बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!
‘एक जनपद, एक उत्पाद’ के नतीजों से वाकिफ़ हैं तो फिर राम चिड़िया, राम के खेत...गुनगुनाइए। सोशल मीडिया के हल्ले में कुछ नहीं धरा।
दिल्ली में एक आत्मीय के घर खाना खाने गया। मेज़ पर जो थाली थी, उसमें कई मारवाड़ी व्यंजनों के साथ एक कटोरी में लौकी के लच्छे भी परोसे गए थे। जिज्ञासावश पूछ लिया, कहां से मंगाए हैं। उन्होंने बताया कि इलाहाबाद से, मातादीन के यहां के हैं। दिल्ली में ऐसे स्वाद वाली मिठाई कहां मयस्सर! और ये परसाई वाले मातादीन नहीं हैं, न ही प्रयागराज के। उनके यहां का घेवर, घिया के लच्छे और गजक का ज़ाइक़ा ज़माने से इलाहाबादियों की ज़बान पर चढ़ा आया है, शहर तो ख़ैर अब जाकर प्रयागराज हुआ है। लोकनाथ में उनके ठिकाने पर मिठाई बांधने के लिए अब भी अख़बारी काग़ज़ और सूत की डोरी ही इस्तेमाल होती है।
उस शाम का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं कि अगले ही रोज़ के अख़बारों में पढ़ने को मिला कि यूपी सरकार ने देसी ज़ाइक़ों को बढ़ावा देने की हिकमत में ‘एक जनपद एक व्यंजन’ योजना की एक फ़ेहरिस्त जारी की है, जिसमें 208 व्यंजन शामिल हैं। इस ख़बर में चकराने वाली एक बात तो यही थी कि सूबे में ज़िले तो 75 ही हैं, एक व्यंजन के हिसाब 75 ज़ाइक़े होने चाहिए थे। मगर आप तो जानते ही हैं कि मुसाहिबों की जमात जो न करे, थोड़ा है।
पर सोशल मीडिया के स्वयंसेवकों की भृकुटि तन गई। इस फ़ेहरिस्त में कबाब-बिरयानी वगैरह का ज़िक्र नहीं होने पर ग़दर मच गया। आत्मविश्वास के समंदर में गोते लगाने वाली इस जमात की मुश्किल यह है कि बसें नहीं पढ़ते। जो लोग यूपी की सरकारी बसें पढ़ते आए हैं, उन्हें मालूम ही होगा कि एक ज़माने में ‘तू सच्चा तेरा नाम सच्चा’ के मंत्र से सजी रहने वाली बसों का नया प्रेरक सूत्र है—‘पशु पर दया करो’।
हंगामे की होड़ में शहर-ए-लखनऊ को यूनेस्को से मिला तमग़ा भूल ही गए, जो गलावट के कबाब से लेकर शीरमाल तक सबका ज़ाइक़ा तस्लीम करता है। अब ऐसे तो इस लिस्ट में साहूकारे का आलू-स्वाल ही नहीं है, अफ़ीमची के छोले नहीं हैं, प्रयाग वाले देहाती का जबर-जबर रसगुल्ला (इसे गुलाब जामुन पढ़ें) नहीं है, फ़ैज़ाबाद का फरा नहीं है, पांडेपुर वाले सरदारजी की लौंगलता नहीं है, रामपुरी गुलत्थी नहीं है, संडीला और ठग्गू के लड्डू भी नहीं हैं, तो क्या समझा जाए! होने को तो बहुत कुछ नहीं है।
तो सोशल मीडिया के अखाड़े में बहस-मुबाहिसा इस फ़ेहरिस्त पर होता तो समझ में भी आता, जो इसमें नहीं है, उस पर बहस क्यों करना! और जो उनकी समझ में सचमुच कुछ भी आया होता तो भला चित्रकूट का मावा, रायबरेली के मसाले और ग़ाज़ियाबाद का सोया चाप इस लिस्ट में होते! समझ पाते तो हर ज़िले के किसी एक व्यंजन का नाम लेते (मने ‘किसी एक फूल का नाम लो’ टाइप) या फिर इस योजना को ‘एक ज़िला, व्यंजन तमाम’ नाम दिया होता।
अरे, लिस्ट तो अपने मुंशी जी बनाते थे, पूरे भरोसे के साथ। मार्च 1920 में 'स्वदेश’ में छपी उनकी कहानी ‘मनुष्य का परम धर्म’ पढ़कर देखिए, जिसमें पेटू-शिरोमणि मोटेराम शास्त्री से उन्होंने कहलाया है, “मेरा अपना विचार है यदि आपके थाल में जौनपुर की इमरतियां, आगरे के मोतीचूर, मथुरा के पेड़े, बनारस की कलाकन्द, लखनऊ के रसगुल्ले, अयोध्या के गुलाब जामुन और दिल्ली का सोहन हलुआ हो तो वह ईश्वरभोग के योग्य है। देवतागण उस पर मुग्ध हो जाएंगे।” ख़ालिस एक ज़िला एक व्यंजन का बखान। ऐसे ही थाल के बारे में परसाई बता गए हैं, “अच्छा भोजन करने के बाद मैं अक्सर मानवतावादी हो जाता हूं।” इस लिहाज़ से आप चाहें तो ताज़ा सूची को मानवतावाद की मुहिम भी मान सकते हैं।
मुंशी जी के ज़माने में ‘नमक के दरोगा’ होते थे, एफ़डीए नहीं, इसीलिए एक सांस में मावे की इतनी मिठाइयों के नाम गिना गए. अब तो हाल यह है कि होली-दिवाली के आस-पास सक्रिय एफ़डीए वाले कई-कई क्विंटल मावा और पनीर रोज़ बुलडोज़र तले दबा डालते हैं, मिठाइयों की दुकानों पर छापे मार रहे होते हैं, समोसे के सैंपिल भर रहे होते हैं, कहीं घी नक़ली तो कहीं तेल। इधर तो एफ़डीए वाले सहालग के दिनों में भी मसरूफ़ रहने लगे हैं। मगर ज़बान के मारों को इसकी फ़िक्र इसलिए नहीं होती कि इन नमूनों की रिपोर्ट ही अगले साल तक मयस्सर होती है। तो मुझे लगता है कि मक्खन मलाई, दही-जलेबी या सिंघाड़ा कचरी की मार्केटिंग के मसले पर बहुत सिर खपाने से अच्छा है कि उन ज़ाइक़ों के बारे में बात की जाए जो सर-ए-फ़ेहरिस्त हैं।
इस सरकारी लिस्ट में ठग्गू लिखना शायद मुसाहिबों को रास न आया होगा, बन-मक्खन कभी खाया न होगा तो फ़ूड व्लॉगर्स पर एतबार करके कानपुर के आगे समोसा लिख मारा। अमां, समोसे के नाम पर जो शै मक़बूल है, वह तो इलाहाबादी समोसा है, वरना हर शहर के हर मोहल्ले में एकाध हलवाई ऐसा ज़रूर निकल आएगा, क़द्रदानों के बीच जिसके समोसे की तूती बोलती होगी। जिसने बरेली में कुमार टाकीज़ या फिर पूरन हलवाई के, तिलहर में अमन और झूसी में बाबा के समोसे कभी न खाए हों, ऐसी चूक वही कर सकता है। फतेहपुर की बेड़मी अभी तक न चख पाने का गुनाहगार हूं, मगर बांदा में खाई है न! हाथरस में, वृंदावन में, मथुरा और आगरा में भी खाई है। यह बृज के इलाक़े का पसंदीदा नाश्ता है और बांदा में बासु हलवाई के यहां हूबहू बृज जैसा ही स्वाद पाया था। इसकी वजह यह कि वह वृंदावन से दो कारीगर बुला लाए थे। हैरत नहीं कि फतेहपुर में भी किसी ने ऐसा ही किया हो। अभी तक तो मल्लावां के पेड़ों से ही फतेहपुर को पहचानता आया था। बांदा में बोड़े राम हलवाई के सोहन हलवे का क़ायल ज़रूर हूं। और मैं क्या, ज़माना क़ायल है।
अलीगढ़ के साथ कचौड़ी और इमरती का नाम दर्ज देखा, सो सोचा लगे हाथ यह भी बताता चलूं कि वो जो रायता फैलाने वाली लोकोक्ति है न, उसकी ईजाद का अलीगढ़ की इस कचौड़ी से कोई वास्ता ज़रूर है। मैदे की एकदम ठोस थपुआ जैसी चीज़, न नज़ाकत, न भरावन...जाने क्यों उसे कचौड़ी कहते हैं, के साथ जो सब्ज़ी परोसी जाती है, उसकी तासीर यह है कि खाने वाले के कान से धुआं निकलने लगे और सब्ज़ी के साथ मिलने वाला रायता उस धुएं पर छींटे मारने के काम आता है। प्लास्टिक के महीन गिलास में मिलने वाला दुबला-पतला रायता कई बार गिलास टेढा-मेढा होते ही फैल ही जाता है। इमरती अलीगढ़ी के मशहूर होने की ख़बर अभी लगी। ख़ालिद भाई अपने तजुर्बे से बताते हैं कि कबाब की दुकान के आसपास मिठाई की कोई दुकान ज़रूर दिखाई दे जाती है। हो सकता है कि लिस्ट बनाने वाले भी इस टोटके से वाकिफ़ हों।
कुशीनगर वालों ने केले हाल में ही उगाने शुरू किए हैं, केले के चिप्स कब उनकी पहचान बन गए, ज़माने को ख़बर ही नहीं हुई। गोरखपुर में कोई लिट्टी-चोखा या समोसा मशहूर है, यह तो लिट्टी-मटन के शौक़ीन गोरखपुरी भी शायद न मानें. वैसे भी, वे तो धर्मशाला पुल के क़रीब मिलने वाली इमरती, चौरीचौरा के लहसुन वाले छोले और शहर भर में मिलने वाले सत्तू के शर्बत पर ही फ़िदा हैं।
नाम दर्ज करने से पहले मुसाहिबों या उनके कारकूनों ने कन्नौज और जौनपुर के गट्टे चखकर भी देख लिए होते और अपनी ज़बान को ही भरोसे लायक़ मान लेते तो लिस्ट की सूरत कुछ और होती।
वैसे आपको लगता है कि आगरे का पेठा, बनारस के पान, पिंडरा का गुलाब जामुन, मेरठ की गजक-रेवड़ी, हापुड़ के पापड़, हाथरस की रबड़ी, प्रतापगढ़ के आंवले, बलिया के सत्तू, फ़र्रुख़ाबाद की दालमोठ, रामपुर के हब्शी हलवे, जौनपुर की इमरती, तिलहर की लौंज या बदायूं के पेड़े को मक़बूल होने के लिए सरकारी इमदाद की ज़रूरत है? तमाम शहरों के ख़ास ज़ाइक़े को लोक ने पहले से ही मक़बूल बना रखा है। आप ललितपुर के नाम बाजरे की रोटी दर्ज कर लो, मगर सालन क्या होगा, यह तो लोक ही तय करेगा न!
आप अगर ‘एक ज़िला, एक उत्पाद’ के नतीजों से वाकिफ़ हैं तो फिर राम चिड़िया, राम के खेत...गुनगुनाइए, सोशल मीडिया के इस हल्ले में कुछ नहीं धरा है।
