खरी-खरी: बढ़ता ही जा रहा विश्व युद्ध का खतरा, दो खेमों में बंट रही दुनिया!

बैलेंस आफ पावर बदल रहा है और इसने फिर विश्व युद्ध का खतरा बढ़ा दिया है। खतरनाक बात यह है कि अब की विश्व युद्ध होगा तो बात परमाणु युद्ध तक पहुंच सकती है। अब यदि कहीं भी न्यूक्लियर हमला हुआ, तो दुनिया ही नहीं सारी मानवता चपेट में होगी।

फोटो: सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर के कार्यकाल के दौरान उपराष्ट्रपति रहे रिचर्ड बी चेनी (डिक चेनी) ने सन 1998 में अमेरिकी कांग्रेस में एक पेपर पेश किया था जिसमें यह घोषणा की गई थी कि ‘21वीं शताब्दी अमेरिकी शताब्दी होगी’। और 21वीं शताब्दी के आरंभ से ऐसा कुछ लगने भी लगा। अमेरिका पर ओसामा बिन लादेन का आतंकी हमला हुआ। बस, देखते-देखते अमेरिका ने ‘ग्लोबल वार ऑन टेररिज्म’ छेड़ दिया। पहले अफगानिस्तान और फिर जल्द ही इराक के चप्पे-चप्पे पर अमेरिकी फौज तैनात हो गई। सद्दाम हुसैन का इराक और तालिबान का राज इराक एवं अफगानिस्तान से समाप्त हो गया। सारी दुनिया में अमेरिका का डंका बजने लगा। अब अमेरिका एक ध्रुवीय विश्व (यूनिपोलर वर्ल्ड) का अकेला ‘सुपर पावर’ था। इस प्रकार 21वीं शताब्दी का अमेरिकी सपना साकार हो गया। 

लेकिन भगवान बचाए राजनीतिक के चढ़ते-उतरते रंगों से। अभी 21वीं शताब्दी को दो दशक बीते भी नहीं थे कि पहले इराक से और फिर अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजी वापस देश लौट गए। इराक में ईरान के असर वाली सरकार बन गई। उधर, अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में वापस आ गए। लीजिए, सारी दुनिया में शोर मच गया कि अमेरिका के दांत टूट गए। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका का वह रुतबा खत्म होता दिखने लगा जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका को प्राप्त था।  


राजनीति का एक और अहम उसूल यह है कि इसमें जो स्थान खाली होता है, वह कोई दूसरा जल्द ही भर देता है। अमेरिका के कमजोर पड़ने से जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान रिक्त हुआ था,  उसको चीन एवं रूस ने भरना आरंभ कर दिया। चीन अब एक बड़ा सुपर पावर हो गया। उसने भी अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में यह घोषणा कर दी कि वह इस शताब्दी का एक अहम खिलाड़ी है। उधर, पुतिन के नेतृत्व में रूस ने भी अपना प्रभाव व्यापार के रास्ते दुनिया पर बढ़ाना शुरू कर दिया। 

पुराने रईसों के आगे यदि नए रईस ताल ठोकते हैं तो पुराने रईस अपने प्रतिद्वंद्वियों को सबक सिखाने को मचलने लगते हैं। अमेरिका के साथ भी यही हुआ। अमेरिका चीन और रूस को सबक सिखाने को मचलने लगा। इधर, यूक्रेन के अमेरिकी पिट्ठू जेलेन्सिकी ने रूस की सीमा पर अपनी फौजें तैनात कर दीं। पुतिन इसको बर्दाश्त नहीं कर सके और देखते-देखते रूसी फौज यूक्रेन में दाखिल हो गई। 

अभी इसी माह यूक्रेन एवं रूस युद्ध को एक वर्ष बीत गया। इस एक वर्ष में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह स्पष्ट हो गया कि अब दुनिया ‘यूनिपोलर वर्ल्ड’ नहीं रह गई है। एक बार फिर दुनिया पर शीत युद्ध की परछाई दिखाई दिखने लगी। रूस एवं चीन ने मिलकर दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व को चैलेंज कर दिया। इतना ही नहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने एक खुफिया बैठक में अपने राष्ट्रदूतों को यह स्पष्ट कर दिया कि दुनिया से पश्चिम का तीन सौ साल का पुराना वर्चस्व समाप्त हो रहा है। और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर की जमीनी स्थिति कुछ ऐसी ही है। अपनी पूरी ताकत झोंक कर भी अमेरिका रूसी फौज यूक्रेन से बाहर निकालने में सफल नहीं है। इधर चीन एवं रूस आपस में खुल कर यूएन जैसी जगह पर यूक्रेन मामले पर अमेरिका का विरोध कर रहे हैं। इधर भारत ने भी यूक्रेन युद्ध पर खुलकर अमेरिका का साथ देने से इनकार कर दिया है। केवल इतना ही नहीं, सऊदी अरब जैसे अमेरिकी पिट्ठू देश अब चीन एवं रूस के साथ व्यापार की पेंग बढ़ा रहे हैं। निःसंदेह दुनिया बदल गई है। 21वीं शताब्दी साफ तौर पर अमेरिकी शताब्दी नहीं है और न हो सकती है। 


लेकिन जब-जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति संतुलन (बैलेंस आफ पावर) बदलने लगता है, तब-तब दुनिया में विश्व युद्ध का खतरा बढ़ता जाता है। सन 1940 के दशक में जब दुनिया में इंग्लैंड बहादुर का सूर्य अस्त होने लगा, तो दुनिया में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। फिर जो तबाही हुई, उसका इतिहास साक्षी है। इसी प्रकार अमेरिका के वैश्वीकरण पर कमजोर पड़ने से एक बार फिर बैलेंस आफ पावर बदल रहा है और जिस प्रकार दुनिया में अमेरिका एवं रूस के दो खेमे बन गए हैं, उसने फिर विश्व युद्ध का खतरा बढ़ा दिया है। खतरनाक बात यह है कि अब की विश्व युद्ध होगा तो बात परमाणु युद्ध (न्यूक्लियर वार) तक पहुंच सकती है। सन 1945 में जापान के एटम बम से केवल हिरोशिमा एवं नागासाकी जैसे दो जापानी नगर ही बर्बाद हुए थे। अब यदि कहीं भी न्यूक्लियर हमला हुआ तो दुनिया ही नहीं, सारी मानवता चपेट में होगी। इसलिए बकौल साहिर लुधियानवीः  

जंग टलती रहे तो बेहतर है 

आप और हम सभी के आंगन में 

शमां जलती रहे, तो बेहतर है। 

लेकिन विश्व के नेता कवियों को कहां सुनते हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति को तो अपने देश की ‘हथियार लॉबी’ की अधिक चिंता रहती है। और इस लॉबी को दुनिया में कहीं न कहीं युद्ध चाहिए ही होता है ताकि उसके हथियार बिकते रहें। यदि इराक एवं अफगानिस्तान का युद्ध रुक गया तो यूक्रेन युद्ध में ही सारे पश्चिमी देश यूक्रेन की सहायता के लिए हथियार पहुंचा रहे हैं। इस प्रकार हथियारों की बिक्री अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी है। और अमेरिका सहित पूरे पश्चिमी देशों की हथियार लॉबी के मजे आ रहे हैं।  


लेकिन हथियारों की बिक्री की खातिर पूरी मानवता का भविष्य दांव पर नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए यूक्रेन युद्ध का कोई न कोई हल जल्द ही निकालना चाहिए। लेकिन हल निकले तो निकले कैसे? इसका केवल एक ही रास्ता दिखाई पड़ता है। वह यह है कि इस गुत्थी को सुलझाने के लिए भारत को आगे आना चाहिए। रूस एवं अमेरिका- दोनों से ही भारत के संबंध अच्छे हैं। दोनों ही देश भारत का सम्मान करते हैं। इसलिए भारत को इस मामले में पहल करनी चाहिए। उधर, भारत को फ्रांस को भी इस पहल में शामिल करना चाहिए। यह नरेन्द्र मोदी के लिए ऐतिहासिक अवसर है। प्रधानमंत्री मोदी को जी 20 जैसे फोरम का फायदा उठाकर यूक्रेन युद्ध समाप्ति की चेष्टा करनी चाहिए ताकि यूक्रेन युद्ध समाप्त हो और दुनिया चैन की सांस ले। 

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