंतु मोदीजी के सत्ता में आने से पूर्व ही उनके बारे में यह प्रख्यात है कि उनका राजनीतिक झुकाव कांग्रेस की ओर है। वह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से खुलकर मिलते रहे हैं। भले एक प्रख्यात अभिनेता के संबंध विपक्ष में हों, पर वह मोदी के सामने नतमस्तक न हो, बस यही शाहरुख खान का गुनाह है। उनके पुत्र आर्यन खान इसलिए नहीं पकड़े गए कि वह चरस पी रहे थे। उनका गुनाह यह है कि वह शाहरुख खान के बेटे हैं।


परंतु आर्यन खान पहले बॉलीवुड से जुड़े व्यक्ति नहीं हैं जिनको नशे के मामले में अधिकारियों ने फांसा है। सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण के समय से बॉलीवुड एवं नशे का एक गहरा संबंध चल रहा है। टीवी प्रोग्राम देखकर तो कुछ ऐसा प्रतीत होने लगा है कि बॉलीवुड नशेड़ियों-भंगेड़ियों का एक अड्डा है। तब ही तो कभी रिया चक्रवर्ती, तो कभी दीपिका पादुकोण और अभी आर्यन खान के माध्यम से शाह रुख खान का नाम ड्रग्स से जोड़ा जा चुका है।

परंतु बॉलीवुड में ड्रग्स को लेकर जो खेल चल रहा है, वह केवल कुछ प्रख्यात बॉलीवुड सितारों को सबक सिखाने का मामला ही नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक लक्ष्य भी है। बॉलीवुड अभी हाल तक देश का सबसे सेकुलर प्लेटफॉर्म रहा है। तब ही तो शाहरुख, सलमान एवं आमिर- जैसे खानों की तिगड़ी इस समय भी सबसे बुलंद है। भला हिन्दुत्व की राजनीति के दौर में यह कैसे हो सकता है। अतः कभी रिया चक्रवर्ती, कभी दीपिका पादुकोण एवं कभी शाहरुख खान और कभी जावेद अख्तर-जैसे बॉलीवुड सितारों को निशाना बनाया जा रहा है। यह इस बात का इशारा है कि बॉलीवुड में यदि अब कोई इनके साथ बिजनेस करेगा, तो बस फिर समझ ले। हां, अक्षय कुमार-जैसे मोदी प्रेमी एवं भाजपा समर्थक ठीक हैं, अर्थात बॉलीवुड में देश की गंगा-जमुनी संस्कृति अब खत्म करो और हिन्दुत्व का झंडा बुलंद करो। लब्बोलुआब यह कि आर्यन खान तो एक बहाना है, शाहरूख खान असल निशाना हैं।

भगवान ही शिक्षा प्रणाली पर दया करें!

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सरकार को इस बात की चिंता तो है कि बॉलीवुड में कौन चरस पी रहा है, परंतु इस बात की चिंता नहीं कि देश के स्कूलों में क्या हो रहा है। हां, यूनेस्को को यह चिंता जरूर है। तब ही तो पिछले सप्ताह यूनेस्को ने भारतीय स्कूलों की दशा पर एक रिपोर्ट जारी कर जो खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला ही नहीं बल्कि चिंताजनक भी है। जरा आप भी देश के विद्यालयों की दयनीय स्थिति पर एक निगाह डाल लीजिए। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में एक लाख स्कूल ऐसे हैं जिनको केवल एक अध्यापक चला रहा है। उधर, 11 लाख टीचरों की पोस्ट खाली पड़ी हैं। इनमें से 69 प्रतिशत पोस्ट गांव के इलाकों में हैं। जाहिर है कि सबसे बुरा हाल उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल-जैसे प्रदेशों का है। आप यह तो समझ ही गए होंगे कि यह हाल सरकारी स्कूलों का है। बस, भगवान ही इस देश की शिक्षा प्रणाली पर दया करें क्योंकि सरकार को तो शिक्षा की चिंता है ही नहीं।

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