वक्त-बेवक्त : समलैंगिकता के वैधीकरण ने दिया बहुसंख्यकवाद के दूसरे रूपों के खिलाफ संघर्ष में ईंधन

यौन रुझानों में अगर किसी राजकीय हस्तक्षेप की जगह नहीं तो राजनीतिक विचारों में भी उसका दखल स्वीकार नहीं किया जा सकता। 377 के खिलाफ संघर्ष में जीत ने आगे बहुसंख्यकवाद के दूसरे रूपों के खिलाफ संघर्ष में ईंधन दिया है। वह आग और तेज हो।

फोटो : सोशल मीडिया
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अपूर्वानंद

“मैं हूं, जो मैं हूं, सो मुझे कबूल करो, जैसी मैं हूं,” जर्मन चिंतक गेटे की इस उक्ति के साथ उच्चतम न्यायालय का वह फैसला आरम्भ होता है जो न सिर्फ 158 साल पुराने एक कानून को रद्द करता है बल्कि समाज और कानून के दूसरे पूर्वाग्रहों और संकोचों के खिलाफ संघर्ष के लिए एक सहारा भी प्रदान करता है। गेटे की इस पंक्ति के हिंदी अनुवाद में होने वाली दुविधा से ही ऐसे पूर्वाग्रहों का, जो कतई प्राकृतिक नहीं हैं, कुछ अंदाज मिलता है। मसलन, ‘जैसी मैं हूँ’ लिखें’ या ‘जैसा मैं हूँ’ लिखें। स्वाभाविक क्या है, क्या परम्परानुकूल है या उसके द्वारा अनुमोदित है ? इससे अलग यह कि क्या लिखना उचित और न्यायसंगत है?

हिंदी भाषा में यह बहस की ही नहीं गई है। कुछ बरस पहले दिल्ली के लिए स्कूली किताब बनाते वक्त एक दुस्साहसिक प्रयोग किया गया। जिसे भाषा में स्वाभाविक या सार्वभौम लिंग कहते हैं यानि पुल्लिंग, उसकी जगह हर स्थान पर स्त्रीलिंग का प्रयोग किया गया। उदाहरण के लिए यह वाक्य : नागरिक सोचती है कि उसके अधिकार सुरक्षित नहीं हैं।

अध्यापकों ने, स्त्री अध्यापक समेत, जब यह वाक्य पढ़ा और फिर किताब में इसी प्रकार का ‘लिंग’ प्रयोग दूसरी जगहों पर भी देखा तो उन्होंने किताब प्रकाशित करने वाली संस्था से शिकायत की: यह प्रूफ की नहीं भाषा की गलती है। एक कार्यशाला में उनसे पूछा गया कि पुंल्लिंग को क्यों स्वाभाविक और सार्वभौम माना जाए तो चुप्पी छा गई। यह प्रचलन का मामला है, उत्तर था। क्यों स्त्रीलिंग को सार्वभौम न माना जाए?

जो प्रचलन है, वह कब से प्रचलन में आया और क्यों स्वाभाविक मान लिया गया, इन प्रश्नों को उठाना एक समय प्राकृतिक व्यवस्था को चुनौती माना जाता है। भाषा में प्रच्छन्न पूर्वग्रह समाज में वर्चस्वशाली शक्ति संबंध की ही एक अभिव्यक्ति है।

हिंदी कविता या कथा साहित्य में प्रेम भी इसी शक्ति संबंध के दायरे में ही व्यक्ति होता रहा है। वह स्त्री-पुरुष प्रेम ही रहा है। स्त्री स्त्री प्रेम या पुरुष पुरुष प्रेम विकृति माना जाता रहा है और अन्य सभी जगह समाज और राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाले साहित्यकार कम से कम इस मामले में उनके अनुचर ही रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने जब धारा 377 को आंशिक रूप से ख़ारिज किया जिसके चलते वे तमाम लोग जिनकी यौन अभिरुचियाँ या रुझान ‘अप्राकृतिक’ माने जाते हैं, अपराधी ठहरते हैं, तो उसने प्रकृति और संस्कृति और व्यक्ति और समाज के बीच के संबंध और तनाव की और भी इशारा किया। इतना ही नहीं, इस बात की तरफ भी यह संबंध दोनों के बीच निरंतर संघर्ष से बदलता रहेगा।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने अपने फैसले में लिखा कि कुदरत में ऐसी 1500 से अधिक प्रजातियों में समलिंगी यौन रुझान के उदाहरण हैं। लेकिन ये मनुष्यों की तरह तर्क या विवेक की सक्षमता से युक्त नहीं। तो क्या प्रकृति में जो व्याप्त है, उसकी मिसाल देकर उसके सहारे हम मनुष्यों में इस प्रवृत्ति का समर्थन कर रहे हैं? फिर जो प्रकृति में नहीं है वह क्या अनुचित न हो जाएगा?

उसी प्रकार परंपरा का सहारा इस संघर्ष के दौरान अक्सर लिया गया है। उदाहरणों से यह सिद्ध किया गया है कि इस प्रकार के यौन रुझान या सम्बन्ध हमेशा से समाज में रहे हैं। लेकिन परंपरा एक खतरनाक मित्र है। एक जगह वह न्याय का साथ दे सकती है, तो दूसरी जगह वह उसके खिलाफ रोड़ा बन जा सकती है। मसलन जिन बादशाहों के यौन रुझानों का हवाला देकर इस जनतांत्रिक संघर्ष के पक्ष में तर्क जुटाया गया है, वे और किस तरह के सामाजिक संबंधों के पक्षधर थे? या परंपरा में दूसरी घातक गैरबराबरी के जाने कितने उदाहरण हैं! जाति परंपरा सम्मत है। या कुछ परंपराओं में स्त्रियों का ख़ास वक्त पवित्र स्थलों से निषेध। तो क्या वह स्वीकार्य है? धारा 377 संबंधी निर्णय में इन्हीं वजहों से इसके एक हिस्से को रद्द करने के लिए दूसरे तर्क दिए गए हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने लिखा, “संवैधानिक नैतिकता का तकाजा और जद्दोजहद यह है कि राज्य की सभी संस्थाएं समाज में विविधता के तानेबाने की हिफाजत करें। यह किसी सीमित रथ में नहीं बल्कि बहुविध तरीकों से। राज्य के तीनों संस्थानों की यह जिम्मेवारी है कि वे लोकप्रिय भावना या बहुसंख्यकवाद के किसी भी रुझान या झुकाव को काबू करें। समाज पर किसी भी एकरूपी, समान, सर्वसंगत और मानक विचार को जबरन लादने की हर कोशिश संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत के विरुद्ध है। किसी एक वक्त लोकप्रिय भावना को संवैधानिक नैतिकता से प्रतिबद्धता के बराबर नहीं माना जा सकता।”

संवैधानिक नैतिकता की यह समझ आधुनिक है और लगातार बदलती है। लेकिन इसकी बुनियाद है व्यक्ति में ही अंतर्निहित उसके अधिकारों की स्वीकृति। वह सर्वोपरि है। कोई धर्म, कोई परंपरा उसपर अधिकार नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति नरीमन ने इसे सपष्ट करते हुए लिखा, “भारतीय संविधान के बुनियादी अधिकारों वाले अध्याय का मकसद ही है व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के विषय को अलग कर लेना और उसे बहुसंख्यकवादी सरकारों की पहुँच से बाहर कर देना।” उनके मुताबिक़ ये बुनियादी अधिकार चुनावों के नतीजों पर निर्भर नहीं। यह बहुसंख्यकवादी सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता कि वे यह तय करें कि किस प्रकार की सामाजिक नैतिकता स्वीकार्य है।

इसी फैसले में निजता के अधिकार का जिक्र भी किया गया है। खुद इसी अदालत ने निजता के अधिकार को व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन से अविभाज्य माना था।

जो तर्क यौन रुझानों के बारे में राज्य और समाज की समझ को और जनतांत्रिक और मानवीय बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं,वे दूसरी जगह भी इस्तेमाल होंगे। खासकर बहुसंख्यकवादी रुझान और वर्चस्व को नामंजूर किया जाना। अदालत ने ‘यौन अल्पसंख्यक’ पद का प्रयोग किया है। उसके मुताबिक़ इन अल्पसंख्यकों का संघर्ष दूसरे प्रकार के सामाजिक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष भी है। समाज जिन अंतर्धार्मिक और अंतरजातीय संबंधों को नियंत्रित करना चाहता है, यह उसके खिलाफ भी है। लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दायरा बड़ा है और उन पर हमले और किस्म के भी हैं।

भारत के जीवन के एक बहुत ही नाज़ुक मोड़ पर यह फैसला आया है। यह संयोग ही था, लकिन ऐसे संयोग इंसानी फैसलों के चलते ही घटित होते हैं कि जिस दिन यह फैसला आया, उसी दिन महाराष्ट्र पुलिस की इस मांग को कि पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और राजनीतिकर्मियों को उसके हवाले किया जाए,अदालत ने नहीं माना। इन सब पर यह आरोप है कि ये माओवादी रुझान के हैं और भारतीय राज्य और समाज के लिए खतरा हैं। अब तक तकनीकी आधार पर इन्हें पुलिस के कब्जे में नहीं दिया गया है लेकिन इनकी स्वतंत्रता सिर्फ कानून के तकनीकी नुक्तों की कैदी नहीं हो सकती।

यौन रुझानों में अगर किसी राजकीय हस्तक्षेप की जगह नहीं तो राजनीतिक विचारों में भी उसका दखल स्वीकार नहीं किया जा सकता। 377 के खिलाफ संघर्ष में जीत ने आगे बहुसंख्यकवाद के दूसरे रूपों के खिलाफ संघर्ष में ईंधन दिया है। वह आग और तेज हो।

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